दिमाग को समय से पहले बूढ़ा बना सकता है प्रदूषण-असमानता का खतरनाक गठजोड़

यह महज एक स्वास्थ्य चेतावनी नहीं, बल्कि उस माहौल पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है जिस में हम आज जी रहे हैं
दिल्ली के सदर बाजार की एक व्यस्त गली; फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • प्रदूषण, गरीबी और सामाजिक असमानता का बढ़ता दबाव अब सिर्फ जीवन की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि इंसानी दिमाग की उम्र को भी तेजी से प्रभावित कर रहा है। 34 देशों में हुए बड़े अध्ययन ने साफ किया है कि जब ये कारक एक साथ काम करते हैं, तो उनका असर कई गुना बढ़कर दिमाग को समय से पहले बूढ़ा कर सकता है।

  • रिसर्च से पता चला है कि हम जिस हवा में सांस लेते हैं, जिन हालात में जीते हैं और जिस समाज का हिस्सा हैं, वह चुपचाप हमारे दिमाग को भीतर से बदल रहा है। सच यह है कि प्रदूषण, असमानता और लगातार बढ़ता तनाव मिलकर एक ऐसा अदृश्य दबाव बना रहे हैं, जो हमारे दिमाग की उम्र को तेजी से आगे धकेल रहा है।

  • इंसान अपने जीवन में जिन परिस्थितियों से गुजरता है, जैसे हवा की गुणवत्ता, रहने की स्थिति, आर्थिक स्थिति और सामाजिक माहौल, इन सभी का संयुक्त प्रभाव दिमाग पर पड़ता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘एक्सपोजोम’ कहा जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक जब कई नकारात्मक परिस्थितियां एक साथ सक्रिय होती हैं, तो उनका असर कई गुणा बढ़ जाता है और उसके साथ ही दिमाग के बूढ़ा होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।

  • यह रिपोर्ट चेतावनी देती है कि दिमाग की सेहत केवल व्यक्तिगत आदतों से नहीं, बल्कि हमारे पूरे पर्यावरण, समाज और नीतियों से तय होती है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि दिमाग की सेहत अब केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा भी है। इसलिए सरकारों और नीति-निर्माताओं को मिलकर ऐसे कदम उठाने होंगे, जो पर्यावरण, समाज और शासन व्यवस्था, तीनों को मजबूत करें।

क्या आपका दिमाग आपकी उम्र से पहले बूढ़ा हो रहा है और आपको इसका एहसास तक नहीं? रिसर्च से पता चला है कि हम जिस हवा में सांस लेते हैं, जिन हालात में जीते हैं और जिस समाज का हिस्सा हैं, वह चुपचाप हमारे दिमाग को भीतर से बदल रहा है। सच यह है कि प्रदूषण, असमानता और लगातार बढ़ता तनाव मिलकर एक ऐसा अदृश्य दबाव बना रहे हैं, जो हमारे दिमाग की उम्र को तेजी से आगे धकेल रहा है।

34 देशों में किए व्यापक अध्ययन से पता चला है कि प्रदूषण, गरीबी और सामाजिक असमानता जैसे कारक मिलकर इंसानी दिमाग की उम्र को तेजी से बढ़ा सकते हैं।

वहीं दूसरी तरफ, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, समानता और साफ-सुथरा वातावरण इस प्रक्रिया को धीमा भी कर सकते हैं। यानी, हम जिस माहौल में रहते हैं, वह हमारे दिमाग के बूढ़ा होने की रफ्तार को तय कर रहा है। यह महज एक स्वास्थ्य चेतावनी नहीं, बल्कि उस माहौल पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है जिस में हम आज जी रहे हैं।

18,700 से अधिक लोगों पर किए गए इस अंतरराष्ट्रीय शोध में वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि आखिर किन कारणों से दिमाग उम्र से पहले प्रभावित होता है। इसके नतीजे चौंकाने वाले रहे। अध्ययन में सामने आया कि दूषित हवा, खराब रहन-सहन, आर्थिक असमानता और कमजोर सामाजिक ढांचा ये सभी मिलकर दिमाग पर गहरा असर डालते हैं। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं।

क्या कहता है शोध?

