भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाया नया एंटीवेनम; सांप के काटने से होने वाली मौतों पर रोक की उम्मीद

भारतीय वैज्ञानिकों ने कोबरा और किंग कोबरा के जहर से बचाव के लिए नया नैनोबॉडी आधारित एंटीवेनम तैयार किया, जिससे बेहतर इलाज की उम्मीद जगी है।
भारतीय वैज्ञानिकों ने कोबरा और किंग कोबरा के जहर से बचाव के लिए नया नैनोबॉडी आधारित एंटीवेनम विकसित किया है।
भारतीय वैज्ञानिकों ने कोबरा और किंग कोबरा के जहर से बचाव के लिए नया नैनोबॉडी आधारित एंटीवेनम विकसित किया है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारतीय वैज्ञानिकों ने कोबरा और किंग कोबरा के जहर से बचाव के लिए नया नैनोबॉडी आधारित एंटीवेनम विकसित किया है।

  • नया एंटीवेनम कई भारतीय कोबरा प्रजातियों के जहर को बेअसर करने में प्रभावी पाया गया और बेहतर इलाज की उम्मीद बढ़ी।

  • चूहों पर हुए परीक्षण में एंटीवेनम ने जहर के असर से बचाया और 30 मिनट बाद उपचार देने पर भी असर दिखाया।

  • यह तकनीक घोड़ों से बनाए जाने वाले पारंपरिक एंटीवेनम पर निर्भरता घटा सकती है और उत्पादन को अधिक सुरक्षित बना सकती है।

  • वैज्ञानिक भविष्य में अलग-अलग क्षेत्रों के खतरनाक सांपों के लिए जरूरत के अनुसार नए एंटीवेनम तैयार करने की योजना बना रहे हैं।

सांप का काटना भारत समेत दुनिया के कई देशों में एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या है। हर साल लाखों लोग सांप के काटने का शिकार होते हैं और बड़ी संख्या में लोगों की मौत या स्थायी विकलांगता हो जाती है। भारत में ही हर साल करीब 50 हजार लोगों की मौत सांप के काटने से होने की बात सामने आती है।

अब भारतीय वैज्ञानिकों ने इस समस्या से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज और डेनमार्क की टेक्निकल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक नया एंटीवेनम तैयार किया है। यह एंटीवेनम खास तरह के छोटे एंटीबॉडी टुकड़ों, जिन्हें नैनोबॉडी कहा जाता है, पर आधारित है।

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कई तरह के कोबरा के जहर पर असर

सांप की हर प्रजाति का जहर अलग होता है। जहर में मौजूद अलग-अलग विषैले पदार्थ शरीर के तंत्रिका तंत्र, खून और ऊतकों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही वजह है कि सभी सांपों के लिए एक ही तरह का एंटीवेनम बनाना आसान नहीं है।

शोधकर्ताओं ने ऐसा एंटीबॉडी मिश्रण तैयार किया है, जो भारत में पाई जाने वाली कई कोबरा प्रजातियों के जहर के खिलाफ काम करता है। प्रयोगों में इसने स्पेक्टेकल्ड कोबरा, मोनोकल्ड कोबरा और भारत में पाई जाने वाली दोनों किंग कोबरा प्रजातियों के जहर को बेअसर करने में प्रभावी क्षमता दिखाई। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन’ में प्रकाशित हुआ है।

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घोड़ों पर निर्भरता कम होगी

अभी इस्तेमाल होने वाला पारंपरिक एंटीवेनम आमतौर पर घोड़ों की मदद से तैयार किया जाता है। घोड़ों को सांप का जहर देकर उनके शरीर में बनने वाली एंटीबॉडी हासिल की जाती हैं। इसके बाद इन एंटीबॉडी को अलग करके एंटीवेनम तैयार किया जाता है।

इस प्रक्रिया में कई चुनौतियां हैं। अलग-अलग बैच में एंटीवेनम की गुणवत्ता में अंतर हो सकता है। इसके अलावा कुछ मरीजों में इसके इस्तेमाल से गंभीर साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं। कई बार मौजूदा एंटीवेनम उन सांपों के जहर पर कम प्रभावी होता है, जिनका जहर एंटीवेनम बनाने में इस्तेमाल किए गए सांपों से अलग होता है।

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नया तरीका इन समस्याओं को कम करने की उम्मीद जगाता है। वैज्ञानिक इन एंटीबॉडी को प्रयोगशाला में माइक्रोबियल और मानव-अनुकूल प्रणालियों की मदद से बड़ी मात्रा में तैयार कर सकते हैं। इसके लिए बार-बार घोड़ों को जहर देकर प्रतिरक्षित करने की जरूरत नहीं होगी।

सिर्फ थोड़ी मात्रा में एंटीबॉडी से असर

शोधकर्ताओं ने पांच नैनोबॉडी का एक मिश्रण तैयार किया। इन नैनोबॉडी ने सांप के जहर में मौजूद महत्वपूर्ण विषैले पदार्थों को पहचानकर उनसे जुड़ने की क्षमता दिखाई।

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इसके बाद वैज्ञानिकों ने चूहों पर इसका परीक्षण किया। जहर दिए जाने के बाद नैनोबॉडी मिश्रण से उपचार पाने वाले चूहों में सुरक्षा के अच्छे परिणाम मिले। खास बात यह रही कि जहर देने के करीब 30 मिनट बाद उपचार दिए जाने पर भी कई चूहे बच गए।

कुछ चूहों में जहर के कारण लकवे जैसे लक्षण दिखाई देने लगे थे। उपचार के बाद वे सामान्य स्थिति में लौट आए। हालांकि यह परिणाम अभी जानवरों पर हुए प्रयोगों तक सीमित है।

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भविष्य में और सांपों के खिलाफ बनाया जा सकता है एंटीवेनम

इस शोध की एक खास बात यह भी है कि वैज्ञानिकों ने पहले से तैयार कुछ एंटीबॉडी को भारतीय सांपों के जहर के खिलाफ इस्तेमाल किया और पाया कि वे संबंधित विषैले पदार्थों को भी पहचान सकती हैं। इससे भविष्य में अलग-अलग देशों और क्षेत्रों के लिए जरूरत के हिसाब से एंटीवेनम तैयार करने का रास्ता खुल सकता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी तकनीक में दूसरे खतरनाक सांपों के जहर के खिलाफ काम करने वाली नैनोबॉडी भी जोड़ी जा सकती हैं। इससे भविष्य में ऐसा व्यापक एंटीवेनम तैयार हो सकता है, जो भारत में सांप के काटने के प्रमुख मामलों में ज्यादा प्रभावी हो।

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अभी इंसानों पर परीक्षण बाकी

हालांकि यह खोज उम्मीद जगाने वाली है, लेकिन इसे आम मरीजों के इलाज में इस्तेमाल करने में अभी समय लगेगा। फिलहाल इसका परीक्षण चूहों में किया गया है। इंसानों में इस्तेमाल से पहले इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता की जांच के लिए क्लिनिकल ट्रायल जरूरी होंगे।

फिर भी वैज्ञानिकों की यह खोज सांप के काटने के इलाज में एक नए दौर की शुरुआत मानी जा रही है। अगर यह तकनीक मानव परीक्षणों में भी सफल रहती है, तो भविष्य में ज्यादा सुरक्षित, प्रभावी और क्षेत्र के हिसाब से तैयार किए जाने वाले एंटीवेनम का रास्ता खुल सकता है।

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