तेल का खेल: मुसीबत भी, जरूरत भी; अमेजन के जंगलों में आदिवासियों की दुविधा

अमेजन के जंगलों में तेल बना आदिवासियों की मजबूरी: पर्यावरण बचाने और बेहतर जिंदगी की जरूरतों के बीच फंसे समुदायों के सामने आसान नहीं है सही फैसला
इक्वाडोर के अमेजन में तेल परियोजनाएं आदिवासी क्षेत्रों और दुनिया के सबसे समृद्ध जैव-विविध इलाकों से टकरा रही हैं।
इक्वाडोर के अमेजन में तेल परियोजनाएं आदिवासी क्षेत्रों और दुनिया के सबसे समृद्ध जैव-विविध इलाकों से टकरा रही हैं।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • इक्वाडोर के अमेजन में तेल परियोजनाएं आदिवासी क्षेत्रों और दुनिया के सबसे समृद्ध जैव-विविध इलाकों से टकरा रही हैं।

  • स्थानीय क्विचुआ समुदाय तेल से होने वाले प्रदूषण के खतरे के बावजूद रोजगार, मुआवजे और बुनियादी सुविधाओं की उम्मीद रखते हैं।

  • नापो नदी का प्रदूषण तेल कंपनियों के लिए विरोधाभासी स्थिति बनाता है, जहां तेल समस्या भी है और समाधान भी।

  • यासुनी-आईटीटी पहल अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मदद नहीं मिलने से विफल हुई, जिसके बाद 2016 में क्षेत्र में तेल उत्पादन शुरू हुआ।

  • 2023 के जनमत संग्रह में इक्वाडोरवासियों ने आईटीटी परियोजना रोकने का समर्थन किया, लेकिन स्थानीय समुदायों में समर्थन कायम रहा।

दक्षिण अमेरिका के इक्वाडोर में अमेजन के घने जंगल सिर्फ पेड़ों और नदियों का संसार नहीं हैं। यह हजारों आदिवासी परिवारों का घर भी है। लेकिन इसी जंगल के नीचे छिपा तेल अब उनके लिए एक बड़ी दुविधा बन गया है। तेल निकालने से जंगल, नदियां और वन्यजीव प्रभावित होते हैं, फिर भी कई स्थानीय आदिवासी समुदाय तेल कंपनियों का विरोध नहीं करते। आखिर क्यों?

इस सवाल का जवाब इक्वाडोर की निचली नापो नदी के किनारे बसे क्विचुआ समुदायों की जिंदगी में छिपा है।

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जंगल बचाना है, लेकिन जिंदगी भी चलानी है

इन समुदायों के इलाके उस तेल क्षेत्र से जुड़े हैं जिसे इशपिंगो-ताम्बोकोचा-तिपुतिनी यानी आईटीटी परियोजना के नाम से जाना जाता है। यह इलाका यासुनी नेशनल पार्क का हिस्सा है और दुनिया के सबसे जैव-विविध क्षेत्रों में गिना जाता है।

तेल निकालने से नदी में प्रदूषण, जंगलों की कटाई और वन्यजीवों के आवास को नुकसान पहुंचने का खतरा है। इसके बावजूद स्थानीय लोगों के सामने सवाल केवल पर्यावरण बचाने का नहीं है। यह अध्ययन जियोफोरम नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

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उन्हें साफ पानी चाहिए। बेहतर अस्पताल चाहिए। बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा चाहिए। बिजली, सड़क और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं चाहिए। परिवार की जिंदगी थोड़ी आसान बनाने के लिए नाव, गैस चूल्हा और घर की छत जैसी चीजें भी चाहिए। एक स्थानीय व्यक्ति ने इस भावना को बहुत सीधे शब्दों में कहा -“आदिवासी लोगों को भी आगे बढ़ने का अधिकार है।”

तेल रोकें या सुविधा पाएं?

