

चलना, सीढ़ियां चढ़ना, व्यायाम करना या रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम करना- ये ऐसी गतिविधियां हैं, जिन्हें हम अक्सर सहजता से करते हैं। लेकिन ऑस्टियोआर्थराइटिस यानी जोड़ों का गठिया इन सामान्य कामों को भी दर्दनाक और मुश्किल बना सकता है।
दुनिया भर में इस बीमारी का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि 2050 तक करीब 100 करोड़ लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं, जबकि 2023 में यह संख्या लगभग 60 करोड़ थी।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि फिलहाल न तो इस बीमारी का कोई स्थाई इलाज है और न ही ऐसी दवा उपलब्ध है, जो इसकी मूल प्रक्रिया को रोक सके या इसकी रफ्तार धीमी कर दे।
प्रतिष्ठित जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक, 1990 से 2023 के बीच ऑस्टियोआर्थराइटिस के कारण दिव्यांगता का वैश्विक बोझ 65 फीसदी बढ़ गया है। बढ़ता मोटापा, बुजुर्ग आबादी और जोड़ों में लगने वाली चोटें आने वाले वर्षों में इस संकट को और गहरा सकती हैं।
बीमारी का असर केवल जोड़ों के दर्द तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यक्ति की चलने-फिरने, सक्रिय रहने और अपनी पसंद के काम करने की आजादी भी छीन सकता है।
कर्टिन यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में 18 देशों के विशेषज्ञों ने सरकारों से इस बीमारी को उम्र बढ़ने की सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज न करने और इसे स्वास्थ्य नीतियों में प्राथमिकता देने की अपील की है। उन्होंने बीमारी की रोकथाम, शुरुआती पहचान, किफायती और गुणवत्तापूर्ण उपचार तथा मरीजों की लंबे समय तक देखभाल सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थायी इलाज न होने के बावजूद स्वस्थ वजन बनाए रखने, जोड़ों की चोटों से बचने और समय पर बेहतर उपचार उपलब्ध कराने से लाखों लोगों को असहनीय दर्द और बढ़ती अक्षमता से बचाया जा सकता है।
चलना-फिरना, सीढ़ियां चढ़ना और रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम करना भी अगर दर्द की वजह से मुश्किल हो जाए, तो जिंदगी कितनी सीमित हो सकती है, इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं। ऑस्टियोआर्थराइटिस यानी जोड़ों का गठिया दुनिया भर में ऐसी ही एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि 2050 तक दुनिया की करीब 100 करोड़ आबादी इस बीमारी से पीड़ित हो सकती है।
गौरतलब है कि 2023 में इस समस्या से जूझ रहे लोगों का आंकड़ा करीब 60 करोड़ दर्ज किया गया था। चिंताजनक बात यह है कि फिलहाल इस बीमारी का न तो कोई स्थाई इलाज उपलब्ध है और न ही ऐसी दवा, जो इसके बढ़ने की प्रक्रिया को रोक या धीमा कर सके।
प्रतिष्ठित जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए दुनिया भर की सरकारों से स्वास्थ्य नीतियों में बदलाव करने की अपील की है। कर्टिन यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में 18 देशों के विशेषज्ञों ने यह स्वास्थ्य नीति रोडमैप तैयार किया है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, ऑस्टियोआर्थराइटिस को अब तक स्वास्थ्य नीतियों में वह जगह नहीं मिली है, जिसकी यह बीमारी हकदार है। इसे अक्सर उम्र बढ़ने के साथ होने वाली सामान्य परेशानी मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। नतीजतन, मरीजों को समय पर सही उपचार, जरूरी जानकारी और पर्याप्त सहायता नहीं मिल पाती।
शोधकर्ताओं के अनुसार, 1990 से 2023 के बीच ऑस्टियोआर्थराइटिस के कारण होने वाली वैश्विक दिव्यांगता का बोझ 65 फीसदी बढ़ गया है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज अध्ययन में शामिल 350 से अधिक बीमारियों में यह सबसे बड़ी बढ़ोतरी में से एक है।
कर्टिन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एलाइड हेल्थ से जुड़े और अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर एंड्रयू ब्रिग्स का कहना है कि दुनिया की स्वास्थ्य प्रणालियां इस बीमारी के बढ़ते बोझ से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं। खासकर कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है।
उनके मुताबिक, समाज में ऑस्टियोआर्थराइटिस को लेकर एक गलत धारणा बनी हुई है कि यह बुढ़ापे में होने वाली ऐसी बीमारी है, जिसका दर्द सहने के अलावा कोई विकल्प नहीं। इसी सोच के कारण मरीज अक्सर उपचार और देखभाल की संभावनाओं से अनजान रह जाते हैं।
ब्रिग्स का कहना है कि अब इस धारणा को बदलने की जरूरत है। लोगों को यह समझाना होगा कि बीमारी के साथ भी अपने लक्षणों को नियंत्रित करते हुए सक्रिय और बेहतर जीवन जिया जा सकता है।
शोधकर्ताओं ने ऑस्टियोआर्थराइटिस के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए तीन प्रमुख प्राथमिकताएं तय की हैं।
पहला, सरकारें इस बीमारी को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों में उचित स्थान दें। इसके लिए मरीजों की संख्या, बीमारी से होने वाले आर्थिक नुकसान और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाले बोझ से जुड़े आंकड़े जुटाए जाएं।
