

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पर्यावरण राहत कोष कोष के उपयोग का पूरा ब्योरा मांगते हुए स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक धन का वर्षों तक निष्क्रिय पड़े रहना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि 2021 तक इस कोष में करीब 1,000.69 करोड़ रुपये जमा हो चुके थे, लेकिन सरकार के पास इसकी वर्तमान राशि का भी स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
इतना ही नहीं, अदालत ने यह भी पाया कि पर्यावरण राहत कोष योजना, 2008 के बावजूद अब तक इस फंड से किसी भी पीड़ित को राहत राशि दिए जाने का कोई ठोस रिकॉर्ड सामने नहीं आया।
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को विस्तृत हलफनामा दाखिल कर यह बताने का निर्देश दिया है कि यह धन किस उद्देश्य से और कितना उपयोग किया गया। यह मामला केवल वित्तीय पारदर्शिता का नहीं, बल्कि उन लोगों के अधिकारों का भी है जो पर्यावरणीय और औद्योगिक त्रासदियों के बाद समय पर राहत के हकदार थे।
देश में पर्यावरण सुरक्षा और औद्योगिक हादसों से प्रभावित लोगों को तुरंत राहत देने के उद्देश्य से एकत्र किए करोड़ों रुपए के फण्ड के इस्तेमाल पर शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह पर्यावरण राहत कोष के उपयोग को लेकर विस्तृत हलफनामा दाखिल करे। 21 जुलाई 2026 को अदालत ने यह स्पष्ट करने को कहा कि इस कोष के इस्तेमाल के लिए यदि कोई योजना बनाई गई है, तो उसका पूरा ब्योरा पेश किया जाए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के सदस्य सचिव और केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वे अदालत को इस कोष के उपयोग से जुड़ी पूरी जानकारी उपलब्ध कराएं।
क्या है पूरा मामला और क्यों उठे हैं सवाल
यह मामला लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 (पब्लिक लायबिलिटी इंश्योरेंस एक्ट, 1991) के तहत एकत्र किए गए पर्यावरण राहत कोष के उपयोग या लंबे समय से उसके उपयोग न होने से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि 2021 तक इस कोष में करीब 1,000.69 करोड़ रुपए जमा किए जा चुके थे। हालांकि, सरकार के पास इसकी ताजा राशि की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 'पर्यावरण राहत कोष योजना, 2008 (द एनवायर्नमेंटल रिलीफ फंड स्कीम, 2008)' बनाई गई थी, लेकिन रिकॉर्ड से ऐसा प्रतीत होता है कि इस योजना के तहत अब तक एक भी रुपया जरूरतमंदों या पीड़ितों को वितरित नहीं किया गया।
अदालत ने यह भी कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास सुरक्षित पड़े इस फंड का किस सीमा तक अपने मूल उद्देश्यों के लिए उपयोग हुआ है, इसका कोई भी स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं आया है।
अब सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से यह स्पष्ट हो गया है कि पर्यावरण राहत के नाम पर वर्षों से जमा सार्वजनिक धन का हिसाब देना होगा। साथ ही यह भी बताना होगा कि जिन पीड़ितों के लिए यह कोष बनाया गया था, उन्हें आखिर अब तक इसका लाभ क्यों नहीं मिल सका।