साल बोरर की वापसी-5: बारिश और आर्द्रता ने तैयार की पृष्ठभूमि

वायुमंडल की आर्द्रता यदि 55 प्रतिशत के लगभग होती है तो मादा कीड़े द्वारा अंडे नहीं दिए जाते। इसी प्रकार यदि आर्द्रता 100 प्रतिशत होती है तो भी अंडे देने की संख्या में कमी पाई जाती है
अमरकंटक के उमरगोहान गांव में साल बोरर प्रभावित पेड़ दिखाते रमेश कुमार परस्ते। फोटोज: भागीरथ/सीएसई
अमरकंटक के उमरगोहान गांव में साल बोरर प्रभावित पेड़ दिखाते रमेश कुमार परस्ते। फोटोज: भागीरथ/सीएसई
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चौथी कड़ी में आपने पढ़ा : साल बोरर की वापसी-4 : क्या लौट रहा है महामारी का चक्र? । पढ़ें पांचवीं कड़ी -

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस वर्ष साल बोरर के पनपने की बड़ी वजह अधिक बारिश, अनुकूल तापमान और नमी हो सकती है। राज्य वन अनुसंधान संस्थान (एसएफआरआई) के वरिष्ठ शोध अधिकारी व वैज्ञानिक उदय होमकर के अनुसार,  इस वर्ष हम देख रहे हैं कि बारिश लंबे समय तक होती रही है। इस बारिश का असर साल बोरर के संक्रमण पर पड़ा है। उनके अनुसार, “लगभग 80 प्रतिशत आर्द्रता अंडे देने के लिए सबसे अनुकूल होती है।”

डिंडोरी की कार्य आयोजना 2014-24 के अनुसार, साल बोरर कीड़े की संख्या में वृद्धि मुख्य रूप से जलवायु पर निर्भर करती है। वायुमंडल की आर्द्रता यदि 55 प्रतिशत के लगभग होती है तो मादा कीड़े द्वारा अंडे नहीं दिए जाते। इसी प्रकार यदि आर्द्रता 100 प्रतिशत होती है तो भी अंडे देने की संख्या में कमी पाई जाती है। परन्तु यदि आर्द्रता 91 प्रतिशत होती है तो मादा कीड़ा 465 अंडे तक दे सकती है।

जुलाई एवं अगस्त के महीने में आर्द्रता 91 प्रतिशत के आसपास बनी रही तो मादा कीडों द्वारा बहुत अधिक संख्या में अंडे दिए जाएंगे जो लार्वा में परिवर्तित होंगे। वर्ष 1995-96 तथा 1996-97 में लगभग सम्पूर्ण प्रदेश में अच्छी वर्षा हुई थी। 1997 में जुलाई के महीने में मंडला जिले में वर्ष 1996 की अपेक्षा अधिक आर्द्रता रही है। इन परिस्थितियों ने साल बोरर को महामारी के रूप में  फैलने में मदद की।

2025 के मॉनसून में अनूपपुर, डिंडोरी और मंडला में सामान्य से क्रमश: 4,7 और 33 प्रतिशत अधिक बारिश हुई। वहीं मॉनसून के बाद इन जिलों में क्रमश:  127, 36 और 19 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई, जिससे कीट के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन गईं।

अमरकंटक के सेवानिवृत्त सब डिवीजनल ऑफिसर (एसडीओ) ओजी गोस्वामी भी मानते हैं कि मॉनसून में जून-जुलाई के आसपास साल बोरर के कीट उड़ने लगते हैं। यदि नमी अधिक हो, धूप कम पहुंचे और जंगल बहुत घना हो तो साल बोरर की संख्या बढ़ जाती है, खासकर शुद्ध साल के जंगलों में क्योंकि कीट का पूरा जीवन-चक्र पेड़ पर ही निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि 2025 में मॉनसून सामान्य से अधिक रहा है। पोस्ट मॉनसून भी बहुत बारिश हुई है। यह कीट के फैलाव का एक कारण हो सकता है।

नियंत्रण के उपाय 

साल बोरर को नियंत्रित करने के लिए फिलहाल एक ही तरीका चलन में है, जिसे वैज्ञानिक “ट्री ट्रैप ऑपरेशन” कहते हैं। इस ऑपरेशन के अंतर्गत वयस्क कीड़े पकड़ने का कार्य किया जाता है ताकि वह आगे प्रजनन न कर सके। जून-जुलाई के महीने में वर्षा शुरू होने के बाद जब कीड़े वृक्ष से बाहर निकलते हैं, तो इनको पकड़ने के लिए साल के 60-90 सेमी गोलाई वाले वृक्षों को काटा जाता है और 2-3 मीटर लम्बे लट्ठे बनाए जाते हैं।