दूसरा, मरीजों को सस्ता, गुणवत्तापूर्ण और उनकी जरूरतों के अनुरूप इलाज उपलब्ध कराया जाए। ऑस्टियोआर्थराइटिस को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और दूसरी पुरानी बीमारियों के उपचार कार्यक्रमों से जोड़ा जाए, ताकि मरीजों को इलाज के लिए भटकना न पड़े।
तीसरा, बीमारी के जोखिम को कम करने के लिए बचाव पर जोर दिया जाए। इसके तहत बढ़ते मोटापे को नियंत्रित करने और खेल, कार्यस्थलों तथा रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान जोड़ों में लगने वाली चोटों को रोकने के उपाय किए जाएं।
सिडनी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड हंटर के मुताबिक, ऑस्टियोआर्थराइटिस के उपचार में अब समय आ गया है कि केवल दर्द कम करने के बजाय बीमारी की रोकथाम, शुरुआती पहचान और बेहतर जीवनशैली पर ध्यान दिया जाए।
उनका कहना है कि बीमारी को समझाने के लिए इस्तेमाल होने वाले 'हड्डियां आपस में रगड़ खा रही हैं' या 'जोड़ घिस गए हैं' जैसे शब्द मरीजों में निराशा पैदा कर सकते हैं। इससे कई लोग यह मान लेते हैं कि उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती जाएगी और वे कुछ नहीं कर सकते।
जबकि बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित करने और उनके असर को कम करने के प्रभावी तरीके मौजूद हैं। हालांकि, ऐसी कोई दवा अभी उपलब्ध नहीं है जो बीमारी की मूल प्रक्रिया को रोक सके या उसे उलट सके। इसके बावजूद बहुत से मरीजों को ऐसा उपचार नहीं मिल रहा, जो वैज्ञानिक प्रमाणों और सर्वोत्तम चिकित्सा पद्धतियों पर आधारित हो।
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि बढ़ता मोटापा, बुजुर्ग आबादी में वृद्धि और जोड़ों में लगने वाली चोटें आने वाले दशकों में ऑस्टियोआर्थराइटिस के मामलों को और बढ़ा सकती हैं।
प्रोफेसर ब्रिग्स के मुताबिक, अधिक वजन और जोड़ों में चोट लगना घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस के दो प्रमुख ऐसे जोखिम कारक हैं, जिन्हें नियंत्रित किया जा सकता है। खासकर युवाओं में खेल के दौरान लगने वाली चोटों को रोकना भविष्य में इस बीमारी का बोझ कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने कहा कि स्वस्थ वजन बनाए रखने, युवाओं को जोड़ों की चोटों से बचाने और मरीजों तक वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित उपचार पहुंचाने से भविष्य में बीमारी के मामलों को कम करने में मदद मिल सकती है।
वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉर्ज मिल्ने, जो खुद ऑस्टियोआर्थराइटिस के साथ जीवन बिता रहे हैं, बताते हैं कि इस बीमारी का असर केवल जोड़ों तक सीमित नहीं रहता। यह व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी, उसकी गतिविधियों और भविष्य को लेकर सोच तक बदल देती है।
उनके मुताबिक, कई बार चलना, व्यायाम करना या अपनी पसंद के सामान्य काम करना भी दर्द के कारण बेहद मुश्किल हो जाता है।
वह कहते हैं कि लोगों को यह समझना चाहिए कि ऑस्टियोआर्थराइटिस बुढ़ापे की कोई ऐसी सामान्य समस्या नहीं है, जिसे चुपचाप सहते रहना चाहिए। इस बीमारी से जूझ रहे लोगों की बात सुनी जानी चाहिए और उन्हें भरोसा मिलना चाहिए कि अपने लक्षणों को संभालने के लिए वे कुछ कर सकते हैं।
आर्थराइटिस ऑस्ट्रेलिया की मुख्य कार्यकारी अधिकारी लुईस हार्डी ने भी बेहतर जानकारी और उपचार संबंधी सहायता की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक, लंबे समय से मरीजों को दर्द सहने या इसे उम्र बढ़ने का स्वाभाविक हिस्सा मानकर स्वीकार करने की सलाह दी जाती रही है। अब इस सोच को बदलना जरूरी है।
अध्ययन में ऑस्ट्रेलिया में ऑस्टियोआर्थराइटिस के उपचार की कमियों का भी उल्लेख किया गया है। ऑस्ट्रेलियन केयरट्रैक अध्ययन के मुताबिक, 2009-10 के दौरान इस बीमारी के मरीजों को दी गई चिकित्सा सेवाओं में से केवल 43 फीसदी ही बेहतर चिकित्सा मानकों के अनुरूप थीं।
प्रोफेसर ब्रिग्स के मुताबिक, यह बीमारी व्यक्तियों के जीवन के साथ-साथ स्वास्थ्य प्रणालियों और अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ डाल रही है। अनुमान है कि इससे होने वाला आर्थिक नुकसान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब 1 से 2.5 फीसदी के बराबर है।
ऐसे में शोधकर्ताओं का कहना है कि ऑस्टियोआर्थराइटिस को अब उम्र बढ़ने की मामूली समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकारों को इसे एक गंभीर पुरानी बीमारी के रूप में स्वीकार करना होगा और इसकी रोकथाम, शुरुआती उपचार, पुनर्वास तथा मरीजों की दीर्घकालिक देखभाल में निवेश बढ़ाना होगा।
संदेश स्पष्ट है कि बीमारी का स्थाई इलाज भले ही अभी उपलब्ध न हो, लेकिन सही नीतियों, समय पर देखभाल और बचाव के उपायों से करोड़ों लोगों को दर्द और दिव्यांगता की गंभीर स्थिति तक पहुंचने से बचाया जा सकता है।