

प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) के दूसरे चरण में केवल सौर ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के लक्ष्य तय करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए परियोजनाओं की तैयारी, वित्तपोषण, बिजली ग्रिड की उपलब्धता और किसानों को होने वाले वास्तविक लाभों पर ध्यान देना जरूरी है।
पर्यावरण के क्षेत्र में तीन दशक से भी अधिक समय से काम कर रही संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने योजना के नए चरण की रूपरेखा तैयार करते समय इन पहलुओं को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई है।
सीएसई ने 27 अक्टूबर को आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार ‘रीडिजाइनिंग पीएम-कुसुम 2.0’ में योजना के पहले चरण के अनुभवों और अगले चरण की चुनौतियों पर चर्चा की। सीएसई का कहना है कि पीएम-कुसुम 2.0 को आवंटन आधारित क्रियान्वयन के बजाय परियोजनाओं की वास्तविक तैयारी और उनके परिणामों पर केंद्रित होना चाहिए। योजना की सफलता का आकलन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि कितनी परियोजनाएं वास्तव में काम कर रही हैं और उनसे किसानों को कितना लाभ मिल रहा है।
वेबिनार में सीएसई के नवीकरणीय ऊर्जा कार्यक्रम के प्रबंधक बिनीत दास ने कहा, “पीएम-कुसुम के पहले चरण का समापन मार्च 2026 में हुआ। इसके विभिन्न घटकों के तहत प्रगति एकसमान नहीं रही। घटक बी के तहत स्वतंत्र रूप से संचालित होने वाले सौर पंप लगाए जाते हैं। इसके तहत लगभग 11.9 लाख पंप लगाए जा चुके हैं, जो निर्धारित लक्ष्य का करीब 90 प्रतिशत है। घटक ए के तहत विकेंद्रीकृत, ग्रिड से जुड़े सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किए जाते हैं। इस घटक के तहत 10,000 मेगावाट के लक्ष्य के मुकाबले लगभग 2,400 मेगावाट क्षमता के संयंत्र लगाए गए हैं। घटक सी के तहत भी राज्यों और क्रियान्वयन के विभिन्न मॉडलों के आधार पर प्रगति अलग-अलग रही है। जहां बिजली की मांग और ग्रिड की परिस्थितियां अनुकूल हैं, वहां फीडर स्तर पर सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना एक बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकने वाला विकल्प है।”
सीएसई के अनुसार, दूसरे चरण में परियोजनाओं को मंजूरी या आवंटन देने से पहले उनकी तैयारी का आकलन किया जाना चाहिए। इसमें जमीन तक पहुंच और उसके उपयोग की स्थिति, बिजली ग्रिड की क्षमता, जरूरी मंजूरियां, उपकरणों की खरीद की योजना और वित्तपोषण की व्यवस्था की जांच शामिल होनी चाहिए।
परियोजना की तैयारी से जुड़े इन पहलुओं की अनदेखी होने पर क्रियान्वयन में देरी हो सकती है। इसलिए सौर ऊर्जा क्षमता आवंटित करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि परियोजना को जमीन पर उतारने के लिए आवश्यक परिस्थितियां मौजूद हैं।
किसानों के अधिकारों की रक्षा हो
पीएम-कुसुम 2.0 में कृषि भूमि पर खेती के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एग्रीवोल्टाइक्स को शामिल करने की संभावना है। इस व्यवस्था के तहत एक ही जमीन पर फसल उगाने और सौर बिजली पैदा करने की गतिविधियां साथ-साथ की जा सकती हैं।
हालांकि, सीएसई का कहना है कि ऐसी परियोजनाओं की संरचना फसलों की जरूरतों, स्थानीय जलवायु और कृषि कार्यों के अनुरूप होनी चाहिए। सौर पैनलों की ऊंचाई, उनके बीच की दूरी और खेत में मशीनों की आवाजाही जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना होगा, ताकि बिजली उत्पादन के लिए खेती प्रभावित न हो।