शोध के मुताबिक, इंसान अपने जीवन में जिन परिस्थितियों से गुजरता है, जैसे हवा की गुणवत्ता, रहने की स्थिति, आर्थिक स्थिति और सामाजिक माहौल, इन सभी का संयुक्त प्रभाव दिमाग पर पड़ता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘एक्सपोजोम’ कहा जाता है।

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यह सिर्फ एक फैक्टर नहीं, बल्कि कई पर्यावरणीय, सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों का संयुक्त परिणाम है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक जब कई नकारात्मक परिस्थितियां एक साथ सक्रिय होती हैं, तो उनका असर कई गुणा बढ़ जाता है और उसके साथ ही दिमाग के बूढ़ा होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।

इस शोध में 73 अलग-अलग फैक्टर्स का विश्लेषण किया गया, जिनमें प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, हरियाली की कमी, पानी की गुणवत्ता, आर्थिक असमानता और लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसे पहलू शामिल थे। जब इन सभी को एक साथ देखा गया, तो पाया गया कि इनका संयुक्त प्रभाव किसी एक कारण के मुकाबले 15 गुणा ज्यादा खतरनाक हो सकता है।

दिमाग पर कैसे पड़ता है असर?

अध्ययन में यह भी सामने आया कि प्रदूषण, अत्यधिक गर्मी और हरियाली की कमी दिमाग की संरचना को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे याददाश्त, भावनात्मक संतुलन और शरीर की स्वचालित प्रक्रियाएं (ऑटोमैटिक सिस्टम) प्रभावित होती हैं।

इसके पीछे सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और रक्त प्रवाह में गड़बड़ी जैसे जैविक कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, सामाजिक दबाव जैसे गरीबी, असमानता और समर्थन की कमी दिमाग के उन हिस्सों को प्रभावित करते हैं जो सोचने, समझने और सामाजिक व्यवहार से जुड़े होते हैं।

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लंबे समय तक तनाव में रहने से दिमाग लगातार खुद को ढालता रहता है, जिससे उसकी कार्यक्षमता कमजोर पड़ने लगती है। हैरानी की बात है कि इन सामाजिक कारणों का असर कई बार डिमेंशिया जैसी बीमारियों से भी ज्यादा गंभीर हो सकता है।

इस बारे में अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता ऑगस्टीन इबानेज का कहना है कि पहली बार इतने बड़े स्तर पर साबित हुआ है कि कई पर्यावरणीय और सामाजिक कारक मिलकर दिमाग की उम्र पर गहरा असर डालते हैं। उनके अनुसार, दिमाग की सेहत को समझने के लिए अब सिर्फ एक कारण को नहीं, बल्कि पूरे माहौल को साथ में देखना जरूरी है।

क्या हैं इसके बड़े संकेत?

यह अध्ययन एक बड़ा सन्देश देता है कि दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए महज अच्छी डाइट, एक्सरसाइज या इलाज काफी नहीं है।

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असल बदलाव के लिए पर्यावरण और समाज दोनों में सुधार जरूरी है। प्रदूषण को कम करना, शहरों में हरियाली बढ़ाना, पानी की गुणवत्ता में सुधार करना, सामाजिक असमानता को घटाना और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना, ये सभी कदम दिमाग की सेहत को बेहतर बना सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि दिमाग की सेहत अब केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा भी है। इसलिए सरकारों और नीति-निर्माताओं को मिलकर ऐसे कदम उठाने होंगे, जो पर्यावरण, समाज और शासन व्यवस्था, तीनों को मजबूत करें।

इस रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर हम अपने आसपास के माहौल को नहीं सुधारते, तो आने वाले समय में दिमाग से जुड़ी बीमारियां और तेजी से बढ़ सकती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारा दिमाग महज हमारे शरीर का हिस्सा नहीं, बल्कि उस दुनिया का प्रतिबिंब है जिसमें हम जी रहे हैं।

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