रात की गर्मी भी बढ़ा सकती है घबराहट, नींद और सेहत पर पड़ सकता है बुरा असर

नए अध्ययन में खुलासा: दिन के मुकाबले रात की गर्मी शरीर में तनाव से जुड़े जैविक बदलाव कर बढ़ा सकते हैं परेशानी
41 कॉलेज विद्यार्थियों पर हुए अध्ययन में दिन की गर्मी से चिंता स्कोर 24.71 प्रतिशत, रात में 27.80 प्रतिशत बढ़ा।
41 कॉलेज विद्यार्थियों पर हुए अध्ययन में दिन की गर्मी से चिंता स्कोर 24.71 प्रतिशत, रात में 27.80 प्रतिशत बढ़ा।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • नई स्टडी में खुलासा, दिन और रात की गर्मी से युवाओं में चिंता का स्तर बढ़ा, रात की गर्मी का असर ज्यादा व्यापक।

  • रात में 30 डिग्री तापमान पर गर्मी से नींद की गुणवत्ता घटी, सोने की अवधि कम हुई और बेचैनी बढ़ने के संकेत मिले।

  • रात की गर्मी में कोर्टिसोल और सूजन से जुड़े संकेतक बढ़े, जबकि मस्तिष्क स्वास्थ्य से जुड़ा बीडीएनएफ स्तर घटा।

  • 41 कॉलेज विद्यार्थियों पर हुए अध्ययन में दिन की गर्मी से चिंता स्कोर 24.71 प्रतिशत, रात में 27.80 प्रतिशत बढ़ा।

  • विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ती गर्म रातों से बचाव जरूरी; हालांकि लंबे समय तक मानसिक स्वास्थ्य पर असर समझने के लिए अधिक शोध आवश्यक है।

गर्मी का नाम सुनते ही आंखों के सामने चिलचिलाती धूप, पसीने से तरबतर शरीर और तपती सड़कें घूमने लगती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रात की गर्मी भी आपकी मानसिक सेहत पर असर डाल सकती है? रात में पारा चढ़ा रहने से न सिर्फ नींद खराब हो सकती है, बल्कि बेचैनी और घबराहट भी बढ़ सकती है। हाल ही में जर्नल ‘एनवायरनमेंट एंड हेल्थ’ में प्रकाशित एक अध्ययन में यह बात सामने आई है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, दिन और रात, दोनों समय गर्मी के संपर्क में आने से युवाओं में तत्काल महसूस होने वाली चिंता यानी स्टेट एंग्जायटी बढ़ी। हालांकि रात की गर्मी के दौरान शरीर में जैविक बदलावों की एक बड़ी श्रृंखला देखने को मिली। यह अध्ययन ऐसे समय में अहम है, जब जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई हिस्सों में रातें भी पहले से ज्यादा गर्म हो रही हैं।

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41 युवाओं पर किया गया अध्ययन

इस अध्ययन में 18 से 25 वर्ष की उम्र के 41 स्वस्थ कॉलेज विद्यार्थियों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने नियंत्रित वातावरण में यह समझने की कोशिश की कि गर्मी का मानसिक स्थिति और शरीर के अंदर होने वाली प्रक्रियाओं पर क्या असर पड़ता है।

प्रतिभागियों को अलग-अलग परिस्थितियों में रखा गया। सामान्य तापमान वाली स्थिति में कमरे का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस था। दिन के समय गर्मी के प्रभाव को समझने के लिए तापमान 32 डिग्री और रात के समय 30 डिग्री सेल्सियस रखा गया।

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दिन का परीक्षण सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक चला, जबकि रात का परीक्षण रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक किया गया। इसके बाद प्रतिभागियों की चिंता के स्तर के साथ-साथ शरीर में सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, कोर्टिसोल और बीडीएनएफ जैसे जैविक संकेतकों की जांच की गई।

