डब्ल्यूएचओ ने बांझपन पर पहली ग्लोबल गाइडलाइन की जारी

डब्ल्यूएचओ के नए वैश्विक दिशा-निर्देश बांझपन की रोकथाम, जांच और उपचार को सुरक्षित, किफायती और सभी के लिए सुलभ बनाने पर केंद्रित हैं
डब्ल्यूएचओ ने देशों से प्रजनन सेवाओं को स्वास्थ्य प्रणाली में शामिल कर उन्हें किफायती, न्यायसंगत और अधिकार-आधारित बनाने की अपील की।
डब्ल्यूएचओ ने देशों से प्रजनन सेवाओं को स्वास्थ्य प्रणाली में शामिल कर उन्हें किफायती, न्यायसंगत और अधिकार-आधारित बनाने की अपील की।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • डब्ल्यूएचओ ने पहली बार बांझपन की रोकथाम, पहचान और उपचार के लिए वैश्विक दिशा-निर्देश जारी किए।

  • दुनिया में हर छह में से एक व्यक्ति जीवन में कभी न कभी बांझपन से प्रभावित होता है।

  • आईवीएफ जैसे उपचार बहुत महंगे होने के कारण अधिकतर लोग आर्थिक रूप से उपचार नहीं कर पाते।

  • दिशा-निर्देश जीवनशैली सुधार, एसटीआई उपचार और मानसिक स्वास्थ्य सहयोग जैसी रोकथाम रणनीतियों पर जोर देते हैं।

  • डब्ल्यूएचओ ने देशों से प्रजनन सेवाओं को स्वास्थ्य प्रणाली में शामिल कर उन्हें किफायती, न्यायसंगत और अधिकार-आधारित बनाने की अपील की।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने पहली बार बांझपन (इनफर्टिलिटी) की रोकथाम, पहचान और उपचार के लिए एक वैश्विक दिशा-निर्देश जारी किया है। इस दिशा-निर्देश का उद्देश्य दुनिया भर में प्रजनन संबंधी सेवाओं को अधिक सुरक्षित, न्यायसंगत और सभी के लिए किफायती बनाना है।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, बांझपन एक बहुत ही आम लेकिन अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है, जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है।

बांझपन: एक बढ़ती वैश्विक समस्या

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि प्रजनन आयु के लगभग हर छठे व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी बांझपन का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद, ज्यादातर देशों में बांझपन से जुड़े परीक्षण और उपचार बेहद महंगे हैं और अधिकतर खर्च लोगों को अपनी जेब से करना पड़ता है।

कई देशों में आईवीएफ जैसे उन्नत उपचार का खर्च औसत वार्षिक आय से भी दोगुना होता है। ऐसे में बहुत से लोग या तो इलाज करवाने में असमर्थ रहते हैं या कम-प्रमाणित और सस्ते विकल्पों की ओर धकेल दिए जाते हैं।

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डब्ल्यूएचओ ने देशों से प्रजनन सेवाओं को स्वास्थ्य प्रणाली में शामिल कर उन्हें किफायती, न्यायसंगत और अधिकार-आधारित बनाने की अपील की।

रिपोर्ट में डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस के हवाले से कहा गया है कि बांझपन एक गंभीर समानता का मुद्दा है। उनके अनुसार, कई लोग अपनी आर्थिक स्थिरता और संतान प्राप्ति की इच्छा के बीच कठिन निर्णय लेने के लिए मजबूर होते हैं। उन्होंने देशों से अपील की कि वे नए दिशा-निर्देशों को अपनाकर गुणवत्तापूर्ण और सस्ती सेवाओं तक लोगों की पहुंच बनाएं।

दिशा-निर्देशों में क्या शामिल है?