योजना में अलग-अलग आकार की जोत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल मॉडल भी होने चाहिए। छोटे किसानों और पट्टे पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसानों को वित्तपोषण तथा पात्रता संबंधी बाधाओं का सामना न करना पड़े, इसके लिए विशेष व्यवस्था जरूरी है।
इसके अलावा, सौर पंपों से सिंचाई की लागत घटने पर भूजल का इस्तेमाल बढ़ने की आशंका भी है। इसलिए सौर सिंचाई को जल प्रबंधन के उपायों से जोड़ना जरूरी होगा, ताकि सस्ती ऊर्जा के कारण भूजल का अनियंत्रित दोहन न बढ़े।
योजना के तहत सौर ऊर्जा परियोजनाओं को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए बिजली दरों और भुगतान व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। सीएसई के मुताबिक, परियोजनाओं की लागत का आकलन करते समय जमीन, संरचनाओं, ग्रिड से जुड़ाव, वित्तपोषण, संचालन, रखरखाव और बीमा पर होने वाले पूरे खर्च को शामिल किया जाना चाहिए।
प्रतिस्पर्धी निविदाओं में भी वास्तविक लागत के अनुरूप मानकों का इस्तेमाल होना चाहिए। बिजली की दर इतनी होनी चाहिए कि परियोजना आर्थिक रूप से टिकाऊ बनी रहे और उसके लिए जरूरी वित्तीय संसाधन जुटाए जा सकें।
बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की ओर से भुगतान में देरी भी एक बड़ी बाधा बन सकती है। इससे परियोजना विकासकर्ताओं के लिए कर्ज चुकाने में कठिनाई बढ़ सकती है और उधार लेने की लागत भी बढ़ सकती है। इसके समाधान के लिए बिलिंग और भुगतान की स्पष्ट समयसीमा, भरोसेमंद भुगतान सुरक्षा व्यवस्था और लंबित बिलों के निपटारे की पारदर्शी प्रक्रिया जरूरी है।
किसानों को होने वाला लाभ बने सफलता का पैमाना
वेबिनार में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईआईएसडी) की नीति सलाहकार प्रियामी दत्ता ने कहा, “पीएम-कुसुम 2.0 की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होगा कि कृषि भूमि पर कितनी सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित की गई, बल्कि इस बात से होगा कि अपनी जमीन पर निर्भर किसानों के लिए कितने ठोस लाभ पैदा किए जा सके।”
सीएसई के नवीकरणीय ऊर्जा कार्यक्रम के प्रबंधक बिनीत दास ने कहा कि पीएम-कुसुम 2.0 को आवंटन आधारित क्रियान्वयन से आगे बढ़कर परियोजनाओं की तैयारी और परिणामों पर आधारित व्यवस्था अपनानी चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि योजना के लिए एक एकीकृत प्रदर्शन डैशबोर्ड बनाया जाए। इसमें परियोजना को मंजूरी मिलने और निविदा जारी होने से लेकर उसके चालू होने और संचालन तक की स्थिति दर्ज की जाए। इसके साथ वित्तपोषण, सब्सिडी वितरण, बिजली उत्पादन, ऊर्जा के उपयोग, ग्रिड की उपलब्धता, उपकरणों के बंद रहने की अवधि और रखरखाव की जानकारी भी उपलब्ध होनी चाहिए।
डैशबोर्ड पर किसानों को मिलने वाले वास्तविक लाभों का भी आकलन किया जाना चाहिए। इनमें बिजली खर्च में बचत, अतिरिक्त आय, फसल की पैदावार और पानी के इस्तेमाल में बदलाव जैसे संकेतक शामिल हो सकते हैं।
दास के मुताबिक, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय और अन्य संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय की जानी चाहिए। स्वतंत्र मूल्यांकन के जरिए यह सत्यापित किया जाना चाहिए कि परियोजनाएं भरोसेमंद ढंग से काम कर रही हैं या नहीं और उनसे कृषि तथा पर्यावरण संबंधी अपेक्षित लाभ मिल रहे हैं या नहीं।
सीएसई का मानना है कि पीएम-कुसुम के अगले चरण में परियोजनाओं की संख्या और स्थापित क्षमता के साथ-साथ किसानों की आय, कृषि ऊर्जा की विश्वसनीयता और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ इस्तेमाल को भी प्राथमिकता देनी होगी।