

मध्य प्रदेश में साल वृक्षों पर मंडराया साल बोरर का खतरा नया नहीं है। देश के विभिन्न भागों में साल बोरर के आक्रमण की जानकारी पिछले 125 वर्षों से मिलती रही है। सबसे पहले इस कीड़े को वर्ष 1889 में देखा और पहचाना गया और साल वृक्षों में अधिक हानि होने का प्रमुख कारण इस कीड़े को माना गया। तब से आज तक विभिन्न प्रदेशों में साल बोरर के 25 एपिडेमिक (प्रकोप) दर्ज हैं। कुछ अध्ययन 21 एपिडेमिक की बात कहते हैं। इंडियन जर्नल ऑफ एंटोमॉलोजी में 2018 में प्रकाशित नितिन कुलकर्णी, आनंद दास और सुभाष चंदर के अध्ययन में कहा गया है कि साल बोरर को कीट के रूप में पहचाने जाने के बाद से 1977 तक कुल 87 छोटे-बड़े एपिडेमिक सामने आ चुके हैं।
डिंडोरी के वर्किंग प्लान 2014-24 के अनुसार, मध्यप्रदेश में वर्ष 1905 में बालाघाट के बैहर क्षेत्र के साल वनों में इस कीड़े का प्रकोप सर्वप्रथम देखा गया। वर्ष 1916 में देहरादनू वन मंडल के थानों क्षेत्र के साल वनों में भी इस कीड़े का प्रकोप हुआ। मध्य प्रदेश के मंडला क्षेत्र के आसपास के वनों में 1923-28 के दौरान करीब 70 लाख साल वृक्ष इस कीट से प्रभावित हुए थे। इसके बाद 1950-55, 1959-62, 1979-82 और 1996-2001 की अवधि में यह प्रकोप साल वनों में महामारी के रूप में पाया गया। 1996-2001 के दौरान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ क्षेत्र में इसके प्रकोप से 3 लाख हेक्टेयर साल वन में लगभग 31.40 लाख साल वृक्ष प्रभावित हुए थे।
1990 के दशक में फैली यह महामारी डिंडोरी वनमंडल के परिक्षेत्र बजाग एवं करंजिया के साल वनों से फैलनी शुरू हुई और धीरे-धीरे तत्कालीन मंडला जिले (तब डिंडोरी मंडला का हिस्सा था) में अधिकांश साल वनों तथा निकटवर्ती जिलों के वनों में फैल गई। वर्किंग प्लान में कहा गया है कि इसका प्रभाव बढ़ने की प्रथम सूचना जून, 1993 में डिंडोरी वनमंडल में मिली। वर्ष 1994-1995 में डिंडोरी वनमंडल में प्रभाव स्पष्ट होने लगा, किंतु कुछ क्षेत्रों में ही संक्रमण के चिह्न दिखाई पड़े थे। डिंडोरी वनमंडल के कुछ क्षेत्रों में प्रभावित वृक्षों की गणना की गई जिसमें 2,646 वृक्ष प्रभावित पाए गए। वर्ष 1996-1997 में मंडला जिले में प्रभावित क्षेत्र में संक्रमित वृक्षों की गणना कराई गई। प्रभावित वृक्षों की गणना का कार्य जनवरी 1997 से जून 1997 तक किया गया। 30 जून 1997 तक 7,11,059 वृक्ष डिंडोरी जिले में प्रभावित हो चुके थे।
वर्ष 1997-98 में वर्ष 1996-97 की अपेक्षा साल बोरर कीटों तथा उनसे प्रभावित वृक्षों की संख्या में लगभग 3 गुना वृद्धि हुई और प्रभावित पेड़ों की संख्या 22 लाख से ऊपर पहुंच गई। 1995 से 2000 तक साल बोरर के प्रकोप से डिंडोरी वनमंडल का 1,47,279 हेक्टेयर रकबा प्रभावित हुआ। मध्य प्रदेश के वन विभाग में डिप्टी वन संरक्षक रहे यू प्रकाशम के अध्ययन “हार्टवुड बोरर एपिडेमिक्स इन सेंट्रल इंडिया: ए थ्रेट टू शोरिया रोबस्टा फॉरेस्ट इकोसिस्टम” के अनुसार, अकेले डिंडोरी और मंडला फॉरेस्ट डिवीजन में 25.6 लाख प्रभावित पेड़ों में से 15.90 लाख पेड़ों को काटा गया।
यू प्रकाशम के अध्ययन के अनुसार, बड़े पैमाने पर वृक्ष कटान के विरुद्ध विभिन्न वर्गों द्वारा आपत्तियां व्यक्त की गईं तथा इस विषय पर जबलपुर उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई। इसके परिणामस्वरूप भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (एमओईएफ) ने दिसंबर 1997 में एक समिति का गठन किया, जिसमें केंद्र एवं राज्य सरकारों के वरिष्ठ वन अधिकारी, वन कीटविज्ञानी तथा अनुसंधान संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल थे। इस समिति का नेतृत्व भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई), देहरादून के महानिदेशक ने किया। समिति का उद्देश्य महामारी के कारणों, क्षति की सीमा तथा उपचारात्मक उपायों का अध्ययन करना था। प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण करने के बाद समिति ने मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें श्रेणी 1-5 तक