2050 तक कैंसर के नए मामलों के दोगुना होने का अंदेशा, डब्ल्यूएचओ ने तुरंत कदम उठाने को कहा

हर दिन 26 हजार लोगों की जान ले रहा है कैंसर, हर साल 2.06 करोड़ नए कैंसर के मरीज सामने आ रहे हैं; 2050 तक 3.5 करोड़ पहुंचने की आशंका
डब्ल्यूएचओ के अनुसार यदि प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो साल 2050 तक कैंसर के नए मामले बढ़कर लगभग 3.5 करोड़ हो जाएंगे।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार यदि प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो साल 2050 तक कैंसर के नए मामले बढ़कर लगभग 3.5 करोड़ हो जाएंगे।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • हर दिन 26 हजार से अधिक लोगों की कैंसर से मौत होती है, जबकि हर साल लगभग 2.06 करोड़ नए मामले सामने आते हैं।

  • डब्ल्यूएचओ के अनुसार यदि प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो साल 2050 तक कैंसर के नए मामले बढ़कर लगभग 3.5 करोड़ हो जाएंगे।

  • उच्च आय वाले देशों में स्तन कैंसर की 87 प्रतिशत मरीज पांच वर्ष तक जीवित रहती हैं, जबकि कम आय वाले देशों में यह आंकड़ा 42 प्रतिशत है।

  • दुनिया में लगभग 40 प्रतिशत कैंसर के मामले तंबाकू, शराब, मोटापा, संक्रमण, अस्वस्थ खानपान और शारीरिक निष्क्रियता जैसे रोके जा सकने वाले कारणों से जुड़े हैं।

  • डब्ल्यूएचओ के सर्वे में 45 प्रतिशत कैंसर प्रभावित परिवारों ने आर्थिक संकट और आधे से अधिक लोगों ने मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बताई।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की नई रिपोर्ट के अनुसार, कैंसर आज दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक बन गया है। हर दिन 26 हजार से अधिक लोगों की मौत कैंसर के कारण हो रही है। हर साल लगभग 2.06 करोड़ नए कैंसर के मामले सामने आते हैं और करीब एक करोड़ लोगों की इस बीमारी से जान चली जाती है।

हृदय रोगों के बाद कैंसर दुनिया में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो वर्ष 2050 तक हर साल कैंसर के नए मामलों की संख्या लगभग 3.5 करोड़ तक पहुंच सकती है।

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डब्ल्यूएचओ के अनुसार यदि प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो साल 2050 तक कैंसर के नए मामले बढ़कर लगभग 3.5 करोड़ हो जाएंगे।

इलाज में अमीर और गरीब देशों के बीच बड़ा अंतर

रिपोर्ट बताती है कि कैंसर के इलाज और जांच की सुविधाओं में देशों के बीच बड़ी असमानता है। उच्च आय वाले देशों में स्तन कैंसर से पीड़ित 87 प्रतिशत महिलाएं बीमारी का पता चलने के पांच साल बाद तक जीवित रहती हैं। वहीं कम आय वाले देशों में यह आंकड़ा केवल 42 प्रतिशत है। कई गरीब देशों में लोगों को समय पर जांच, इलाज और जरूरी दवाएं नहीं मिल पाती हैं।

यही कारण है कि वहां कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के एक-तिहाई से भी कम देशों ने कैंसर के इलाज को अपनी सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा योजना में शामिल किया है।

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परिवारों पर भी पड़ता है भारी असर

कैंसर केवल मरीज को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को प्रभावित करता है। इलाज का खर्च कई परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक समस्या बन जाता है। डब्ल्यूएचओ के सर्वे के अनुसार कम से कम 45 प्रतिशत कैंसर मरीजों और उनके परिवारों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

आधे से अधिक लोगों ने मानसिक तनाव और चिंता की शिकायत की। मरीजों की देखभाल करने वाले परिजनों को भी लंबे समय तक बिना किसी भुगतान के सेवा करनी पड़ती है, जिससे उन पर मानसिक और सामाजिक दबाव बढ़ जाता है।

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डब्ल्यूएचओ के अनुसार यदि प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो साल 2050 तक कैंसर के नए मामले बढ़कर लगभग 3.5 करोड़ हो जाएंगे।

अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तस्वीर

रिपोर्ट के अनुसार साल 2024 में एशिया में दुनिया के सबसे अधिक कैंसर के मामले और मौतें दर्ज की गईं। इसका मुख्य कारण यहां की बड़ी आबादी है। यूरोप की आबादी दुनिया की कुल आबादी का केवल लगभग नौ प्रतिशत है, लेकिन वहां कैंसर के मामलों और मौतों का हिस्सा काफी अधिक है। वहीं अफ्रीका और एशिया के कई कम आय वाले देशों में कैंसर के मामले अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन इलाज की कमी के कारण मृत्यु दर ज्यादा है।

किन कारणों से बढ़ रहा है कैंसर

रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में लगभग 40 प्रतिशत कैंसर ऐसे कारणों से जुड़े हैं जिन्हें रोका जा सकता है। तंबाकू और शराब का सेवन, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी, असंतुलित खानपान और वायु प्रदूषण इसके प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा एचपीवी, हेपेटाइटिस बी और सी तथा हेलिकोबैक्टर पाइलोरी जैसे संक्रमण भी कई प्रकार के कैंसर का कारण बनते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर और समय पर टीकाकरण करवाकर कैंसर के कई मामलों को रोका जा सकता है।

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कुछ क्षेत्रों में हुई है प्रगति

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पिछले कुछ वर्षों में कई देशों ने कैंसर नियंत्रण की दिशा में अच्छे कदम उठाए हैं। साल 2010 के बाद से तंबाकू का उपयोग 27 प्रतिशत तक घटा है, जिससे कुछ क्षेत्रों में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में कमी आई है।

टीकाकरण कार्यक्रमों और स्वच्छता में सुधार से संक्रमण से होने वाले कैंसर भी कम हुए हैं। अब 82 प्रतिशत देशों के पास राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजना है, जबकि साल 2010 में यह आंकड़ा केवल 50 प्रतिशत था। कैंसर पर वैज्ञानिक शोध और नए उपचारों के लिए क्लिनिकल परीक्षणों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।

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अब क्या करने की जरूरत है

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि केवल नई दवाएं या आधुनिक तकनीक ही पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत इस बात की है कि हर व्यक्ति को समय पर जांच, सस्ता इलाज और जरूरी दवाएं मिलें। रिपोर्ट में सरकारों, स्वास्थ्य संस्थाओं, वैज्ञानिकों और समाज से मिलकर काम करने की अपील की गई है। साथ ही कैंसर से प्रभावित लोगों के अनुभवों को स्वास्थ्य नीतियों का हिस्सा बनाने पर भी जोर दिया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रोकथाम पर अधिक ध्यान दिया जाए, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाया जाए और सभी लोगों को समान अवसर दिए जाएं, तो आने वाले वर्षों में कैंसर से होने वाली मौतों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। आज लिए गए सही फैसले ही भविष्य की पीढ़ियों को इस गंभीर बीमारी के बढ़ते खतरे से बचाने में मदद करेंगे।

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