डब्ल्यूएचओ के नए दिशा-निर्देशों में 40 प्रमुख सिफारिशें शामिल हैं, जो रोकथाम, पहचान और उपचार - तीनों स्तरों पर कार्य को मजबूत करने पर केंद्रित हैं। इनका उद्देश्य है कि:

  • हर चरण पर किफायती और प्रभावी विकल्प उपलब्ध हों।

  • प्रजनन सेवाओं को राष्ट्रीय स्वास्थ्य रणनीतियों में शामिल किया जाए।

  • स्वास्थ्य सेवाओं और वित्तीय ढांचों में प्रजनन देखभाल को एकीकृत किया जाए।

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मानव-केंद्रित और प्रमाण-आधारित देखभाल

बांझपन को 12 महीने या उससे अधिक समय तक नियमित, असुरक्षित यौन संबंध के बाद गर्भधारण न होने की स्थिति के रूप में परिभाषित किया गया है। यह स्थिति केवल शारीरिक स्वास्थ्य को नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करती है। इससे जुड़ी अवसाद, चिंता और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं भी लोगों के जीवन पर भारी पड़ती हैं।

दिशा-निर्देशों में बांझपन की पहचान के लिए चरणबद्ध तरीके बताए गए हैं। इनमें पुरुष और महिला दोनों में जैविक कारणों की जांच शामिल है। सरल सलाह जैसे उपजाऊ समय की जानकारी, स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की सलाह-से लेकर जटिल उपचारों जैसे आईयूआई और आईवीएफ तक, हर स्तर पर क्रमिक और मरीज-केंद्रित निर्णय लेने का सुझाव दिया गया है।

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रोकथाम पर जोर

डब्ल्यूएचओ ने यह भी बताया कि रोकथाम ही लंबे समय में सबसे प्रभावी रणनीति है। दिशा-निर्देशों के अनुसार:

  • युवाओं को प्रजनन और बांझपन की जानकारी स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में मिलनी चाहिए।

  • यौन संचारित संक्रमण जैसे कारणों का समय पर उपचार बेहद जरूरी है।

  • धूम्रपान, खराब आहार, शारीरिक निष्क्रियता जैसी जीवनशैली से जुड़ी आदतें बांझपन का जोखिम बढ़ाती हैं, इसलिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाने पर जोर दिया गया है।

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मानसिक स्वास्थ्य का महत्व

डब्ल्यूएचओ ने स्पष्ट किया कि बांझपन केवल चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा भी है, जो कई बार बेहद कठिन होती है। इसलिए सभी प्रभावित लोगों के लिए नियमित मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समर्थन उपलब्ध कराना आवश्यक है। इससे न केवल उपचार प्रक्रिया आसान होती है, बल्कि परिवारों को भी तनाव से उबरने में मदद मिलती है।

बदलती दुनिया में प्रजनन स्वास्थ्य

डब्ल्यूएचओ देशों को प्रोत्साहित कर रहा है कि वे इन दिशा-निर्देशों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार अपनाएं और समय-समय पर प्रगति की समीक्षा करें। इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालयों, पेशेवर संगठनों, सिविल सोसाइटी और रोगी समूहों के बीच सहयोग जरूरी है।

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इसके साथ ही डब्ल्यूएचओ ने यह भी कहा कि बांझपन सेवाएं एक अधिकार-आधारित और लैंगिक समानता पर आधारित नजरिए का हिस्सा होनी चाहिए। लोगों को अपने प्रजनन संबंधी निर्णय-कब और कितने बच्चे -स्वतंत्र रूप से लेने का अधिकार होना चाहिए।

आगे क्या?

यह दिशा-निर्देश व्यापक है, लेकिन डब्ल्यूएचओ ने माना कि अभी भी कई क्षेत्रों में अधिक शोध और नए साक्ष्यों की आवश्यकता है। भविष्य में आने वाले संस्करणों में उभरते विषयों -जैसे प्रजनन क्षमता का संरक्षण, तीसरे पक्ष की सहायता से प्रजनन और पूर्व-मौजूद बीमारियों का असर को शामिल किया जाएगा।

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