

रेबीज से बचाव संभव, लेकिन लक्षण दिखने के बाद बीमारी लगभग जानलेवा; काटने पर तुरंत इलाज जरूरी है और टीकाकरण अहम है।
आईसीएमआर अध्ययन के अनुसार भारत में हर साल 5,726 रेबीज मौतों का अनुमान, साथ ही 91 लाख पशु-काटने के मामले सामने आते हैं।
विश्व रेबीज दिवस 2026 की थीम ‘स्ट्रॉन्गर टुगेदर’, जागरूकता और सामूहिक प्रयासों से बीमारी खत्म करने पर जोर देती है।
‘जीरो बाय 30’ लक्ष्य के तहत 2030 तक कुत्तों से होने वाली मानव रेबीज मौतों को खत्म करने का प्रयास जारी है।
कुत्ते के काटने पर घाव को साबुन और बहते पानी से 15 मिनट धोकर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना बेहद जरूरी है।
हर साल 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को रेबीज की बीमारी, इसके खतरे और बचाव के तरीकों के बारे में जागरूक करना है। रेबीज एक ऐसी बीमारी है, जिसे समय पर सावधानी और इलाज से पूरी तरह रोका जा सकता है। लेकिन एक बार इसके लक्षण दिखाई देने लगें तो यह बीमारी लगभग हमेशा जानलेवा साबित होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनिया में हर साल हजारों लोगों की मौत रेबीज से होती है और करीब 99 प्रतिशत मानव मामले संक्रमित कुत्तों के काटने से जुड़े हैं।
2026 की थीम ‘स्ट्रॉन्गर टुगेदर’
विश्व रेबीज दिवस 2026 की आधिकारिक थीम ‘स्ट्रॉन्गर टुगेदर’ यानी "मिलकर ज्यादा मजबूत करना” है। इस साल का संदेश है कि रेबीज को खत्म करने के लिए केवल स्वास्थ्य विभाग या डॉक्टरों की कोशिश काफी नहीं है। इसमें आम लोगों, पशु चिकित्सकों, सरकार, स्वास्थ्यकर्मियों और स्थानीय समुदायों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, कुत्तों का बड़े स्तर पर टीकाकरण, बेहतर निगरानी और लोगों में जागरूकता बढ़ाना रेबीज को रोकने के प्रमुख उपाय हैं।
भारत में रेबीज का खतरा
भारत में रेबीज लंबे समय से सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, देश में हर साल करीब 18,000 से 20,000 लोगों की रेबीज से मौत होने की बात कही गई थी। हालांकि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी (एनआईई) के नेतृत्व में 2022-23 में किए गए देशव्यापी अध्ययन ने हर साल करीब 5,726 मानव रेबीज मौतों का अनुमान लगाया है। अध्ययन में देश में हर साल करीब 91 लाख पशु-काटने की घटनाओं का भी अनुमान सामने आया।
दुनिया भर में रेबीज से होने वाली मौतों को 2030 तक खत्म करने के लिए “जीरो बाय 30” लक्ष्य रखा गया है। इसका मतलब है कि कुत्तों से फैलने वाले रेबीज के कारण होने वाली मानव मौतों को वर्ष 2030 तक शून्य करना।
क्या है रेबीज?
रेबीज एक संक्रामक बीमारी है, जो दिमाग और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करती है। यह संक्रमित जानवर की लार के संपर्क में आने से फैल सकती है। कुत्ते इसका सबसे आम स्रोत हैं। संक्रमित जानवर के काटने या खरोंचने के अलावा, ऐसी स्थिति में जहां संक्रमित लार किसी खुले घाव या आंख, मुंह जैसी जगह के संपर्क में आए, संक्रमण का खतरा हो सकता है।
रेबीज के लक्षण कई हफ्तों या महीनों बाद दिखाई दे सकते हैं। शुरुआत में बुखार, सिरदर्द, कमजोरी और काटे गए स्थान पर दर्द, जलन या झनझनाहट हो सकती है। बाद में बेचैनी, भ्रम, निगलने में परेशानी, पानी से डर लगना, ज्यादा लार आना, लकवा और बेहोशी जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
कुत्ते के काटने पर तुरंत क्या करें?
कुत्ते या किसी संदिग्ध संक्रमित जानवर के काटने के बाद समय गंवाना खतरनाक हो सकता है। सबसे पहले घाव को साबुन और बहते पानी से कम से कम 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना चाहिए। इसके बाद जल्द से जल्द स्वास्थ्य केंद्र या डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। डब्ल्यूएचओ भी काटने के तुरंत बाद घाव धोने और चिकित्सकीय सलाह लेने की सिफारिश करता है।
डॉक्टर जरूरत के अनुसार पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस यानी पीईपी की सलाह दे सकते हैं। इसमें रेबीज का टीका दिया जाता है और कुछ गंभीर परिस्थितियों में रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन की जरूरत पड़ सकती है। इलाज का सही तरीका घाव और संपर्क की स्थिति पर निर्भर करता है।
टीकाकरण है बचाव की कुंजी
रेबीज से बचाव के लिए कुत्तों का टीकाकरण सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक है। पालतू कुत्तों को पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार नियमित टीका लगवाना चाहिए। जिन लोगों को काम के कारण रेबीज का अधिक खतरा रहता है, जैसे पशु चिकित्सक, पशु संभालने वाले और कुछ प्रयोगशाला कर्मी, उन्हें डॉक्टर की सलाह से प्री-एक्सपोजर टीकाकरण दिया जा सकता है।
विश्व रेबीज दिवस का संदेश साफ है - जानकारी, सावधानी, कुत्तों का टीकाकरण और काटने के बाद समय पर इलाज से रेबीज से होने वाली मौतों को रोका जा सकता है। इसके लिए समाज के हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है।