

साल बोरर का इतिहास बताता है कि वह लगभग 30 साल में महामारी का चक्र दोहराता है। पिछली महामारी 30 साल पहले 1996 में हुई थी। साल बोरर के मौजूदा प्रकोप को देखते हुए प्रतीत होता है कि संभवत: महामारी का चक्र लौट रहा है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि यदि किसी इकाई क्षेत्रफल में साल बोरर से ग्रसित वृक्ष एक प्रतिशत से अधिक रहते हैं तो उसे महामारी की शुरुआती अवस्था मानी जाती है।
मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) और 1990 के दशक में पेड़ काटने की सिफारिश करने वाली केंद्र सरकार द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से मना करने वाले तात्कालीन आईआईएफएम निदेशक राम प्रसाद का मानना है कि साल बोरर के प्रकोप से जुड़ी रिपोर्टें लगभग तीन दशक बाद फिर से उभर रहे एक बड़े पारिस्थितिक संकट को दर्शाती हैं।
इस आशंका को आंकड़े भी मजबूती देते हैं। डिंडोरी क्षेत्र के करंजिया रेंज में प्रकोप का इतिहास रहा है। इस साल भी यहां साल बोरर का गंभीर प्रकोप है। हाल ही में साल बोरर प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने वाले टीएफआरआई के वैज्ञानिकों ने पाया कि सर्वेक्षित क्षेत्र में साल बोरर का प्रकोप 30 से 35 प्रतिशत के आसपास है।
इसी तरह डिंडोरी के लगे मध्य प्रदेश के अन्य जिले अनूपपुर के अंतर्गत आने वाले अमरकंटक में भी शुरुआती सर्वेक्षण में साल बोरर का प्रभाव करीब 6.5 प्रतिशत आंका गया है। अमरकंटक के रेंजर वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने डाउन टू अर्थ को बताया कि शुरुआती सर्वे में जंगल के सभी 47 कंपार्टमेंट्स में 1 हेक्टेयर के सैंपल प्लॉट पर सर्वे किया गया था। इसमें साल के 6.5 प्रतिशत पेड़ों पर साल बोरर का प्रभाव देखा गया। 8,525 हेक्टेयर के जंगल वाले अमरकंटक में लगभग 40 लाख साल के पेड़ हैं।
अमरकंटक के उमर गोहान गांव में वन सुरक्षा समिति के अध्यक्ष रमेश कुमार परस्ते कहते हैं कि गांव में करीब 1,400 हेक्टेयर का जंगल है। इनमें करीब 80 प्रतिशत साल के वृक्ष हैं। उनके अनुमान के अनुसार, 25 से 30 प्रतिशत पेड़ इस वर्ष साल बोरर से प्रभावित नजर आ रहे हैं। उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया कि एक एकड़ के जंगल में कम से कम 300 पेड़ों पर साल बोरर का असर जरूर होगा।
वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, अमरकंटक का जलस्तर साल के पेड़ों के कारण ही बना हुआ है और मां नर्मदा की कृपा से यहां का वातावरण अच्छा रहता है। यहां के जंगल में साल बोरर यदा-कदा देखने को मिलता था। लेकिन हाल ही में कुछ पेड़ लगातार सूखे हुए मिले हैं। उनके अनुसार, “मीडिया और संत समाज के आवाज उठाने पर हमें ऊपर से सर्वेक्षण का निर्देश मिला। रिपोर्ट देने पर वैज्ञानिकों को दौरा करने भेजा गया। एसएफआरआई टीम को सैंपल प्लॉट का निरीक्षण कराया गया। शुरू में हमने हर कंपार्टमेंट के एक हेक्टेयर प्लॉट में सर्वेक्षण किया। वैज्ञानिकों ने पूरे कंपार्टमेंट 5-5 हेक्टेयर में रैंडम सर्वेक्षण की सलाह दी है। वह मानते हैं, “साल बोरर की मात्रा इस वर्ष बढ़ी है, लेकिन यह प्राकृतिक है। इसका कुछ न कुछ ट्रीटमेंट करना पड़ेगा। इसे पूरा समाप्त करने का यथासंभव प्रयास किया जाएगा।”
1990 के दशक में महामारी के वक्त अमरकंटक में एसडीओ के पद पर रहे ओजी गोस्वामी कहते हैं कि मैं साल बोरर को लेकर चिंतित हूं। अमरकंटक में लगभग 10,000–15,000 पेड़ों को चिन्हित किया गया है, जो कई वर्षों से प्रभावित हैं। इसकी एक रिपोर्ट भोपाल भेजी गई है। जब साल बोरर का हमला होता है, तो उसके अलग-अलग चरण होते हैं। प्रभावित पेड़ों का हम वर्गीकरण करते हैं। अगर पूरा पेड़ सूख गया है, तो वह जंगल के लिए उपयोगी नहीं रहता। अंततः उसे काटना ही पड़ता है। 1995 से 1998-99 के बीच प्रभावित पेड़ों को हटाया गया था। जंगल की सीमा से 5-7 किमी बाहर डिपो बनाए गए थे, ताकि संक्रमित लकड़ी दोबारा जंगल में न जाए।