के प्रभावित वृक्षों को हटाने की संस्तुति की गई। पेड़ काटने की समिति की सिफारिश पर कुछ लोगों ने सवाल उठाया तो मंत्रालय ने एक टास्क फोर्स तथा एक स्टीयरिंग समिति का गठन किया। टास्क फोर्स ने जनवरी 1998 में अपनी अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें 14 सदस्यीय समिति के बहुमत ने श्रेणी 1-5 तक के सभी वृक्षों को काटने एवं हटाने के पक्ष में अनुशंसा की। हालांकि कुछ लोगों को मत था कि केवल श्रेणी 1 एवं 2 के वृक्षों को ही काटा जाना चाहिए। टास्क फोर्स की संस्तुतियों पर विचार करने के बाद मंत्रालय ने श्रेणी 1, 2, 3 और 6 के वृक्षों की कटाई की अनुमति प्रदान की।
23 फरवरी 1998 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सभी कटान कार्यों पर रोक लगा दी। सुनवाई के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय ने प्रभावित वृक्षों की श्रेणी-वार चिन्हांकन का आदेश दिया तथा टीएफआरआई, जबलपुर के निदेशक के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेणी 1, 2 और 6 के प्रभावित वृक्षों की कटाई की अनुमति प्रदान की। साल बोरर प्रभावित वृक्षों को 1-8 श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है। श्रेणी 1 का वृक्ष पूरी तरह सूखा होता है, श्रेणी 2 वृक्ष की पत्तियां सूखकर भूरे रंग की हो जाती हैं, श्रेणी 3 वृक्ष का ऊपरी हिस्सा अथवा शिखर सूखने लगता है, श्रेणी 4 के वृक्ष के मुख्य तने के पास बुरादे का 7 सेमी से अधिक का ढेर होता है लेकिन शिखर पर नई शाखांए हरी रहती हैं, श्रेणी 5 के वृक्ष शिखर का आधा भाग जीवित तथा शेष भाग मुरझाया रहता है, श्रेणी 6 वृक्ष का केवल ठूंठ मिलता है और उसके चारों ओर बुरादे का ढेर रहता है, श्रेणी 7 के वृक्ष का शिखर जीवित और हरा रहता है और तने से प्रचुर मात्रा में राल निकलती है और श्रेणी 8 का वृक्ष स्वस्थ होता है।
मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) राम प्रसाद के अनुसार, 1996-2001 की अवधि में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) और भारतीय वन प्रबंध संस्थान (आईआईएफएम) जैसे संस्थानों के वानिकी वैज्ञानिकों और वन अधिकारियों के बीच उपयुक्त नियंत्रण उपायों को लेकर अलग-अलग मत सामने आए थे। उस समय लाखों पेड़ प्रभावित हुए थे और संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए लगभग एक लाख पेड़ों को काटना पड़ा था।
डिंडोरी के गाढ़ासरई में रहने वाले डॉक्टर विजय चौरसिया 1990 के दशक में फैली महामारी को याद करते हुए बताते हैं कि उन दिनों यहां बना डिपो एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा डिपो बन गया था। कोई व्यापारी साल बोरर प्रभावित लकड़ी खरीदने को तैयार नहीं था। उन्होंने आगे बताया कि 1997 में डिंडोरी में साल का इतना घना जंगल था कि हमेशा अंधेरा रहता था। साल बोरर ने उस घने जंगल को काफी हद तक कम कर दिया। वह बताते हैं कि उस समय काटे गए पेड़ों की अब तक भरपाई नहीं हो पाई है।
1996-2001 कालखंड के बाद साल बोरर के प्रकोप की लगातार सूचनाएं मिलती रही हैं। टीएफआरआई के फॉरेस्ट एंटोमोलाॅजी डिवीजन से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक एन रॉयचौधरी के अध्ययन के अनुसार, 2006 में छत्तीसगढ़ के बस्तर फॉरेस्ट डिवीजन के कॉलेंग रेंज के रिजर्व फॉरेस्ट में 116 पेड़ और अवर्गीकृत वनों में 118 पेड़ साल बोरर से प्रभाव से सूख गए। 2009-2010 में डिंडोरी वनमंडल के पूर्व करंजिया रेंज में लगभग 21.17 हेक्टेयर में 292 वृक्ष साल बोरर से प्रभावित पाए गए। 2013-14 में छत्तीसगढ़ के जगदलपुर सरगीपाल काष्ठागार में 1,493 पेड़ साल बोरर प्रभावित पेड़ मिले। 2013 में ही डिंडोरी वनमंडल के पूर्व करंजिया, दक्षिण समनापुर और बजाग फॉरेस्ट रेंज में 699 ऐसे पेड़ मिले। 2014 में मंडला के कान्हा टाइगर रिजर्व के कोर और बफर जोन में कुल 22,997 साल बोरर प्रभावित पेड़ों को देखा गया। 2014 में ही छत्तीसगढ़ के चिल्पी और कवर्धा रेंज में 8,862 और आमाबाड़ा रेंज में 724 पेड़ों पर साल बोरर का प्रभाव देखा गया।