

दुनिया भर में लगभग 30 करोड़ लोग दुर्लभ रोगों से पीड़ित हैं, जो वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती को दर्शाता है।
6,000 से 10,000 दुर्लभ रोग पहचाने जा चुके हैं, जिनमें लगभग 72 प्रतिशत आनुवंशिक कारणों से होते हैं।
आईसीडी-11 में करीब 5,500 दुर्लभ रोग शामिल हैं, जिससे पहचान और वर्गीकरण में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुधार हुआ।
100 से अधिक देशों में दुर्लभ रोग दिवस मनाया जाता है, जिससे वैश्विक जागरूकता और एकजुटता बढ़ती है।
मई 2025 में विश्व स्वास्थ्य सभा ने दुर्लभ रोगों को वैश्विक स्वास्थ्य प्राथमिकता घोषित करने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया।
दुर्लभ रोग दिवस या रेयर डिजीज डे हर साल फरवरी के अंतिम दिन मनाया जाता है। इस साल यह 28 फरवरी को मनाया जा रहा है और लीप वर्ष में 29 फरवरी को। इसे पहली बार साल 2008 में मनाया गया था। आज यह दिवस 100 से अधिक देशों में मनाया जाता है।
इस दिन का उद्देश्य दुर्लभ रोगों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और प्रभावित लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग करना है।
दुनिया में दुर्लभ रोगों की स्थिति
दुनिया भर में लगभग 30 करोड़ लोग किसी न किसी दुर्लभ रोग से पीड़ित हैं। लगभग 6,000 से 10,000 दुर्लभ रोग पहचाने जा चुके हैं। इनमें से करीब 72 प्रतिशत रोग आनुवंशिक (जेनेटिक) होते हैं। कई रोग बचपन में ही सामने आ जाते हैं।
हालांकि प्रत्येक रोग से पीड़ित लोगों की संख्या कम होती है, लेकिन सभी रोगों को मिलाकर यह संख्या बहुत बड़ी हो जाती है। इसलिए यह एक महत्वपूर्ण वैश्विक स्वास्थ्य का विषय है।
वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण कदम
मई 2025 में विश्व स्वास्थ्य सभा (डब्ल्यूएचए) ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया। इसमें दुर्लभ रोगों को वैश्विक स्वास्थ्य प्राथमिकता घोषित किया गया।
इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य समय पर सही जांच (डायग्नोसिस) सुनिश्चित करना, इलाज की सुविधा बढ़ाना, शोध और विशेष सेवाओं को मजबूत करना था।
यह निर्णय दुर्लभ रोगों से जूझ रहे लोगों के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
दुर्लभ रोग दिवस 2026 की थीम
दुर्लभ रोग दिवस 2026 की आधिकारिक थीम की पुष्टि अभी शेष है। वर्तमान जानकारी के अनुसार थीम "आपकी कल्पना से भी अधिक" है। यह थीम बताती है कि दुर्लभ रोगों का प्रभाव हमारी सोच से कहीं अधिक गहरा और व्यापक है।
इस थीम के मुख्य बिंदु -
30 करोड़ से अधिक लोगों की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक चुनौतियों को पहचानना
समय पर जांच और उपचार की समान सुविधा की मांग करना
जांच में देरी को कम करना
विशेष स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना
“दुर्लभ रोगों पर प्रकाश डालें” जैसे वैश्विक कार्यक्रमों के माध्यम से एकजुटता दिखाना
#रेयर डिजीज डे अभियान के जरिए जागरूकता फैलाना
वर्गीकरण और पहचान
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी अंतरराष्ट्रीय रोग वर्गीकरण (आईसीडी-11) में लगभग 5,500 दुर्लभ रोगों को शामिल किया गया है।
इस सूची को समय-समय पर अपडेट किया जाता है ताकि डॉक्टरों और शोधकर्ताओं को सही जानकारी मिल सके। सही वर्गीकरण से रोग की पहचान जल्दी हो सकती है और उपचार में मदद मिलती है।
भारत में दुर्लभ रोग
भारत में दुर्लभ रोग उन बीमारियों को कहा जाता है जो आबादी के बहुत छोटे हिस्से को प्रभावित करती हैं। इन रोगों के लिए विशेष जांच और विशेषज्ञ डॉक्टरों की आवश्यकता होती है। कई बार सही निदान में वर्षों लग जाते हैं। इलाज महंगा होता है और सभी को आसानी से उपलब्ध नहीं होता। सरकार और स्वास्थ्य संस्थाएं अब इन रोगों के प्रति अधिक जागरूक हो रही हैं और नीतियां बनाने पर काम कर रही हैं।
वैश्विक भागीदारी
दुर्लभ रोग दिवस पर दुनिया भर में कई गतिविधियां आयोजित की जाती हैं -
जागरूकता कार्यक्रम
वेबिनार और संगोष्ठियां
सामुदायिक कार्यक्रम
सोशल मीडिया अभियान
सरकारी स्तर पर नीति चर्चा
यह दिवस मरीजों, उनके परिवारों, डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं को एक मंच पर लाता है।
दुर्लभ रोग दिवस का प्रतीक जैब्रा (जेबरा) की धारियां हैं। चिकित्सा जगत में कहा जाता है कि “जब आप घोड़ों की आवाज सुनें तो जेबरा के बारे में न सोचें।” लेकिन यह दिवस याद दिलाता है कि कभी-कभी जेबरा भी हो सकता है, यानी दुर्लभ रोग भी संभव हैं।
इसका संदेश स्पष्ट है - हर मरीज महत्वपूर्ण है। समय पर जांच जरूरी है। सभी को समान इलाज का अधिकार है।
दुर्लभ रोग दिवस केवल एक दिन नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक आंदोलन है। 30 करोड़ से अधिक लोगों की आवाज को मजबूत करने का यह अवसर है।
“जितना आप सोच सकते हैं उससे कहीं ज्यादा” थीम हमें याद दिलाती है कि दुर्लभ रोगों का प्रभाव हमारी सोच से कहीं अधिक है। इसलिए समाज, सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों को मिलकर काम करना होगा, ताकि हर व्यक्ति को समय पर जांच, सही इलाज और बेहतर जीवन मिल सके।