गोस्वामी का कहना है कि उस समय सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के जज यहां आए थे और मैं उनसे मिला भी था। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश थे कि जिन पेड़ों का तना प्रभावित है, उन्हें काटा जाए और जिनके केवल पत्ते और शाखाएं प्रभावित हैं, उन्हें छोड़ा जाए। कई पेड़ जो उस समय प्रभावित माने गए थे, वे आज भी जीवित हैं। इसलिए किसी पेड़ को हटाने से पहले यह सोचना चाहिए कि क्या हटाना जरूरी है और क्या नहीं।
गोस्वामी का कहना है कि लगभग 100 सेमी गर्थ (परिधि) का पेड़ करीब 10,000 से 15,000 रुपए का होता है। ऐसा पेड़ 100-150 साल पुराना होता है। जब मैं 1980 में विभाग में आया था, तब साल के पेड़ के बारे में कहावत थी, “सौ साल खड़ा, सौ साल पड़ा, फिर भी नहीं सड़ा।” इसका मतलब है कि इसकी लकड़ी अत्यंत मजबूत है। पहले रेलवे स्लीपर साल की लकड़ी से बनते थे। मजबूती में यह सागौन के बराबर मानी जाती है।
उनके अनुसार, हमने देखा कि साल बोरर का असर ज्यादा बड़े और पुराने पेड़ों पर होता है। इसका कारण यह है कि 40-70 सेमी गर्थ वाले पेड़ों में नरम ऊतक और अधिक रस होता है, जो कीटों के लिए अनुकूल होता है। ट्री ट्रैप तकनीक बहुत महंगी है और इतने बड़े जंगल में व्यावहारिक नहीं है। इसलिए मिश्रित वन और प्रभावित पेड़ों को हटाना ही मुख्य उपाय हैं। कीटनाशक और फफूंदनाशक का प्रयोग प्रतिबंधित है। इसलिए वह विकल्प नहीं है। 1997 की महामारी की तुलना में मौजूदा प्रभाव काफी कम है। यह तब की तुलना का केवल 10-15 प्रतिशत है।
वैज्ञानिकों और वन विभाग के जुड़े अधिकारियों का मानना है कि महामारी के रूप में एक नियमित अंतराल पर साल बोरर का प्रकोप देखा जाता है। डिंडोरी वन विभाग की कार्य आयोजना 2014-24 के अनुसार, “क्षेत्र में औसतन 30 वर्ष के चक्र में साल बोरर का वृहद प्रकोप देखा गया है जिसमें मुख्यतः परिवक्व गोलाई वर्ग के वृक्ष प्रभावित होते हैं। मौजूदा कार्य आयोजना की अवधि के अंतिम वर्षों में साल बोरर के प्रकोप होने की आशंका है।”
अमरकंटक स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (आईजीएनटीयू) के पर्यावरण विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर शिवाजी चौधरी के अनुसार, संक्रमित पेड़ों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो चिंता की बात है। वह इसे क्षेत्र विशेष की महामारी मान रहे हैं।
स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वन विभाग के अधिकारी डिंडोरी में प्रभावित पेड़ों की संख्या मात्र 5,000 बता रहे हैं, लेकिन इस आंकड़े पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिस पैमाने पर डाउन टू अर्थ ने प्रभावित पेड़ों को देखा और सोनतीरथ सहित अन्य गांव में हालात समझे, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि यह संख्या कम आंकी गई है। स्थानीय लोग भी इस आंकड़े को वास्तविक स्थिति से बहुत कम बता रहे हैं।
वैज्ञानिक मानते हैं कि यह कीट पूरे जंगल को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। अभी इनकी इल्लियां पेड़ के तने के अंदर हैं, वे कितनी संख्या में हैं, यह कहना मुश्किल है। इस अवस्था में कीट को नियंत्रित करने का कोई उपाय नहीं है। वन विभाग अभी वेट एंड वॉच की रणनीति अपना रहा है। उसका अगला कदम 2025 के मॉनसून पर उठेगा।