यहीं से असली दुविधा शुरू होती है। तेल कंपनी जहां पहुंचती है, वहां वह सिर्फ मशीनें और ड्रिलिंग उपकरण नहीं लाती। उसके साथ रोजगार, मुआवजा, पैसा और स्कूल, स्वास्थ्य तथा पानी जैसी सुविधाओं के वादे भी आते हैं।

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2017 में जब तेल की खोज एक समुदाय में पहुंची, तो यह पूछना कि “आप तेल परियोजना का विरोध करेंगे या समर्थन?” स्थानीय लोगों को ही अजीब लगा।

एक स्थानीय प्रतिनिधि ने सवाल किया - अगर गांव में शौचालय तक नहीं हैं, तो तेल का विरोध कैसे करें? यानी उनके सामने विकल्प साफ नहीं था, एक तरफ तेल से होने वाला पर्यावरणीय नुकसान था और दूसरी तरफ रोजमर्रा की जिंदगी की जरूरतें।

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तेल बना समस्या भी और समाधान भी

इस कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि तेल यहां एक साथ समस्या भी है और समाधान भी। नापो नदी में प्रदूषण का असर उन समुदायों तक पहुंच रहा है जहां अभी तेल परियोजना सीधे शुरू भी नहीं हुई। दूसरी ओर, जिन गांवों की जमीन तेल परियोजना के दायरे में आती है, उन्हें कंपनी से मुआवजे और सुविधाओं की उम्मीद रहती है।

यानी प्रदूषण का असर दूर तक जाता है, लेकिन उसका मुआवजा अक्सर वहीं पहुंचता है जहां तेल की परियोजना सीधे मौजूद होती है। कुछ गांवों ने तेल कंपनी से सबसे पहले साफ पीने का पानी मांगा। विडंबना देखिए - जिस उद्योग से नदी के प्रदूषित होने का डर है, उसी से नदी के पानी के बदले साफ पानी की मांग की जा रही है।

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यासुनी की बड़ी लड़ाई

तेल और पर्यावरण की यह बहस केवल गांवों तक सीमित नहीं रही। 2007 में इक्वाडोर ने यासुनी-आईटीटी पहल शुरू की थी। प्रस्ताव था कि देश के तेल भंडार का करीब 20 प्रतिशत जमीन के नीचे ही छोड़ दिया जाए। इसके बदले अंतरराष्ट्रीय समुदाय से 3.6 अरब डॉलर की मदद मांगी गई थी।

इससे अनुमानित 40.7 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन रोका जा सकता था और यासुनी की अनोखी जैव-विविधता बचाई जा सकती थी। लेकिन पर्याप्त आर्थिक मदद नहीं मिलने के कारण 2013 में यह योजना खत्म हो गई और 2016 में आईटीटी क्षेत्र में तेल उत्पादन शुरू हो गया।

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इसके खिलाफ युवाओं के नेतृत्व में यासुनीदोस आंदोलन खड़ा हुआ। आखिरकार 2023 में हुए राष्ट्रीय जनमत संग्रह में इक्वाडोर के लोगों ने आईटीटी परियोजना में तेल उत्पादन रोकने के पक्ष में मतदान किया।

विरोध न दिखे तो संघर्ष खत्म नहीं होता

फिर भी निचली नापो नदी के छह क्विचुआ समुदायों में स्थानीय स्तर पर तेल को लेकर समर्थन बना रहा। 2023 में भी शोधकर्ताओं को वहां तेल परियोजनाओं के प्रति समर्थन दिखाई दिया। इसका मतलब यह नहीं कि इन लोगों को जंगल या नदी की चिंता नहीं है। असल कहानी इससे कहीं ज्यादा जटिल है।

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जब किसी समुदाय के सामने साफ पानी, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें हों, तो पर्यावरण बचाने का फैसला आसान नहीं रहता। तेल उनके लिए विनाश का खतरा भी है और बेहतर जीवन की उम्मीद भी।

अमेजन की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि हर संघर्ष सड़क पर दिखाई नहीं देता। कभी-कभी संघर्ष इस बात का होता है कि नुकसान झेलते हुए भी अपनी जिंदगी को थोड़ा बेहतर कैसे बनाया जाए। यही वजह है कि तेल परियोजना की “स्वीकृति” को सिर्फ समर्थन मान लेना गलत होगा। इसके पीछे मजबूरी, उम्मीद, सौदेबाजी और बेहतर भविष्य की चाह - सब एक साथ मौजूद हो सकते हैं।

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