दिन में भी बढ़ी चिंता, रात में ज्यादा बदलाव

अध्ययन के नतीजों के अनुसार, दिन में गर्मी के संपर्क में आने पर प्रतिभागियों के स्टेट एंग्जायटी स्कोर में 24.71 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं, रात में गर्मी के दौरान यह वृद्धि 27.80 प्रतिशत रही। इसका मतलब यह नहीं है कि इतने प्रतिशत लोगों को कोई मानसिक बीमारी हो गई। ये आंकड़े चिंता के स्कोर में बदलाव दिखाते हैं, न कि किसी मानसिक रोग के मरीजों की संख्या।

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रात की गर्मी के दौरान शरीर में सूजन से जुड़े संकेतक इंटरल्यूकिन-1 बीटा (आईएल-1बीटा) और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़ा मालोनडायल्डिहाइड (एमडीए) बढ़ा। इसके साथ तनाव से जुड़े हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर भी बढ़ा, जबकि मस्तिष्क के स्वास्थ्य और तंत्रिका कोशिकाओं के कामकाज से जुड़ा बीडीएनएफ घटा।

इसके उलट, दिन की गर्मी के दौरान मुख्य रूप से एमडीए और ऑक्सीडाइज्ड एलडीएल के स्तर में बढ़ोतरी देखी गई।

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रात की नींद बिगड़ने से बढ़ सकती है परेशानी

रात की गर्मी का एक अहम असर नींद पर भी पड़ा। प्रतिभागियों की नींद की गुणवत्ता खराब हुई और सोने की अवधि कम हो गई।

दरअसल, रात में शरीर को आराम करने और दिनभर की थकान से उबरने का मौका मिलता है। लेकिन जब कमरा गर्म रहता है, तो शरीर के लिए अपनी गर्मी बाहर निकालना मुश्किल हो सकता है। इससे नींद बार-बार टूट सकती है और सुबह उठने पर थकान, चिड़चिड़ापन या बेचैनी महसूस हो सकती है।

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अगर गर्म रातों में लगातार अच्छी नींद न मिले, तो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर इसका असर पड़ने की आशंका बढ़ सकती है। हालांकि, इस अध्ययन से लंबे समय तक होने वाले प्रभावों की पुष्टि नहीं होती।

तनाव के हार्मोन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस की भूमिका

शोध में एमडीए और कोर्टिसोल को रात की गर्मी तथा चिंता के बीच संबंध के संभावित कारणों के रूप में पहचाना गया। विश्लेषण के अनुसार, एमडीए ने इस संबंध का 14.42 प्रतिशत और कोर्टिसोल ने 6.88 प्रतिशत हिस्सा समझाने में भूमिका निभाई।

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कोर्टिसोल शरीर का एक महत्वपूर्ण तनाव हार्मोन है। सामान्य तौर पर इसका स्तर दिन और रात के हिसाब से बदलता है। रात में गर्मी के दौरान इसका बढ़ना संकेत देता है कि गर्म वातावरण शरीर की सामान्य जैविक लय को प्रभावित कर सकता है।

बढ़ती गर्म रातों से बचाव जरूरी

विशेषज्ञों के लिए यह अध्ययन इस बात को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार है कि गर्मी का असर केवल शरीर के तापमान तक सीमित नहीं हो सकता। जलवायु परिवर्तन के दौर में गर्म रातों से बचाव, आरामदायक नींद और घरों को ठंडा रखने की व्यवस्था पर अधिक ध्यान देना जरूरी है।

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हालांकि अध्ययन में प्रतिभागियों की संख्या कम थी और केवल युवा, स्वस्थ विद्यार्थियों को शामिल किया गया था। इसलिए इसके नतीजों को बच्चों, बुजुर्गों और अन्य आयु वर्गों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। लंबे समय तक गर्मी में रहने के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने के लिए और शोध की जरूरत है।

फिलहाल संदेश साफ है: गर्मी से बचाव करते समय सिर्फ दिन की धूप नहीं, रात के बढ़ते तापमान को भी गंभीरता से लेना चाहिए। आखिर अच्छी नींद केवल आराम नहीं, बल्कि बेहतर मानसिक सेहत की भी बुनियाद है।

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