भारत में टीबी के खिलाफ गेमचेंजर साबित हो सकती है ‘फूड बास्केट’, बच सकती हैं 1.2 लाख जिंदगियां

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक प्रभावी टीका नहीं मिलता, तब तक पौष्टिक आहार ही टीबी के खिलाफ सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है।
फोटो: सीएसई
फोटो: सीएसई
Published on
सारांश
  • भारत में टीबी के खिलाफ लड़ाई में अब दवाओं के साथ-साथ पौष्टिक भोजन को भी सबसे असरदार हथियार माना जा रहा है।

  • भारतीय शोधकर्ताओं के सहयोग से किए एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि यदि भारत में टीबी के मरीजों और उनके परिवारों को नियमित ‘फूड बास्केट’ यानी पोषण सहायता दी जाए, तो देश में हर साल 1.2 लाख से ज्यादा मौतों को रोका जा सकता है।

  • शोधकर्ताओं के मुताबिक कुपोषण टीबी की सबसे बड़ी वजहों में से एक है, जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर संक्रमण और मौत का खतरा बढ़ा देता है। ऐसे में भोजन आधारित सहायता न केवल मरीजों की रिकवरी तेज करती है, बल्कि संक्रमण के फैलाव को भी कम कर सकती है।

  • शोध के अनुसार, हर 10,000 मरीजों को पोषण सहायता देने से 10,470 स्वस्थ जीवन वर्षों के नुकसान को टाला जा सकता है। खास बात यह है कि यह योजना बेहद किफायती भी है और कम खर्च में लाखों जानें बचा सकती है।

  • विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक प्रभावी टीका नहीं मिलता, तब तक पौष्टिक भोजन ही टीबी के खिलाफ सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है। ऐसे में भारत के लिए टीबी उन्मूलन की रणनीति में पोषण सहायता को केंद्र में लाना बेहद जरूरी हो गया है।

भारत में तपेदिक यानी टीबी महज एक बीमारी नहीं, बल्कि गरीबी, भूख और कमजोर शरीर की वह त्रासदी है, जो हर साल लाखों परिवारों को तोड़ देती है। दवाइयों और अस्पतालों के बीच अक्सर एक सबसे जरूरी चीज पीछे छूट जाती है, वह है भरपेट पौष्टिक आहार।

लेकिन अब देश में टीबी के खिलाफ जंग में दवाओं के साथ-साथ पोषण को भी सबसे प्रभावी हथियार माना जा रहा है। इसी कड़ी में किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि टीबी के मरीजों को नियमित पौष्टिक आहार सहायता दी जाए, तो इसकी मदद से भारत में हर साल 120,000 से ज्यादा जिंदगियों को बचाया जा सकता है।

यह अध्ययन केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों कमजोर शरीरों की आवाज है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भूख के कारण पहले ही हार मान चुकी होती है।

गौरतलब है कि टीबी सबसे घातक संक्रामक रोगों में से एक है, जिसे यक्ष्मा, तपेदिक, क्षयरोग, एमटीबी या ट्यूबरक्लोसिस जैसे कई नामों से जाना जाता है। यह बीमारी हवा के जरिए बैक्टीरिया ‘माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस’ के कारण फैलती है।

आमतौर पर यह बीमारी फेफड़ों को प्रभावित करती है, लेकिन शरीर के कई अन्य अंग भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। वैश्विक आंकड़ों पर नजर डालें तो यह बीमारी हर साल दस लाख से ज्यादा जिंदगियां निगल रही है। इसके साथ ही यह गंभीर सामाजिक, आर्थिक समस्याओं की भी वजह बन रही है।

यह भी पढ़ें
जानिए क्यों आती है टीबी के मरीजों को खांसी
फोटो: सीएसई

शोधकर्ताओं का कहना है कि भोजन आधारित यह सहायता न केवल लाखों जिंदगियां बचा सकती है, बल्कि यह कई महंगी चिकित्सीय योजनाओं की तुलना में कहीं अधिक किफायती और असरदार भी है। यह अध्ययन बोस्टन यूनिवर्सिटी और भारत के राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के सहयोग से किया गया है।

इसमें वाधवानी इंस्टीट्यूट फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मुंबई, जवाहरलाल स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली और लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन सहित कई अन्य संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं ने योगदान दिया है।

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल बीएमजे ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित हुए हैं।

टीबी की जड़ है कुपोषण

अध्ययन के मुताबिक कुपोषण तपेदिक का ऐसा सबसे बड़ा जोखिम कारक है, जिसे सुधारा जा सकता है। जब शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, तो उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ जाती है। ऐसे में संक्रमण तेजी से फैलता है, इलाज धीमा पड़ता है और मौत का खतरा बढ़ जाता है।

यह भी पढ़ें
क्यों मुफ्त इलाज, पोषण भत्ता होने के बावजूद भारत में टीबी मरीजों पर पड़ रहा है भारी बोझ
फोटो: सीएसई

एनटीईपी की पूर्व उप महानिदेशक उर्वशी सिंह का कहना है, “कुपोषण केवल टीबी की एक जटिलता नहीं, बल्कि इसकी बड़ी वजहों में से एक है। ऐसे में जब तक टीबी के प्रभावी टीके नहीं मिलते, तब तक पौष्टिक भोजन ही हमारे पास सबसे बड़ा हथियार है।" उनके मुताबिक टीबी प्रभावित परिवारों को खाद्य सहायता देना, टीबी खत्म करने की दिशा में सबसे असरदार कदमों में से एक हो सकता है।

