सांस के जरिए ली जाने वाली नैनोमेडिसिन ने टीबी के इलाज में डाली नई जान

सांस के जरिए दी जाने वाली नई नैनोमेडिसिन तकनीक टीबी के इलाज को तेज, सटीक, आसान और अधिक प्रभावी बनाकर मरीजों के लिए नई उम्मीद पैदा कर रही है
नैनोपार्टिकल्स फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंचकर वहां छिपे टीबी बैक्टीरिया पर सीधे असर करते हैं और बेहतर परिणाम देते हैं।
नैनोपार्टिकल्स फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंचकर वहां छिपे टीबी बैक्टीरिया पर सीधे असर करते हैं और बेहतर परिणाम देते हैं।फोटो साभार: आईस्टॉक
Published on
सारांश
  • नई इनहेलेबल नैनोमेडिसिन तकनीक दवा को सीधे फेफड़ों तक पहुंचाकर टीबी के इलाज को अधिक सटीक और प्रभावी बनाती है।

  • इस प्रणाली में चारों टीबी दवाएं एक साथ दी जाती हैं, जिससे इलाज आसान होता है और मरीजों की दवा पालन क्षमता बढ़ती है।

  • नैनोपार्टिकल्स फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंचकर वहां छिपे टीबी बैक्टीरिया पर सीधे असर करते हैं और बेहतर परिणाम देते हैं।

  • यह तकनीक दवा को लीवर और रक्त प्रवाह से बचाकर दुष्प्रभाव कम करती है और शरीर पर दबाव घटाती है।

  • नई प्रणाली इलाज की अवधि घटाने, दवा प्रतिरोध रोकने और टीबी के वैश्विक नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

टीबी (क्षय रोग) एक बहुत पुरानी लेकिन आज भी खतरनाक बीमारी है। यह माइकोबैक्टेरियम ट्यूबरक्यूलोसिस नामक जीवाणु से फैलती है और मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है। हर साल दुनिया भर में लाखों लोग इससे संक्रमित होते हैं और कई लोगों की जान चली जाती है। इतने वर्षों के इलाज के बावजूद, टीबी आज भी पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पाई है। इसका एक बड़ा कारण है कि वर्तमान इलाज लंबा, कठिन और कई बार असुविधाजनक होता है।

नया शोध और नई उम्मीद

दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिक “विट्स एडवांस्ड ड्रग डिलीवरी प्लेटफॉर्म (डब्ल्यूएडीडीपी)” में एक नई तकनीक पर काम कर रहे हैं, जो टीबी के इलाज को आसान और प्रभावी बना सकती है। यह तकनीक एक “इनहेलेबल नैनोसिस्टम” है, यानी ऐसी दवा जिसे सांस के साथ अंदर लिया जा सके। इस नई प्रणाली में बहुत छोटे कण (नैनोपार्टिकल्स) होते हैं, जो दवा को सीधे फेफड़ों तक पहुंचाते हैं।

यह भी पढ़ें
दुनिया भर में हर साल 12 लाख से अधिक लोग टीबी से जान गंवा देते हैं
नैनोपार्टिकल्स फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंचकर वहां छिपे टीबी बैक्टीरिया पर सीधे असर करते हैं और बेहतर परिणाम देते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस तकनीक पर दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एनआरएफ) के वैज्ञानिकों के साथ साझेदारी में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के “मैक्सवेल सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी इनोवेशन” के इंपल्स प्रोग्राम के तहत काम किया जा रहा है।

टीबी का वर्तमान इलाज

अभी टीबी का इलाज चार मुख्य दवाओं से किया जाता है जिसमें रिफैम्पिसिन, आइसोनियाजिड, एथाम्बुटोल और पाइराजिनामाइड शामिल हैं। मरीजों को इन दवाओं को लगभग छह महीने तक नियमित रूप से लेना पड़ता है। इस दौरान कई लोगों को उल्टी, कमजोरी, लीवर की समस्या और नसों से जुड़ी परेशानियां होती हैं। इन दुष्प्रभावों के कारण कई मरीज बीच में ही दवा लेना बंद कर देते हैं, जिससे बीमारी और भी खतरनाक रूप ले सकती है।

यह भी पढ़ें
भारत में टीबी के इलाज पर भारी कीमत चुका रहे हैं रोगी, 7 से 9 सप्ताह देरी से शुरू होता है इलाज
नैनोपार्टिकल्स फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंचकर वहां छिपे टीबी बैक्टीरिया पर सीधे असर करते हैं और बेहतर परिणाम देते हैं।

