आहार संस्कृति: मिठाई धनिए की

धनिए के बीजों का इस्तेमाल स्वादिष्ट खुशबूदार मिठाई बनाने में किया जा सकता है
कृष्ण जन्माष्टमी के दौरान अक्सर धनिए से बनी बर्फी बनाई जाती है लेकिन इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है
कृष्ण जन्माष्टमी के दौरान अक्सर धनिए से बनी बर्फी बनाई जाती है लेकिन इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है(फोटो: विभा वार्ष्णेय/सीएसई)
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सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) द्वारा आयोजित पत्रकारों के वार्षिक प्रशिक्षण कार्यक्रम “अनिल अग्रवाल डायलॉग” में इस वर्ष प्रतिभागियों के लिए आयोजित एक विशेष भोज में हमने धनिए के बीजों से बनी मिठाई परोसी। यह कोई नई रेसिपी नहीं थी। यह मिठाई अक्सर कृष्ण जन्माष्टमी के दौरान तैयार की जाती है लेकिन इसे बहुत कम लोगों ने पहले चखा था। केवल धनिए के बीज, बारीक पिसे सूखे नारियल (चूर्ण), चीनी और घी से बनी यह बर्फी सुगंधित और स्वादिष्ट दोनों है। यह मिठाई शरीर को ठंडक देती है और इसका आनंद आप भीषण गर्मियों में भी ले सकते हैं।

धनिए के बीज जो ज्यादातर सब्जी और दाल जैसी नमकीन रेसिपी में इस्तेमाल होते हैं, मीठे व्यंजनों में भी चार चांद लगा देते हैं। इसका श्रेय इसमें मौजूद एक रसायन लिनालूल को दिया जाता है। धनिए के बीज से निकाले गए तेल में लगभग 50 से 70 प्रतिशत तक लिनालूल होता है। मसाले के इस तत्व को पश्चिमी देशों में भी पहचाना गया है और वहां धनिए का उपयोग अक्सर मफिन और केक में किया जाता है।

खुशबूदार धनिया एपिएसी परिवार से संबंधित है, जिसमें गाजर, अजवाइन और सौंफ जैसे सदस्य भी शामिल हैं। भारत में धनिया आमतौर पर सब्जी और दाल में मसाले के रूप में उपयोग किया जाता है, जहां इसके दरदरे पिसे हुए बीज भोजन का जायका बढ़ाते हैं और तरी को गाढ़ा भी करते हैं।

इसके पौधे को हिंदी और पंजाबी में धनिया, बंगाली और ओडिया में धना, गुजराती में कोथमिरी, कन्नड़ में कोथंबरी और तमिलनाडु में कोथमाल्ली के नाम से जाना जाता है। कश्मीर में इसे दियानीवाल और आंध्र प्रदेश में धनिएलु कहा जाता है। धनिया एक उष्णकटिबंधीय फसल है और इसे रबी के मौसम में आसानी से उगाया जा सकता है। भारत में मुख्य धनिया उत्पादक राज्य आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश हैं। व्यावसायिक रूप से इसकी खेती मोरक्को, रूस, पूर्वी यूरोपीय देशों, फ्रांस, मध्य अमेरिका, मैक्सिको और अमेरिका में भी की जाती है। माना जाता है कि धनिया की उत्पत्ति भूमध्यसागरीय और मध्य पूर्वी क्षेत्रों, मुख्यत: इजराइल में हुई थी। इसके बीज इजराइल के प्राचीन नाहल हेमर गुफा स्थल पर पाए गए हैं, जो 6,000 ईसा पूर्व के हैं। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में रोमनों द्वारा इसके उपयोग के उदाहरण मिलते हैं, जो इसका उपयोग शराब, अचार, ब्रेड और मांस को स्वादिष्ट बनाने के लिए करते थे। यूनानियों ने भी इस मसाले का उपयोग किया और इसका नाम ग्रीक शब्द “कोरिस” से लिया गया है, जिसका अर्थ है “खटमल” क्योंकि हरे धनिया में खटमल जैसी गंध आती है।

मिस्रवासी धनिया को “खुशी का मसाला” कहते थे और इसके बीज रामसेस द्वितीय और तूतनखामेन के मकबरों में पाए गए हैं। इस मसाले का उल्लेख वेदों और संस्कृत लेखन (क्रमशः 6000 ईसा पूर्व और 1500 ईसा पूर्व) में मिलता है। लंबे समय से इसका उपयोग स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली औषधि के रूप में किया जाता रहा है। इसके बीजों का उपयोग पेट की गैस दूर करने, मूत्रवर्धक, पित्तनाशक और कामोत्तेजक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

