आंदोलन या क्षणिक उत्तेजना?
शब्दकोश में “मेटामॉर्फोसिस” (रूपांतरण) शब्द की एक परिभाषा है, “रूप, चरित्र या परिस्थितियों में जबर्दस्त बदलाव।” ठीक यही रूपांतरण इस समय भारत में सबसे चर्चित पार्टी के साथ हुआ जिसे कॉकरोच जनता पार्टी कहा जा रहा है।
ऐसे समय में जब किसी सोशल मीडिया मंच पर पसंद या नापसंद का बटन दबाना वोटिंग मशीन का बटन दबाने से कहीं अधिक प्रभावशाली माध्यम बन गया है, तब यह नई “पार्टी” रातोंरात एक तंज से बदलकर ऐसा आह्वान बन गई है जिसके माध्यम से जेन-जी अपनी हताशा अथवा बेचैनी को अभिव्यक्त कर रहे हैं।
इसने अपना रूप और चरित्र बदल लिया है। इसकी लोकप्रियता ने एक नई हलचल पैदा कर दी है। पूरे देश में युवा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र बार-बार लीक होने के खिलाफ सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं। हाल के वर्षों में भारत ने युवाओं का ऐसा उभार सड़कों पर नहीं देखा था।
यह “पार्टी” अब अपने आभासी संसार से निकलकर सड़कों तक पहुंच रही है, इसके संस्थापक अभिजीत दिपके के नेतृत्व में दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से इसकी शुरुआत की गई। 30 वर्षीय दिपके बोस्टन विश्वविद्यालय के स्नातक हैं। जंतर-मंतर देश में विरोध दर्ज कराने के लिए निर्धारित राष्ट्रीय स्थल है। एक समाचार पत्र के अनुसार, दिपके ने कहा, “भारत के युवाओं में यह गहरी भावना है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था उनकी परवाह नहीं करती, चाहे वह सत्तारूढ़ दल हो या विपक्ष।”
6 जून को इस प्रदर्शन के दौरान जो उत्साह दिखाई दिया, वह किसी बड़े राजनीतिक जनसभा से कम नहीं था। इसमें निश्चित रूप से वही भावना दिखाई देती है जिसने हाल के वर्षों में दुनिया भर में, यहां तक कि भारत के पड़ोसी देशों में भी, जेन-जी के अनेक आंदोलनों को प्रेरित किया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह एक आंदोलन है या केवल एक क्षणिक घटना?
जेन-जी की जिन विशेषताओं की सबसे अधिक चर्चा होती है, उनमें मौजूदा व्यवस्थाओं के प्रति नाराजगी के प्रवृत्ति प्रमुख है। दुनिया के किसी भी हिस्से में किसी भी समय युवाओं को सत्ता परिवर्तन, महंगाई या जलवायु संकट जैसे मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन करते देखा जा सकता है। अनुमान है कि जेन-जी की आबादी 2.8 अरब है, जो विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग एक-तिहाई है। यह सबसे मुखर पीढ़ी है जो शासन व्यवस्थाओं से सामने चुनौती पेश करती है।
हाल के दशकों में युवाओं के प्रदर्शनों से शासन व्यवस्था, कानून और प्रशासनिक प्रद्धति में बदलाव हुए हैं। इतिहास गवाह है कि व्यापक जनभागीदारी वाले युवा आंदोलनों ने सत्ताएं उखाड़ी हैं जबकि अन्य कई आंदोलन पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण प्रभावहीन रह गए। एकजुटता के साथ हुए युवाओं के प्रयास अक्सर आंदोलन बन गए, जबकि कथित आंदोलन अस्थायी उथल-पुथल तक सीमित रहे।
युवाओं के आंदोलनों ने कई तानाशाही शासन व्यवस्थाओं को लोकतांत्रिक प्रणालियों में बदलने में भी भूमिका निभाई है। यही कारण है कि सत्ता में बैठे शासक हमेशा युवाओं द्वारा संचालित ऐसे क्षणों और आंदोलनों से भयभीत रहे हैं। शायद यही वजह है कि सामान्यतः शांतिपूर्ण युवा आंदोलनों को भी सत्ताधारी व्यवस्थाओं द्वारा हिंसक दमन का सामना करना पड़ता है।
हाल के वर्षों में जेन-जी के आंदोलनों में लोकतंत्र के प्रति बढ़ती निराशा दिखाई देती है, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं उनकी जरूरतों और चिंताओं के प्रति पर्याप्त रूप से संवेदनशील नहीं रही हैं। आमतौर पर अधिकांश आंदोलन किसी विशेष समय पर उत्पन्न किसी विशेष संकट से शुरू होते हैं और फिर व्यापक बदलाव लाने वाले आंदोलन का रूप ले लेते हैं। लेकिन उनकी दिशा एक ही रहती है। जेन-जी आंदोलन युवाओं की बात नहीं सुनने वाली शासन व्यवस्था को बात सुनने और कार्रवाई के लिए मजबूर करते हैं।
कुछ दुर्लभ मामलों में युवा आंदोलनों ने संगठित राजनीतिक संस्थाओं जैसे राजनीतिक दलों को भी जन्म दिया है। कॉकरोच जनता पार्टी के संदर्भ में यह एक महत्वपूर्ण पहलू है जिस पर नजर रखी जानी चाहिए क्योंकि यह आंदोलन एक अलग सामाजिक और तकनीकी संदर्भ में विकसित हो रहा है। कई अध्ययन बताते हैं कि ऐसे आंदोलन बहुत अनौपचारिक ढंग से संचालित होते हैं और अपने विचारों के प्रसार के लिए आधुनिक सोशल मीडिया मंचों का उपयोग करते हैं।
वर्ष 2000 से 2017 के बीच 128 देशों के लगभग 10 लाख लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 40 वर्ष से कम आयु के लोग अनौपचारिक राजनीतिक गतिविधियों को अधिक पसंद करते हैं। भारत में जो कुछ हम आज देख रहे हैं, वह इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है। अधिकांश आंदोलन किसी स्थापित राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं हैं।
भारत आज ऐसे युवा आंदोलनों का साक्षी बन रहा है जिन्हें उसने कई वर्षों से नहीं देखा था। ये केवल क्षणिक घटनाएं हैं या समय के साथ गहरे और प्रभावशाली आंदोलनों में बदल जाएंगी, इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में छिपा है।


