मधुमेह से भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है 11.4 लाख करोड़ डॉलर का बोझ
भारत में मधुमेह न केवल स्वास्थ्य बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ डाल रहा है। एक अध्ययन के अनुसार, मधुमेह के कारण भारत को 11.4 लाख करोड़ डॉलर का आर्थिक नुकसान हो सकता है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब 21.2 करोड़ भारतीय मधुमेह से पीड़ित हैं और 62 फीसदी मरीजों को इलाज नहीं मिल पा रहा है।
गौरतलब है कि मधुमेह एक ऐसी समस्या है, जिस दौरान रक्त में शर्करा की मात्रा कहीं ज्यादा बढ़ जाती है। मधुमेह जिसे 'डायबिटीज' या 'शुगर' भी कहा जाता है, एक तरह का मेटाबोलिक डिसऑर्डर है।
यह चयापचय संबंधी बीमारियों का एक समूह है जो अनुवाशिंक या फिर खराब खानपान और जीवनशैली के कारण हो सकती है। यह बीमारी तब होती है, जब शरीर के पैन्क्रियाज में इन्सुलिन की कमी हो जाती है, मतलब वहां कम मात्रा में इन्सुलिन पहुंचता है। इसकी वजह से खून में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है।
भारत में मधुमेह अब सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ा मामला नहीं रहा। यह देश की अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ डाल रहा है। इस बारे में किए एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पता चला है कि मधुमेह के कारण भारत को दुनिया में दूसरे सबसे बड़े आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है, जिसकी लागत 11.4 लाख करोड़ डॉलर आंकी गई है।
हालांकि अमेरिका इस मामले में पहले स्थान पर है, जहां मधुमेह से अर्थव्यवस्था को 16.5 लाख करोड़ डॉलर की चपत लग सकती है। वहीं चीन 11 लाख करोड़ डॉलर के साथ इस मामले में तीसरे स्थान पर है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया में करीब 83 करोड़ वयस्क मधुमेह से पीड़ित हैं, जिनमें से एक चौथाई से अधिक भारतीय हैं। मतलब की 21.2 करोड़ भारतीय इस बीमारी से जूझ रहे हैं। इसके बाद चीन में मधुमेह पीड़ितों की संख्या 14.8 करोड़ दर्ज की गई है। चिंताजनक बात यह है कि भारत में मधुमेह से पीड़ित करीब 62 फीसदी मरीजों को इलाज तक नहीं मिल पा रहा है।
अंदेशा है कि 2050 तक वैश्विक स्तर पर मधुमेह के साथ जिंदगी जीने को मजबूर लोगों का आंकड़ा बढ़कर 130 करोड़ पर पहुंच जाएगा।
देखा जाए तो यह दुनिया की सबसे आम गैर-संक्रामक बीमारियों में से एक है। हर दस में से एक वयस्क इससे प्रभावित है। मरीजों की तेजी से बढ़ती संख्या स्वास्थ्य व्यवस्था और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
गौरतलब है कि मधुमेह एक ऐसी समस्या है, जिस दौरान रक्त में शर्करा की मात्रा कहीं ज्यादा बढ़ जाती है। मधुमेह जिसे 'डायबिटीज' या 'शुगर' भी कहा जाता है, एक तरह का मेटाबोलिक डिसऑर्डर है।
यह चयापचय संबंधी बीमारियों का एक समूह है जो अनुवाशिंक या फिर खराब खानपान और जीवनशैली के कारण हो सकती है। यह बीमारी तब होती है, जब शरीर के पैन्क्रियाज में इन्सुलिन की कमी हो जाती है, मतलब वहां कम मात्रा में इन्सुलिन पहुंचता है। इसकी वजह से खून में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है।
यह अध्ययन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस (आईआईएएसए), हीडलबर्ग विश्वविद्यालय, वियना यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस, हावर्ड यूनिवर्सिटी, हुआझोंग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी सहित अन्य संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। इस अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं।
बीमारी नहीं, आर्थिक आपदा बनता मधुमेह
अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 2020 से 2050 के बीच भारत, अमेरिका सहित 204 देशों में मधुमेह के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण किया है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने केवल चिकित्सा पर हो रहे खर्च, बल्कि इसकी वजह से उत्पादकता में नुकसान और देखभाल की जिम्मेवारी के चलते पड़ रहे आर्थिक प्रभावों को भी शामिल किया है।
अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि वैश्विक स्तर पर मधुमेह की आर्थिक लागत करीब 10.2 लाख करोड़ डॉलर है, जोकि वैश्विक जीडीपी के करीब 0.2 फीसदी के बराबर है।
हालांकि अध्ययन के मुताबिक इसमें परिवार के सदस्यों द्वारा रोगी को दी जा रही मुफ्त देखभाल शामिल नहीं है। यदि इस देखभाल के आर्थिक प्रभाव को भी शामिल कर लिया जाए तो स्थिति कहीं ज्यादा गंभीर हो जाती है। इसके साथ ही मधुमेह की वैश्विक लागत बढ़कर 152,10,000 करोड़ डॉलर तक पहुंच जाती है, जो दुनिया के वार्षिक जीडीपी के करीब 1.7 फीसदी के बराबर है।
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि मधुमेह के कुल आर्थिक बोझ का 85 से 90 फीसदी हिस्सा अनौपचारिक देखभाल यानी परिवार या मरीज से जुड़े रिश्तेदारों द्वारा की जा रही देखभाल से जुड़ा है। इसकी वजह यह है कि इस बीमारी के मामले मौतों की तुलना में 30 से 50 गुणा अधिक हैं, यानी लोग लंबे समय तक मधुमेह के साथ जीवन जीने को मजबूर हैं।
भारत में बोझ इतना भारी क्यों?
अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता और वियना यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक्स एंड बिज़नेस के अर्थशास्त्री क्लॉस प्रेटनर का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है देखभाल करने वाले लोग अक्सर पूरी तरह या आंशिक रूप से काम छोड़ देते हैं, जिससे अतिरिक्त आर्थिक नुकसान होता है।
शोधकर्ताओं ने भारत, चीन अमेरिका में इसकी भारी लागत के मुख्य कारण को उजागर करते हुए लिखा है कि भारत, चीन में इसका कारण बड़ी संख्या में प्रभावित लोग हैं, जबकि अमेरिका में इलाज की भारी लागत और संसाधनों का नुकसान मुख्य वजह है।
अध्ययन में समृद्ध और कमजोर देशों के बीच मधुमेह के आर्थिक बोझ में मौजूद भारी अंतर को भी उजागर किया है। उच्च-आय वाले देशों में इलाज की लागत कुल आर्थिक बोझ का 41 फीसदी है, जबकि कम-आय वाले देशों में यह महज 14 फीसदी ही है।
मतलब कि कमजोर देशों में मरीजों को इलाज तक नहीं मिल रहा। इसलिए इलाज पर खर्च बहुत कम होता है। वहां ज्यादातर नुकसान इलाज न मिल पाने, कामकाज में कमी और देखभाल की मजबूरी से होता है।
कैंसर-अल्जाइमर से भी बड़ा खतरा
अध्ययन में इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि मधुमेह का आर्थिक प्रभाव कैंसर, डिमेंशिया या अल्जाइमर जैसी बीमारियों से भी अधिक है। इसकी वजह से यह दुनिया की सबसे महंगी और गंभीर दीर्घकालिक बीमारियों में से एक बन गई है।
शोधकर्ताओं ने जोर देकर कहा है कि मधुमेह को रोकने और उसके आर्थिक बोझ को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका स्वस्थ जीवनशैली को अपनाना है। नियमित शारीरिक गतिविधि और संतुलित आहार से इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इसके अलावा बीमारी की शुरुआती पहचान भी उतनी ही जरूरी है। शोधकर्ताओं ने पूरी आबादी के लिए मधुमेह की व्यापक जांच, तेज निदान और समय पर इलाज की अपील की है, ताकि जटिलताएं कम हों और लंबी अवधि के खर्चों को रोका जा सके।
शोधकर्ताओं के अनुसार ये कदम स्वास्थ्य और आर्थिक नुकसान दोनों को कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

