

आईआईटी मद्रास के शोध में चेन्नई मेट्रो की रेलिंग, टिकट मशीनों और काउंटरों पर मिले अलग-अलग प्रकार के सूक्ष्मजीव।
मेट्रो के 41 नमूनों में 80 फीसदी से अधिक में एंटीबायोटिक प्रतिरोध से जुड़े जीन के निशान मिले।
शोधकर्ताओं ने 72 परिवारों के प्रतिरोधी जीन और 30 प्रमुख माइक्रोब प्रजातियों की पहचान की।
चेन्नई के नौ बैक्टीरिया अन्य 31 शहरों की तुलना में स्थानीय नमूनों में अधिक पाए गए।
वैज्ञानिकों ने नियमित निगरानी और ज्यादा छुए जानी वाली सतहों की सफाई पर जोर दिया, हालांकि संक्रमण का खतरा साबित नहीं हुआ।
चेन्नई मेट्रो में रोजाना लाखों हाथ रेलिंग, टिकट मशीनों, काउंटरों और सीढ़ियों के सहारे सफर करते हैं। कोई टिकट खरीदता है, कोई रेलिंग पकड़कर ट्रेन में चढ़ता है और कोई भीड़ के बीच रास्ता बनाता है। लेकिन इन सार्वजनिक जगहों पर आंखों से न दिखने वाली एक और दुनिया भी आबाद है। यह दुनिया है बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्मजीवों की। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के एक नए अध्ययन ने इसी दुनिया की झलक दिखाई है।
शोधकर्ताओं को चेन्नई मेट्रो के अलग-अलग हिस्सों से लिए गए नमूनों में कई तरह के सूक्ष्मजीव मिले। चौंकाने वाली बात यह रही कि विश्लेषण किए गए 41 नमूनों में से 80 फीसदी से अधिक में ऐसे जीन के निशान मिले, जिनका संबंध एंटीबायोटिक प्रतिरोध से है। हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि इसका मतलब यह नहीं है कि मेट्रो में सफर करने वाले यात्रियों को संक्रमण का खतरा है।
रेलिंग से टिकट मशीन तक, हर सतह की अपनी माइक्रोब दुनिया
यह अध्ययन विज्ञान पत्रिका एमस्फीयर में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं ने चेन्नई मेट्रो के 12 स्टेशनों और ट्रेनों की अलग-अलग सतहों से सूक्ष्मजीवों के नमूने जुटाए। इनमें हाथ से छुई जाने वाली रेलिंग, टिकट वेंडिंग मशीनें, स्टेशन की सीढ़ियों की रेलिंग और टिकट काउंटर शामिल थे।
शोध के मुताबिक, टीम ने दिसंबर 2021 और जनवरी 2022 में कुल 96 नमूने इकट्ठा किए थे। इनमें से 47 नमूने शुरुआती गुणवत्ता जांच में सफल रहे, जबकि 41 नमूनों में पर्याप्त डीएनए मिलने के बाद उन्हें अंतिम विश्लेषण में शामिल किया गया।
अध्ययन में 30 ऐसी प्रमुख माइक्रोब प्रजातियां मिलीं, जो 97 फीसदी से ज्यादा नमूनों में मौजूद थीं। यानी मेट्रो की अलग-अलग सतहों पर कुछ सूक्ष्मजीव लगातार पाए गए। इसके अलावा शोधकर्ताओं ने एंटीबायोटिक प्रतिरोध से जुड़े 72 परिवारों के जीन की पहचान की।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के संकेत, लेकिन घबराने की जरूरत नहीं
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस यानी दवाओं के प्रति प्रतिरोध एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती है। सामान्य तौर पर एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया को मारने या उनकी बढ़ोतरी रोकने के लिए दी जाती हैं। लेकिन कुछ बैक्टीरिया में ऐसे गुण विकसित हो जाते हैं, जिनकी वजह से दवाएं उन पर असर नहीं कर पातीं। ऐसे संक्रमणों का इलाज मुश्किल हो सकता है। चेन्नई मेट्रो के नमूनों में रिफामाइसिन और सल्फोनामाइड जैसी एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध से जुड़े जीन अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में मिले।
लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है। शोधकर्ताओं ने डीएनए की सीक्वेंसिंग के जरिए इन जीन के निशान पहचाने हैं। इस तकनीक से यह पता नहीं चलता कि संबंधित बैक्टीरिया जीवित हैं या मृत। यह भी साबित नहीं हुआ कि ये जीन वास्तव में दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध पैदा कर रहे हैं या किसी यात्री तक पहुंचकर संक्रमण फैला सकते हैं।
शोध पत्र में शोधकर्ताओं का भी मानना है कि यह शुरुआती शोध है। शोध के मुताबिक, इन जीन के संकेत मिलना वास्तविक एंटीबायोटिक प्रतिरोध की पुष्टि नहीं करता। हालांकि उन्होंने इसे सावधानी बरतने का संकेत जरूर बताया।
चेन्नई के सूक्ष्मजीव बाकी शहरों से अलग
शोधकर्ताओं ने चेन्नई के नमूनों की तुलना दुनिया के 31 अन्य शहरों के उपलब्ध आंकड़ों से भी की। इसमें नौ ऐसी प्रजातियां मिलीं, जो चेन्नई में तुलनात्मक रूप से अधिक आम थीं, लेकिन दूसरे शहरों में उतनी ज्यादा नहीं पाई गईं।
इनमें कुछ बैक्टीरिया मिट्टी, पानी, हवा, पोल्ट्री के कचरे और मानव त्वचा जैसे अलग-अलग वातावरण से जुड़े हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि चेन्नई का समुद्र तटीय इलाका, गर्म मौसम और अधिक नमी इन सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी को प्रभावित कर सकते हैं। यह भारत की किसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की सतहों पर मौजूद सूक्ष्मजीवों का पहला व्यापक अध्ययन बताया गया है।
मेट्रो को कीटाणुमुक्त नहीं, सुरक्षित बनाना है लक्ष्य
दुनिया के कई शहरों में सार्वजनिक परिवहन की माइक्रोब दुनिया को समझने के लिए अध्ययन हो चुके हैं। 2015 में न्यूयॉर्क के सबवे, पार्कों और ग्वानस नहर से नमूने लेकर शोधकर्ताओं ने 1,688 तरह के सूक्ष्मजीवों की पहचान की थी। इसी तरह के प्रयासों से अंतरराष्ट्रीय मेटासब परियोजना की शुरुआत हुई, जो दुनिया के अलग-अलग शहरों में शहरी सूक्ष्मजीवों का अध्ययन करती है।
चेन्नई का यह शोध भी भविष्य के लिए एक शुरुआती आधार तैयार करता है। वैज्ञानिक अब अलग-अलग मौसमों में उन्हीं जगहों से दोबारा नमूने लेने की जरूरत बता रहे हैं। इससे पता चल सकेगा कि समय के साथ सूक्ष्मजीवों की दुनिया कैसे बदलती है।
शोध पत्र में शोधकर्ता का कहना है कि सार्वजनिक जगहों को पूरी तरह कीटाणुमुक्त बनाना न तो संभव है और न ही यही लक्ष्य होना चाहिए। असली जरूरत यह समझने की है कि वहां किस तरह के सूक्ष्मजीव मौजूद हैं और किन सतहों की नियमित सफाई ज्यादा जरूरी है।
फिलहाल इस अध्ययन का संदेश साफ है- मेट्रो की हर रेलिंग पर खतरा नहीं बैठा है, लेकिन वहां एक अदृश्य दुनिया जरूर मौजूद है। उसे समझना, उसकी निगरानी करना और जरूरत के मुताबिक सफाई करना ही समझदारी है।