रातों में ज्यादा रोशनी चुपचाप बदल सकती है दिल की बनावट, स्टडी में मांसपेशियों में दिखे हैरान करने वाले बदलाव

स्टडी में रात के समय ज्यादा रोशनी के संपर्क में रहने वाले लोगों में दिल की मांसपेशियां मोटी और कम लचीली मिलीं, साथ ही उनमें आगे चलकर हार्ट फेलियर का जोखिम भी अधिक पाया गया।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • रात में कमरे की हल्की रोशनी, खिड़की से आती स्ट्रीट लाइट या मोबाइल स्क्रीन की चमक को हम अक्सर मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन एक नए अध्ययन ने संकेत दिया है कि रात के समय ज्यादा रोशनी के संपर्क का संबंध दिल की बनावट और उसके काम करने के तरीके में बदलाव से हो सकता है।

  • यूके बायोबैंक से जुड़े 11,017 लोगों के आंकड़ों के विश्लेषण में शोधकर्ताओं ने पाया कि रात में ज्यादा रोशनी के संपर्क में रहने वाले लोगों के बाएं वेंट्रिकल की दीवार औसतन 1.5 फीसदी ज्यादा मोटी थी।

  • इस हिस्से की मांसपेशियों का द्रव्यमान भी करीब 2.4 फीसदी अधिक था और हृदय की मांसपेशियों में लचीलेपन से जुड़े कुछ बदलाव देखे गए। ज्यादा रोशनी के संपर्क वाले लोगों ने औसतन कम नींद भी ली।

  • एक अलग बड़े विश्लेषण में 73 हजार से अधिक लोगों के स्वास्थ्य पर 8 से 10 वर्षों तक नजर रखने पर रात में ज्यादा रोशनी के संपर्क का संबंध हार्ट फेलियर, हार्ट अटैक और स्ट्रोक के अधिक जोखिम से पाया गया।

  • शोधकर्ताओं का कहना है कि कमरे को अधिक अंधेरा रखना, ब्लैकआउट पर्दों का इस्तेमाल और रात में तेज रोशनी व स्क्रीन का संपर्क कम करना व्यावहारिक कदम हो सकते हैं। साथ ही, यह पता लगाने के लिए और शोध की जरूरत है कि रोशनी कम करने से वास्तव में हृदय की सेहत बेहतर होती है या नहीं।

क्या आप भी रात को सोते समय मोबाइल सिरहाने रखकर सोते हैं, या खिड़की से आती स्ट्रीट लाइट के उजाले में आंखें मूंदते हैं? अगर हां, तो यह खबर आपके दिल की सेहत के लिए बेहद जरूरी है।

रिसर्च से पता चला है कि रात में सोते समय कमरे में टिमटिमाती हल्की रोशनी, खिड़की से आते ऊंजाले या मोबाइल स्क्रीन की जिस चमक को हम अक्सर मामूली बात मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। वो हमारे दिल की सेहत पर गहरा असर डाल सकती है।

11 हजार से अधिक लोगों पर किए इस अध्ययन में रात के समय ज्यादा रोशनी के संपर्क और दिल की बनावट व काम करने के तरीके में कुछ ऐसे बदलावों के बीच संबंध मिला है, जो लंबे समय में दिल की सेहत के लिए चिंता का कारण बन सकते हैं।

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन का नेतृत्व अमेरिका की तुलाने यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लू ची ने किया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, रात में ज्यादा रोशनी के संपर्क में रहने वाले लोगों के दिल की कुछ मांसपेशियां अपेक्षाकृत मोटी और कम लचीली पाई गईं।

अध्ययन में ब्रिटेन के यूके बायोबैंक से जुड़े 11,017 लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। सभी प्रतिभागियों ने एक सप्ताह तक कलाई पर ऐसा सेंसर पहना, जो उनकी गतिविधि के साथ-साथ आसपास की रोशनी को भी रिकॉर्ड करता था। इसके करीब तीन साल बाद सभी प्रतिभागियों के दिल का कार्डियक एमआरआई किया गया।

