

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में पैकेटबंद स्नैक्स, मीठे पेय, इंस्टेंट नूडल्स और झटपट तैयार होने वाले भोजन हमारी थाली का हिस्सा बनते जा रहे हैं। लेकिन इनकी बढ़ती खपत का असर केवल शरीर के वजन और दिल की सेहत तक सीमित नहीं है, बल्कि दिमाग को भी नुकसान पहुंचा सकती है।
कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी और पॉपुलेशन हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में करीब 9,000 स्वस्थ वयस्कों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि सबसे अधिक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने वालों में दिमाग के छोटे हिस्सों को नुकसान पहुंचने के संकेत मिलने की आशंका सबसे कम सेवन करने वालों की तुलना में करीब 40 फीसदी अधिक थी।
ये ऐसे बदलाव हैं, जिनका शुरुआती दौर में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखता। व्यक्ति की याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता सामान्य रह सकती है, लेकिन दिमाग के भीतर नुकसान की प्रक्रिया शुरू हो चुकी होती है।
एमआरआई जांच में सामने आए ये संकेत भविष्य में स्ट्रोक और याददाश्त संबंधी समस्याओं के खतरे से जुड़े हो सकते हैं।
अध्ययन में महिलाओं के बीच यह संबंध अधिक मजबूत पाया गया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड न केवल पौष्टिक भोजन की जगह ले रहे हैं, बल्कि पेट की चर्बी और सूजन जैसी समस्याओं से भी जुड़े हैं।
हालांकि, यह अध्ययन इनके सेवन और मस्तिष्क को नुकसान के बीच संबंध दिखाता है, सीधा कारण साबित नहीं करता। इसके बावजूद नतीजे चेताते हैं कि दिमाग की सेहत बचाने के लिए खानपान पर ध्यान देना जरूरी है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पैकेटबंद चिप्स, बिस्कुट, मीठे पेय, इंस्टेंट नूडल्स और झटपट तैयार होने वाले भोजन हमारी थाली का तेजी से हिस्सा बनते जा रहे हैं। समय बचाने और आसानी से उपलब्ध होने के कारण लोग इन्हें रोजमर्रा के खाने में शामिल कर लेते हैं। लेकिन इनकी यह सुविधा सेहत के लिए भारी पड़ सकती है।
एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन न केवल शरीर को मोटापे और दूसरी बीमारियों की ओर धकेल सकता है, बल्कि दिमाग को भी नुकसान पहुंचा सकता है। खास बात यह है कि इस नुकसान के संकेत दिखाई देने से पहले ही दिमाग में बदलाव शुरू हो सकते हैं।
कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी और हैमिल्टन हेल्थ साइंसेज के पॉपुलेशन हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट (पीएचआरआई) के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में करीब 9,000 स्वस्थ वयस्कों के आंकड़ों और मस्तिष्क की एमआरआई जांच का विश्लेषण किया गया। इसमें 35 से 69 वर्ष की आयु के ऐसे लोग शामिल थे, जिन्हें पहले से हृदय रोग की कोई जानकारी नहीं थी।
अध्ययन में पाया गया कि जो लोग सबसे अधिक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ खाते थे, उनके दिमाग में छोटे-छोटे क्षतिग्रस्त हिस्से मिलने की आशंका सबसे कम सेवन करने वालों की तुलना में करीब 40 फीसदी अधिक थी।
ये ऐसे बदलाव हैं, जिनका शुरुआत में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देता। व्यक्ति सामान्य महसूस कर सकता है, लेकिन दिमाग के भीतर नुकसान की प्रक्रिया चल रही होती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ऐसे संकेत भविष्य में स्ट्रोक और याददाश्त से जुड़ी समस्याओं के खतरे से जुड़े हो सकते हैं।
अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता और मैकमास्टर यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर रसेल जे डी सूजा के मुताबिक, इन नतीजों ने शोधकर्ताओं को भी चौंकाया। उन्होंने बताया कि अध्ययन में शामिल लोग अधेड़ उम्र के स्वस्थ कनाडाई नागरिक थे। उन्हें न तो हृदय संबंधी कोई बीमारी थी और न ही उन्होंने दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत की थी।
आमतौर पर इस तरह के नुकसान को उन बीमारियों से जोड़ा जाता है, जिनका पता अधिक उम्र में चलता है। लेकिन इस अध्ययन में अपेक्षाकृत कम उम्र के स्वस्थ लोगों के दिमाग में भी इसके संकेत मिले।
वैज्ञानिकों ने एमआरआई स्कैन में दिमाग के सफेद पदार्थ (व्हाइट मैटर) को हुए नुकसान और स्ट्रोक के ऐसे छोटे निशानों की जांच की, जिनका व्यक्ति को पता तक नहीं चलता। गौरतलब है कि श्वेत पदार्थ दिमाग के अलग-अलग हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाने का काम करता है। इसमें नुकसान होने से भविष्य में दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
अध्ययन में सबसे कम अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने वाले लोगों में से करीब 8.1 फीसदी के दिमाग में ऐसे नुकसान के संकेत मिले, जबकि सबसे अधिक सेवन करने वालों में यह आंकड़ा बढ़कर 11.3 फीसदी था।
अध्ययन का एक और चिंताजनक पहलू यह था कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और दिमाग को होने वाले नुकसान के बीच संबंध महिलाओं में अधिक मजबूत दिखाई दिया। सबसे ज्यादा ऐसे खाद्य पदार्थ खाने वाली महिलाओं में सबसे कम सेवन करने वाली महिलाओं की तुलना में दिमाग को नुकसान के संकेत मिलने की आशंका करीब 1.8 गुना थी।