इन लट्ठाें के दोनों किनारों पर 1-1 फीट भाग के छाल को पीट दिया जाता है, जिससे साल की छाल में उपस्थित रस बाहर निकल आता है। साल बोरर कीड़े इस रस की ओर बड़ी शीघ्रता से आकर्षित होते हैं और यह देख जाता है कि एक किलोमीटर तक की दूरी से उड़कर साल बोरर कीड़े इन लट्ठाें में आकर छाल का रस चूसने लगते हैं। रस चूसकर साल बोरर मदमस्त हो जाते हैं और उड़ नहीं पाते। इस दौरान इन्हें आसानी से मार दिया जाता है। आक्रमण सामान्य है, तो 2 हेक्टेयर क्षेत्र में एक ट्रैप लगाना पर्याप्त होगा, परंतु यदि आक्रमण अधिक है तो 2 हेक्टेयर क्षेत्र में एक से अधिक ट्रैप की आवश्यकता होती है।

इस प्रचलित विधि की बड़ी खामी यह है कि इसमें बड़े पैमाने पर स्वस्थ पेड़ों काे काटा जाता है। 1996-2001 की अवधि में इसका भारी विरोध हुआ था। डिंडोरी की कार्य आयोजना 2014-24 के अनुसार, वर्ष 1963-64 से 1977-78 के मध्य इस ऑपरेशन के दौरान 2,36,984 वृक्ष काटे गए थे। साल बोरर कीड़े रात्रि में प्रकाश के द्वारा भी आकर्षित होते हैं। 1996-1997 और 1997-1998 में डिंडोरी जिले के ग्रामीणों द्वारा प्रकाश की सहायता से काफी संख्या में कीड़े पकड़े गए थे।

साल बोरर के बार-बार होने वाले प्रकोपों के बावजूद इसके प्रभावी निवारक और उपचारात्मक उपायों के रूप में अब तक कोई ठोस सफलता नहीं मिल पाई है। जैविक नियंत्रण के उपाय और रासायनिक विधि से कीट नियंत्रण के तरीके जमीन पर नहीं उतर पाए हैं। डिंडोरी में 4,000 की आबादी वाले चौरादादर गांव के भरत पडवार चेताते हैं कि अगर साल बोरर का प्रकोप इसी तरह रहा, तो आने वाले 4–5 वर्षों में साल का पूरा जंगल खत्म हो जाएगा।

ओजी गोस्वामी ने अमरकंटक में साल बोरर के प्रकोप के मद्देनजर नीतिगत सुझावों का एक दस्तावेज तैयार किया है। इसमें उन्होंने कहा है कि अत्यधिक संक्रमित श्रेणी 1 के पेड़ों को काटकर तुरंत जंगल से हटाया जाए ताकि संक्रमण अधिक न फैले। कटे पेड़ों को जंगल में छोड़ने के बजाय कम से कम 5 किलोमीटर दूर निर्धारित डिस्पोजल जोन में ले जाकर नष्ट किया जाए।

चौरादादर गांव में साल बोरर प्रभावित पेड़
चौरादादर गांव में साल बोरर प्रभावित पेड़

उन्होंने सलाह दी है कि मॉनसून से पूर्व चयनित पेड़ों से ट्रैप ट्री ऑपरेशन चलाया जा और इन पेड़ों को संक्रमित होने के बाद समय से हटा दिया जाए ताकि कीट का प्रजनन चक्र टूट सके। जैविक उपायों के तौर पर कठफोड़वा, माइनर और प्रमुख पैरासिटॉइड्स के संरक्षण के लिए बायोशील्ड जोन विकसित किए जांए और एनटीएफपी आधारित समुदायों को जैविक नियंत्रण का हिस्सा बनाया जाए।

दीर्घकालिक उपाय के रूप में अत्यधिक क्षतिग्रस्त क्षेत्र में मिश्रित प्रजाति के पेड़ जैसे पीपल, बरगद, जामुन, तेंदू, करंज और अर्जुन लगाए जाएं क्योंकि साल बोरर का प्रभाव मिश्रित वनों पर कम होता है। गोस्वामी के अनुसार, प्रशासनिक सुधारों के रूप में कमिश्नर की अध्यक्षता में साल बोरर क्राइस टास्क फोर्स का गठन हो और डीएफओ, टीएफआरआई, जन प्रतिनिधि और स्थानीय गैर सरकारी संगठनों को इसमें शामिल किया जाए। बीमारी का अर्ली वार्निंग सिस्टम के तहत एआई (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) आधारित फॉरेस्ट हेल्थ मॉनिटनिंग ऐप विकसित किया जाए जहां फील्ड स्टाफ छाल, राल और छिद्रों की फोटो अपलोड कर सकें। साथ ही आग के अलर्ट की तरह ही साल बोरर के लिए भी मोबाइल आधारित अलर्ट से संक्रमण जल्दी पकड़ा जा सकता है।

गोस्वामी अंत में कहते हैं, “साल बोरर केवल वन्यजीव समस्या नहीं बल्कि यह पूरी पारिस्थितिकी, जल स्रोतों, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत के लिए खतरा है। इसका समाधान वैज्ञानिक हस्तक्षेप, सामुदायिक भागीदारी और सख्त प्रशासनिक कार्रवाई के संयुक्त मॉडल से ही संभव है।”

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