इससे शोधकर्ताओं को दिल के अलग-अलग कक्षों के आकार, उनकी दीवारों की मोटाई और हर धड़कन के दौरान हृदय की मांसपेशियों की गतिविधि को समझने का मौका मिला।

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शोधकर्ताओं ने रात के दौरान तीन लक्स से अधिक रोशनी के संपर्क को भी देखा। तीन लक्स बहुत तेज रोशनी नहीं है, लेकिन यह वह स्तर है जहां से शरीर में नींद से जुड़े हार्मोन मेलाटोनिन के उत्पादन पर असर पड़ना शुरू हो सकता है।

बता दें कि मेलाटोनिन एक प्राकृतिक हार्मोन है जो मस्तिष्क में स्थित पीनियल ग्रंथि द्वारा बनाया जाता है। इसे 'नींद का हार्मोन' भी कहते हैं क्योंकि यह सोने और जागने के चक्र को नियंत्रित करता है।

ज्यादा रोशनी के साथ दिल में दिखे बड़े बदलाव

निष्कर्ष दर्शाते हैं कि जिन लोगों को रात में सबसे ज्यादा रोशनी का सामना करना पड़ा, उनके बाएं वेंट्रिकल की दीवार औसतन करीब 1.5 फीसदी ज्यादा मोटी थी। बायां वेंट्रिकल दिल का वह कक्ष है जो पूरे शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त पहुंचाने के लिए उसे पंप करता है।

इन लोगों में इस हिस्से की मांसपेशियों का द्रव्यमान भी करीब 2.4 फीसदी अधिक था और हर धड़कन के दौरान हृदय की मांसपेशियां अपेक्षाकृत कम लचीले तरीके से सिकुड़ती और फैलती मिलीं। साथ ही दाएं वेंट्रिकल और बाएं एट्रियम में भी कुछ बदलाव देखे गए।

ये अंतर भले ही छोटे थे और किसी प्रतिभागी को पहले से हृदय रोग नहीं था, लेकिन शोधकर्ताओं ने एक अहम संकेत देखा। रात में रोशनी जितनी ज्यादा थी, हृदय में ये बदलाव भी उतने ही अधिक नजर आए। प्रोफेसर लू ची के मुताबिक, यह अध्ययन पहली बार रात में टिमटिमाती रोशनी और हृदय की संरचना व कार्य में बदलाव के बीच इस तरह का संबंध दिखाता है।

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उनके अनुसार, लंबे समय तक तनाव या हृदय पर चोट की स्थिति में शरीर खुद को ढालने की कोशिश करता है और इसी प्रक्रिया में हृदय की संरचना बदल सकती है।

कम नींद भी हो सकती है एक कड़ी

रिसर्च में सामने आया है कि रात की रोशनी और दिल के बीच संबंध की एक महत्वपूर्ण कड़ी नींद भी हो सकती है। अध्ययन में रात में सबसे ज्यादा रोशनी के संपर्क में वाले लोगों ने औसतन करीब 6.9 घंटे की नींद ली, जबकि रात में तीन लक्स से अधिक रोशनी के संपर्क में न आने वाले लोगों की औसत नींद करीब 7.7 घंटे थी।

शोधकर्ताओं ने पाया कि कम नींद भी इस कड़ी में अहम भूमिका निभाती है। कम सोने से रात की रोशनी और हृदय में दिखे ज्यादातर बदलावों के बीच संबंध का करीब 24 से 49 फीसदी हिस्सा समझाया जा सकता है।

इसका मतलब यह भी है कि केवल कम नींद ही पूरी कहानी नहीं बताती। शोधकर्ताओं का कहना है, रात में जगमगाती रोशनी शरीर की तनाव प्रतिक्रिया, रात के समय रक्तचाप और सूजन जैसी प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकती है। ये सभी लंबे समय में हृदय की मांसपेशियों पर असर डाल सकते हैं।