हालांकि, पुरुषों में ऐसा स्पष्ट संबंध नहीं मिला। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि महिलाओं और पुरुषों के बीच इस अंतर को समझने के लिए अभी और अध्ययन की जरूरत है।
अध्ययन से जुड़ी वरिष्ठ शोधकर्ता और पीएचआरआई की वैज्ञानिक सोनिया आनंद के मुताबिक, खानपान और दिमाग की सेहत के बीच संबंध उस समय भी दिखाई दे सकता है, जब व्यक्ति को याददाश्त या सोचने-समझने में कोई परेशानी महसूस नहीं होती। उनका कहना है कि 30, 40, 50 और 60 की उम्र में हम क्या खाते हैं, उसका असर आगे चलकर हमारे दिमाग की सेहत पर पड़ सकता है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन लोगों के भोजन में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की मात्रा अधिक थी, उनकी थाली में फल, सब्जियां, साबुत अनाज और दूसरे कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी कम थी।
सबसे अधिक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने वाले लोगों के कुल दैनिक भोजन में इनकी हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी थी। इसके उलट, सबसे कम सेवन करने वालों के भोजन में यह मात्रा करीब 16 फीसदी रही।
वहीं, फल, सब्जियां और साबुत अनाज जैसे कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ सबसे कम अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने वालों के दैनिक भोजन का करीब 68.6 फीसदी हिस्सा थे। सबसे अधिक सेवन करने वालों में यह आंकड़ा घटकर 41.5 फीसदी रह गया। इससे संकेत मिलता है कि लोग केवल अतिरिक्त पैकेटबंद भोजन नहीं खा रहे, बल्कि धीरे-धीरे पौष्टिक और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों की जगह यह अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ले रहे हैं।
रसेल डी सूजा के मुताबिक, अधिक मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने वाले लोग अपने सामान्य भोजन के ऊपर केवल अतिरिक्त चीजें नहीं खा रहे थे। ये खाद्य पदार्थ उनकी थाली में मौजूद स्वास्थ्यवर्धक भोजन की जगह भी लेते दिखाई दिए।
शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिक मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने वाले लोगों में शरीर की कुल चर्बी और पेट के भीतर जमा चर्बी भी अधिक थी। पेट के अंगों के आसपास जमा यह चर्बी सूजन और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाने से जुड़ी होती है। इसका असर दिमाग तक रक्त पहुंचाने वाली नसों पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, शरीर की चर्बी को ध्यान में रखकर विश्लेषण करने के बाद भी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और दिमाग को होने वाले नुकसान के बीच संबंध लगभग बना रहा। इससे वैज्ञानिकों का अनुमान है कि केवल मोटापा ही नहीं, बल्कि इन खाद्य पदार्थों की बनावट और उनमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी इस समस्या में भूमिका निभा सकती है।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में आमतौर पर नमक, अतिरिक्त चीनी और संतृप्त वसा की मात्रा अधिक होती है, जबकि फाइबर, विटामिन और खनिज जैसे जरूरी पोषक तत्व अपेक्षाकृत कम होते हैं।
अध्ययन की सबसे अहम बात यह भी रही कि दिमाग में नुकसान के संकेत मिलने के बावजूद अधिक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने वाले लोगों की याददाश्त, ध्यान और सोचने-समझने की क्षमता से जुड़े परीक्षणों के नतीजे दूसरे लोगों जैसे ही थे।
यानी व्यक्ति को अपनी सेहत में कोई बदलाव महसूस न हो, उसकी रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य चल रही हो, फिर भी दिमाग में शुरुआती नुकसान मौजूद हो सकता है।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने माना कि अध्ययन में इस्तेमाल किए गए छोटे परीक्षण शुरुआती बदलावों को पकड़ने के लिए पर्याप्त संवेदनशील नहीं भी हो सकते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित हुए हैं। इसमें शोधकर्ताओं ने कनाडा के दो बड़े स्वास्थ्य अध्ययनों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया। प्रतिभागियों से उनके खानपान के बारे में विस्तृत जानकारी ली गई और उनकी एमआरआई जांच की गई। इसके बाद न्यूरोलॉजिस्ट ने उनके खानपान की जानकारी से अनजान रहते हुए मस्तिष्क की तस्वीरों का विश्लेषण किया।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और दिमाग को होने वाले नुकसान के बीच संबंध को दिखाता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि इन खाद्य पदार्थों के सेवन से ही दिमाग को नुकसान पहुंचा। प्रतिभागियों का आकलन एक ही समय पर किया गया था और लंबे समय तक उनके स्वास्थ्य पर नजर नहीं रखी गई।
रसेल डी सूजा के मुताबिक, यह जानने के लिए लंबे समय तक अध्ययन करने की जरूरत है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करने से दिमाग में होने वाले इन बदलावों को धीमा किया जा सकता है या रोका जा सकता है।
फिलहाल यह अध्ययन एक अहम संदेश देता है कि सेहत का ध्यान रखना केवल शरीर के वजन या दिल की बीमारी से बचने तक सीमित नहीं होना चाहिए। हमारी रोज की थाली में क्या है, इसका असर दिमाग पर भी पड़ सकता है। इसलिए जहां तक संभव हो, पैकेटबंद और अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की जगह ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज और कम प्रसंस्कृत भोजन को प्राथमिकता देना जरूरी है।