

नई तकनीक से पेरोव्स्काइट ट्रिपल-जंक्शन सौर सेल की दक्षता 30.1 प्रतिशत पहुंची, स्वतंत्र परीक्षण में दक्षता 29.3 प्रतिशत दर्ज हुई।
वैज्ञानिकों ने अधिक बैंडगैप वाली पेरोव्स्काइट परत की असमान क्रिस्टलीकरण और सतही झुर्रियों की समस्या को नई प्रक्रिया से कम किया।
सॉल्वेंट उपचार और ओलेइलअमोनियम क्लोराइड के इस्तेमाल से फिल्म की सतह चिकनी हुई और ब्रोमाइड-आयोडाइड का वितरण ज्यादा समान हुआ।
सौर सेल ने 569 घंटे के लगातार परीक्षण के बाद अपनी शुरुआती दक्षता का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बरकरार रखा।
शोधकर्ता बड़े आकार के, हल्के और लचीले पेरोव्स्काइट सौर मॉड्यूल विकसित करने तथा अंतरिक्ष में उनकी विश्वसनीयता जांचने की तैयारी कर रहे हैं।
सौर ऊर्जा के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने एक अहम उपलब्धि हासिल की है। चीन और ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं ने ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जिससे पेरोव्स्काइट आधारित तीन-परत वाले सौर सेल की दक्षता 30 प्रतिशत से अधिक पहुंच गई है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तकनीक से भविष्य में हल्के, पतले और लचीले सौर पैनल बनाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
यह अध्ययन नानजिंग विश्वविद्यालय, नेशनल इनोवेशन इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है। अध्ययन के परिणाम वैज्ञानिक पत्रिका नेचर एनर्जी में प्रकाशित किए गए हैं।
पेरोव्स्काइट क्या है?
आज बाजार में उपलब्ध ज्यादातर सौर सेल सिलिकॉन से बने होते हैं। सिलिकॉन तकनीक काफी विकसित हो चुकी है, लेकिन वैज्ञानिक अब ऐसी नई सामग्रियों की तलाश कर रहे हैं, जो सूर्य की रोशनी से अधिक ऊर्जा पैदा कर सकें और भविष्य में सौर पैनलों की लागत तथा वजन कम करने में मदद करें।
पेरोव्स्काइट ऐसी ही एक सामग्री है। इसकी खास क्रिस्टल संरचना के कारण यह सूर्य की रोशनी को बिजली में बदलने के लिए उपयोगी मानी जाती है। इसकी एक बड़ी खासियत यह है कि अलग-अलग पेरोव्स्काइट परतों को अलग-अलग बैंडगैप के साथ तैयार किया जा सकता है।
तीन परतों से ज्यादा रोशनी का इस्तेमाल
साधारण सौर सेल सूर्य के प्रकाश के एक सीमित हिस्से को ही प्रभावी ढंग से बिजली में बदल पाते हैं। इसके विपरीत, मल्टी-जंक्शन सौर सेल में अलग-अलग बैंडगैप वाली कई परतें लगाई जाती हैं। हर परत सूर्य के प्रकाश के अलग हिस्से को इस्तेमाल करती है।
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने तीन पेरोव्स्काइट परतों वाला सौर सेल तैयार किया। इसे ट्रिपल-जंक्शन सौर सेल कहा जाता है। इसमें तीन परतों के बैंडगैप लगभग 2.0, 1.60 और 1.22 इलेक्ट्रॉन वोल्ट रखे गए थे। हालांकि सबसे ऊपरी और अधिक बैंडगैप वाली पेरोव्स्काइट परत बनाना वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती थी।
ज्यादा ब्रोमाइड से आती थी समस्या
इस ऊपरी परत में ब्रोमाइड की मात्रा अधिक होती है। इसके कारण सामग्री के क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया समान नहीं रहती थी। सतह पर झुर्रियां बन जाती थीं और ब्रोमाइड तथा आयोडाइड अलग-अलग क्षेत्रों में जमा होने लगते थे। इससे सौर सेल में ऊर्जा का नुकसान बढ़ता था और उसका प्रदर्शन प्रभावित होता था।
शोधकर्ताओं ने इस समस्या को दूर करने के लिए एक नई क्रिस्टलीकरण तकनीक अपनाई। इसमें खास तरह के सॉल्वेंट का इस्तेमाल किया गया और थोड़ी मात्रा में ओलेइलअमोनियम क्लोराइड मिलाया गया।
नई प्रक्रिया से बनी चिकनी परत
शोधकर्ता के अनुसार, सामान्य स्थिति में ब्रोमाइड से भरपूर सतह पहले जमने लगती है, जबकि इसके नीचे का पदार्थ अभी गीला रहता है। इससे सतह असमान हो जाती है।
नई प्रक्रिया में सॉल्वेंट की मदद से सतह को दोबारा व्यवस्थित और चिकना किया गया। वहीं क्लोराइड ने ब्रोमाइड और आयोडाइड को क्रिस्टल बनने के दौरान अधिक समान रूप से शामिल होने में मदद की।
जांच में पाया गया कि नई तकनीक से बनी फिल्मों की सतह अधिक चिकनी थी। उनमें ब्रोमाइड और आयोडाइड का वितरण भी ज्यादा समान था। इसके साथ ही ऊर्जा का नुकसान कम हुआ और विद्युत आवेश के प्रवाह में सुधार देखा गया।
30.1 प्रतिशत दक्षता हासिल
नई सामग्री को तीन-परत वाले सौर सेल में इस्तेमाल करने पर परिणाम काफी अच्छे रहे। 2.0 इलेक्ट्रॉन वोल्ट वाली परत ने 1.46 वोल्ट का ओपन-सर्किट वोल्टेज हासिल किया। तीनों परतों को जोड़ने के बाद सौर सेल ने 30.1 प्रतिशत ऊर्जा रूपांतरण दक्षता हासिल की। इसकी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित दक्षता 29.3 प्रतिशत रही। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह पहला दो-टर्मिनल ऑल-पेरोव्स्काइट ट्रिपल-जंक्शन सौर सेल है जिसने 30 प्रतिशत दक्षता का आंकड़ा पार किया है।
स्थिरता भी हुई बेहतर
सिर्फ दक्षता ही नहीं, सौर सेल की स्थिरता में भी सुधार दिखाई दिया। प्रयोगशाला में लगातार अधिकतम शक्ति बिंदु पर चलाने के दौरान सेल ने 569 घंटे बाद भी अपनी शुरुआती दक्षता का 90 प्रतिशत से अधिक बनाए रखा।
हालांकि ये परिणाम अभी प्रयोगशाला स्तर पर हासिल किए गए हैं। बड़े क्षेत्र में इन सौर सेल को बनाना और लंबे समय तक वास्तविक मौसम में चलाना अभी बाकी है।
भविष्य में बड़े पैनल बनाने की तैयारी
शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य ऊर्जा और फिल फैक्टर में होने वाले नुकसान को और कम करना, तीनों परतों के बीच बेहतर करंट मैचिंग करना और बड़े आकार के सौर सेल तैयार करना है। वे लचीले और हल्के मॉ्यूल बनाने पर भी काम करना चाहते हैं।
अंतरिक्ष में इस्तेमाल की संभावना को देखते हुए वैज्ञानिक विकिरण, पराबैंगनी किरणों, वैक्यूम और तापमान में लगातार बदलाव जैसी परिस्थितियों में भी इन सौर सेल की जांच करेंगे।
यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो पेरोव्स्काइट आधारित मल्टी-जंक्शन सौर सेल भविष्य में कम वजन में अधिक बिजली देने वाले सौर पैनलों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।