31 दिसंबर, 2025 को प्रिवेंटिव न्यूट्रिशन एंड फूड साइंस जर्नल में प्रकाशित नए शोध के अनुसार, धनिया टाइप 2 मधुमेह के रोगियों में ग्लाइसेमिक इंडेक्स, लिपिड प्रोफाइल और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को सुधारने में मदद करता है। बीज और हरे पत्ते दोनों ही भारतीय खानपान का अभिन्न हिस्सा हैं। इसका पौधा छोटा होता है जिसमें सफेद फूल लगते हैं। इनमें गोलाकार, मटमैले-भूरे रंग के फल निकलते हैं। इन्हें दबाने पर वे दो भागों में टूट जाते हैं और इन टूटे हुए फलों के अंदर बीज होते हैं जिनको भूनकर, नमक और नींबू के साथ मिलाकर धना दाल नामक एक कुरकुरा, स्वादिष्ट और तरोताजा करने वाला स्नैक बनाया जाता है जो पाचन में सहायक होता है। माउथ फ्रेशनर के रूप में भी इसका इस्तेमाल होता है। धनिया पत्तों को अमेरिका में “सिलेंट्रो” कहा जाता है, जिनका उपयोग करी और सूप को सजाने और स्वादिष्ट बनाने के लिए किया जाता है।

धनिया टाइप 2 मधुमेह के रोगियों में ग्लाइसेमिक इंडेक्स, लिपिड प्रोफाइल और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को सुधारने में मदद करता है

भारत में कुछ साल पहले एक ऑनलाइन याचिका दायर की गई थी जिसमें इसे राष्ट्रीय मसाला घोषित करने की मांग की गई थी। हालांकि ऐसा नहीं हुआ, शायद इसलिए कि यह मूलरूप से भारतीय नहीं है। वहीं दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर इसके प्रति नफरत जताने वाले समूह भी हैं, जैसे फेसबुक पर “आई हेट कॉरिएंडर” पेज है जिसके 3.29 लाख फॉलोअर्स हैं। 24 फरवरी को इंटरनेशनल “आई हेट कोरिएंडर डे” भी मनाया जाता है। धनिया पत्तों के प्रति यह नफरत विज्ञान की मदद से समझी जा सकती है। 2 मई 2012 को फ्लेवर नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोधपत्र में कनाडा में रहने वाले विभिन्न जातीय समूहों के 1,639 युवाओं पर किए गए एक सर्वेक्षण के परिणाम बताए गए थे। प्रतिभागियों से कहा गया कि वे 9 बिंदु के पैमाने पर धनिए के प्रति अपनी पसंद और नापसंद दर्ज करें। परिणामों से पता चला कि 21 प्रतिशत पूर्वी एशियाई, 17 प्रतिशत काकेशियन, 14 प्रतिशत अफ्रीकी, 7 प्रतिशत दक्षिण एशियाई, 4 प्रतिशत हिस्पैनिक और 3 प्रतिशत मध्य-पूर्वी लोगों को हरा धनिया पसंद नहीं था।

इसी जर्नल में 29 नवंबर 2012 को प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में यूरोपीय मूल के 26,000 से अधिक लोगों पर किए गए सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताए गए। उनसे पूछा गया था कि वे इसे पसंद करते हैं या नापसंद। शोधकर्ताओं ने पाया कि क्रोमोसोम 11 पर स्थित एक न्यूक्लियोटाइड है जिसका वेरिएंट ये तय करता है कि आपको पत्ता स्वादिष्ट लगेगा या साबुन की तरह। उन्हें यह भी पता चला कि इस रिसेप्टर जीन ओआर6ए2 का तालमेल खुशबू पहचानने की क्षमता से है। हालांकि पत्तों की चटनी पीसने से अप्रिय स्वाद वाले रसायन टूट जाते हैं और शायद यही कारण है कि भारत में इस हरी पत्ती को खाने का सबसे सामान्य तरीका चटनी के रूप में ही है। मैं भी उन लोगों में से हूं जिन्हें पत्तों का स्वाद पसंद नहीं है। पर मुझे इसके बीजों से कोई आपत्ति नहीं और मैं धनिए के बीज से बनी बर्फी का आनंद ले सकती हूं।

व्यंजन : धनिए के बीज की बर्फी

सामग्री

  • धनिए के बीज (साबुत): 100 ग्राम

  • नारियल कद्दूकस किया गया : 100 ग्राम

  • चीनी : 300 ग्राम

  • घी : 2 बड़े चम्मच

  • सूखे मेवे (काजू, चिरौंजी, खरबूजे के कटे हुए बीज): 1/2 कप

विधि: बीजों को घी में भूनें। पैन से निकालकर ठंडा करें और फिर पीस लें। नारियल के चूरे को भी खुशबू आने तक कुछ मिनट भूनें। अब एक पैन में आधा कप पानी और चीनी डालकर चाशनी बनाएं। जब चाशनी गाढ़ी हो जाए तो भुना हुआ धनिया, नारियल और सूखे मेवे डालकर जल्दी से मिलाएं। अब इस मिश्रण को घी लगी प्लेट में फैलाएं, ऊपर से सूखे मेवे डालें और सेट होने दें। जब मिश्रण थोड़ा नरम हो, तब मनचाहे आकार के टुकड़ों में काट लें।

हमारी थाली में परोसा जाने वाला भोजन स्वाद के साथ इतिहास भी परोसता है। यह किताब खानपान के इतिहास, राजनीति और संस्कृति पर एक साथ दृष्टि डालती है। किताब भोजन के जरिए होने वाली साजिशों पर रोशनी डालती है।

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