पोषण से सुधरेगी सेहत, घटेंगी मौतें

अध्ययन में सामने आया है कि टीबी के हर 10,000 मरीजों को पोषण सहायता देने से बीमारी और असमय मौतों के कारण होने वाले 10,470 स्वस्थ जीवन वर्षों के नुकसान को टाला जा सकता है। ऐसे में यदि यह योजना देश भर में हर साल सामने आने वाले टीबी के 28 लाख मरीजों तक पहुंचाई जाए, तो इसकी मदद से भारत में सालाना टीबी से होने वाली 1,20,000 मौतों को रोका जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने इस बात की भी पुष्टि की है कि पौष्टिक आहार मरीजों की रिकवरी तेज करने के साथ संक्रमण के प्रसार को भी कम कर सकता है।

स्टडी रिपोर्ट में इस स्वास्थ्य लाभ को हासिल करने की लागत करीब 141 डॉलर प्रति व्यक्ति आंकी गई है, जो भारत के 550 डॉलर के तय मानक से काफी कम है। यानी यह योजना कम खर्च में ज्यादा जानें बचा सकती है। इससे संकेत मिलता है कि खाद्य सहायता टीबी से लड़ाई में बेहद किफायती और असरदार निवेश साबित हो सकती है।

यह भी पढ़ें
सालाना 12.5 लाख जिंदगियों को निगल रही यह बीमारी, डब्ल्यूएचओ ने अपनी तरह के पहले परीक्षण को दी मंजूरी
फोटो: सीएसई

अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और संक्रामक रोग विशेषज्ञ प्रणय सिन्हा का इस बारे में कहना है, “यह शोध दर्शाता है कि भारत में पोषण सहायता को बड़े स्तर पर लागू करना केवल जरूरी कदम ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन निवेश भी है। कई महंगे चिकित्सा उपायों की तुलना में कम खर्च में हर साल एक लाख से अधिक टीबी मौतों को रोका जा सकता है।“

अध्ययन में किए गए 94.4 फीसदी विश्लेषणों में यह पाया गया कि खाद्य सहायता टीबी मरीजों के स्वास्थ्य परिणाम बेहतर बनाने का बेहद प्रभावी तरीका है।

पहले के शोध भी दे चुके हैं मजबूत संकेत

यह निष्कर्ष 2023 में द लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन से भी मेल खाते हैं, जिसमें पाया गया था कि प्रोटीनयुक्त भोजन और मल्टीविटामिन देने से मरीजों के परिवारों में टीबी संक्रमण के नए मामले करीब 50 फीसदी तक घट गए थे।

इसी तरह मार्च 2025 में द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित एक स्टडी में सामने आया है कि यदि भारत में टीबी के आधे मरीजों और उनके परिवारों को साधारण फूड बास्केट और विटामिन सप्लीमेंट दिए जाएं, तो 2023 से 2035 के बीच टीबी से होने वाली करीब 3.61 लाख मौतों और 8.8 लाख मामलों को रोका जा सकता है। यह अगले एक दशक में टीबी से होने वाली कुल मौतों के 4.5 फीसदी और नए मामलों के दो फीसदी से अधिक के बराबर है।

ग्लोबल ट्यूबरक्लोसिस रिपोर्ट 2024’ के मुताबिक दुनिया में टीबी के जितने भी मामले सामने आते हैं, उनमें से आधे से अधिक (56 फीसदी) मामले भारत, इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस और पाकिस्तान में दर्ज किए गए हैं। यदि भारत की बात करें तो 2023 में दुनिया के एक चौथाई से अधिक मामले (26 फीसदी) भारत में सामने आए थे।

यह भी पढ़ें
टीबी की रोकथाम के उपायों में विफलता, 2035 तक 10 लाख मौतों की बन सकती है वजह
फोटो: सीएसई

टीबी एक ऐसी बीमारी है जिसका उपचार संभव है। हालांकि इसके बावजूद यह बीमारी हर साल लाखों लोगों की जान ले रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक 2023 में इसकी वजह से 12.5 लाख लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ग्लोबल ट्यूबरक्लोसिस रिपोर्ट 2025 के मुताबिक भारत में हर साल टीबी के सामने आने वाले मामलों में 21 फीसदी की कमी आई है। इसके साथ ही टीबी से पीड़ित मरीजों की संख्या 2015 में प्रति लाख आबादी पर 237 से घटकर 2024 में 187 पर पहुंच गई है। हालांकि इसके बावजूद 2025 तक टीबी मुक्त भारत का सपना अभी भी सपना ही बना हुआ है।

ऐसे में अध्ययन साफ संकेत देता है कि टीबी केवल दवाओं से खत्म नहीं होगी। इसके लिए इलाज के साथ भोजन, सामाजिक सहायता और बेहतर पोषण को भी बराबर महत्व देना होगा।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि भारत टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को तेजी से हासिल करना चाहता है, तो पोषण आधारित सहायता को राष्ट्रीय रणनीति का अहम हिस्सा बनाना होगा। क्योंकि कई बार पोषण से भरपूर थाली, किसी महंगी दवा से ज्यादा जिंदगी बचा सकती है।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in