नई तकनीक कैसे काम करती है

रिपोर्ट के मुताबिक, नैनोसिस्टम एक छोटे कंटेनर की तरह काम करता है, जिसमें चारों दवाएं एक साथ भरी जाती हैं। जब मरीज इसे सांस के जरिए अंदर लेता है, तो ये छोटे कण सीधे फेफड़ों तक पहुंचते हैं। वहां ये धीरे-धीरे दवा छोड़ते हैं और ठीक उसी जगह असर करते हैं, जहां टीबी के जीवाणु छिपे होते हैं।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि दवा शरीर के बाकी हिस्सों से होकर नहीं गुजरती। इससे दवा का नुकसान कम होता है और असर ज्यादा होता है। साथ ही, लीवर पर भी कम दबाव पड़ता है।

यह भी पढ़ें
अफ्रीका-एशिया में टीबी से पीड़ित पांच में से चार लोगों को नहीं होती लगातार खांसी
नैनोपार्टिकल्स फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंचकर वहां छिपे टीबी बैक्टीरिया पर सीधे असर करते हैं और बेहतर परिणाम देते हैं।

फेफड़ों में सीधा असर

टीबी के जीवाणु फेफड़ों के अंदर छोटे-छोटे हिस्सों में छिप जाते हैं, जहां सामान्य दवाएं आसानी से नहीं पहुंच पातीं। लेकिन यह नई तकनीक इन छिपे हुए स्थानों तक भी पहुंच सकती है। इससे इलाज ज्यादा सटीक और प्रभावी बनता है।

दवा को ट्रैक करने की सुविधा

इस नई प्रणाली की एक खास बात यह भी है कि वैज्ञानिक यह देख सकते हैं कि दवा शरीर में कहां जा रही है। इसके लिए विशेष इमेजिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है। इससे यह पता चलता है कि दवा सही जगह तक पहुंच रही है या नहीं। यह सुविधा इलाज को और बेहतर बनाने में मदद करती है।

यह भी पढ़ें
अब दलदल के कवकों की मदद से बहुत कम समय में होगा टीबी का उपचार, वैज्ञानिकों ने खोजा उपाय
नैनोपार्टिकल्स फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंचकर वहां छिपे टीबी बैक्टीरिया पर सीधे असर करते हैं और बेहतर परिणाम देते हैं।

इलाज को आसान बनाना

इस तकनीक का एक बड़ा उद्देश्य इलाज को आसान बनाना है। जब चारों दवाएं एक ही सिस्टम में मिल जाएंगी और सीधे फेफड़ों तक पहुंचेंगी, तो मरीज को बार-बार दवा लेने की जरूरत कम हो सकती है। इससे इलाज का समय भी कम हो सकता है और मरीज के लिए इसे पूरा करना आसान हो जाएगा।

टीबी और समाज

टीबी केवल एक बीमारी नहीं है, बल्कि यह समाज की समस्याओं से भी जुड़ी हुई है। गरीबी, खराब स्वास्थ्य सुविधाएं और जागरूकता की कमी इसके फैलाव को बढ़ाती हैं। लंबा इलाज होने के कारण कई लोग बीच में ही दवा छोड़ देते हैं, जिससे बीमारी और फैलती है।

यह भी पढ़ें
डब्ल्यूएचओ ने टीबी के उपचार के लिए स्क्रीनटीबी वेब-आधारित टूल किया जारी
नैनोपार्टिकल्स फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंचकर वहां छिपे टीबी बैक्टीरिया पर सीधे असर करते हैं और बेहतर परिणाम देते हैं।

भविष्य की दिशा

शोधकर्ताओं के कहना है कि यह नई तकनीक अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन इसके परिणाम उम्मीद जगाने वाले हैं। वैज्ञानिक इसे और बेहतर बनाने और वास्तविक मरीजों पर लागू करने की दिशा में काम कर रहे हैं। अगर यह सफल होती है, तो टीबी के इलाज में एक बड़ा बदलाव आ सकता है।

टीबी एक पुरानी लेकिन अब भी गंभीर बीमारी है। पारंपरिक इलाज में कई सीमाएं हैं, लेकिन नई नैनो तकनीक इन समस्याओं का समाधान दे सकती है। यह तकनीक दवा को सीधे फेफड़ों तक पहुंचाकर इलाज को तेज, आसान और प्रभावी बना सकती है। यदि यह सफल होती है, तो यह न केवल मरीजों की जिंदगी बचाएगी, बल्कि दुनिया को टीबी से मुक्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।

Related Stories

No stories found.
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in