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शोधकर्ताओं ने सेंसर पहनने वाले 73 हजार से अधिक लोगों के स्वास्थ्य पर 8 से 10 साल तक नजर रखी। उन्होंने पाया कि जिन लोगों को रात में सबसे ज्यादा रोशनी का सामना करना पड़ा, उनमें हृदय के विफल होने का जोखिम 29 फीसदी अधिक था। इसकी तुलना उन लोगों से की गई, जो रात में तीन लक्स से अधिक रोशनी के संपर्क में नहीं थे।

इसी तरह सबसे ज्यादा रोशनी के संपर्क में रहने वाले समूह में हार्ट अटैक का जोखिम 24 फीसदी और स्ट्रोक का जोखिम 33 फीसदी अधिक पाया गया।

हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। यह एक अवलोकनात्मक अध्ययन था। इसलिए इससे यह साबित नहीं होता कि रात की रोशनी सीधे तौर पर हार्ट फेलियर, हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण बनती है। शोधकर्ताओं ने केवल रोशनी के संपर्क और इन स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध को देखा है।

क्या अंधेरा कम कर सकता है दिल का खतरा?

अध्ययन के साथ प्रकाशित संपादकीय में जर्मनी के यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर मेन्ज के प्रोफेसर थॉमस म्यूनजेल और उनके सहयोगियों ने कहा कि डॉक्टरों को मरीजों से उनके सोने के माहौल के बारे में भी पूछना चाहिए, उदाहरण के लिए कमरे में कितना अंधेरा है, क्या वे रात में काम करते हैं और सूर्यास्त के बाद स्क्रीन को कितनी देर देखते हैं।

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विशेषज्ञों ने रात में कमरे में ज्यादा अंधेरा रखने के कुछ आसान उपाय भी सुझाए हैं। इनमें ब्लैकआउट पर्दों का इस्तेमाल, तेज सफेद रोशनी की जगह गर्म रंग वाली हल्की रोशनी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की छोटी स्टैंडबाय लाइट को ढकना शामिल है।

यह सलाह खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि रातों में जगमगाती रोशनी से बचना अपेक्षाकृत आसान और कम खर्चीला उपाय है। शहरों में भी स्ट्रीट लाइट को जरूरत के मुताबिक मंद करना, रोशनी को नीचे की ओर केंद्रित करना और मोशन सेंसर जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

अभी कई सवालों के जवाब मिलना बाकी

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन की अपनी कुछ सीमाएं भी हैं। प्रतिभागियों की रात की रोशनी केवल एक सप्ताह तक मापी गई थी, जबकि उनके दिल का एमआरआई करीब तीन साल बाद किया गया। इसलिए यह जरूरी नहीं कि सेंसर वाले सप्ताह में दर्ज रोशनी का स्तर लंबे समय तक उनकी सामान्य आदतों को दर्शाता हो।

सेंसर ने रोशनी की मात्रा तो मापी, लेकिन यह नहीं बताया कि रोशनी मोबाइल स्क्रीन से आ रही थी, कमरे के बल्ब से या खिड़की के बाहर की सड़क की रोशनी से। रात में काम करने वाले लोगों को भी अध्ययन में शामिल नहीं किया गया था।

शोधकर्ताओं के अनुसार, अब अगला महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या रात में सोने की जगह को वास्तव में ज्यादा अंधेरा रखने से हृदय की सेहत बेहतर होती है। इसका जवाब जानने के लिए ऐसे अध्ययन जरूरी होंगे, जिनमें लोगों की रात की रोशनी को नियंत्रित करके उसके प्रभाव को सीधे जांचा जाए।

फिलहाल, यह अध्ययन एक छोटी-सी लेकिन महत्वपूर्ण बात की ओर इशारा करता है, जिस अंधेरे को हम रात की सामान्य स्थिति मानते हैं, वह शायद शरीर की जैविक घड़ी और हृदय के लिए भी मायने रखता है।

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