

“ऐसा पहली बार हुआ है कि रसोई गैस न मिलने के कारण हमें शहर छोड़ना पड़ रहा है। मैं और मेरे बच्चे गांव लौट रहे हैं, क्योंकि बाटला (सिलेंडर) खत्म हो चुका है और यह भी नहीं पता कि नया सिलेंडर कब मिलेगा।”
गुजरात की सिल्क और डायमंड सिटी कहे जाने वाले सूरत में पिछले 20 वर्षों से रह रहे शिबा मलिक की यह मजबूरी उस संकट की तस्वीर पेश करती है, जिसमें गैस की किल्लत ने आम लोगों का जीवन मुश्किल बना दिया है और उन्हें अपने गांव लौटना पड़ रहा है।
शिबा एक स्वयंसेवी संस्था से जुड़े हैं और पावरलूम वर्कर्स के लिए काम करते हैं। वह ओडिशा के रहने वाले हैं। चूंकि ओडिशा से बड़ी संख्या में लोग आकर सूरत के उद्योगों में काम करते हैं, इसलिए उन्हें इन मजदूरों के सामने आ रही दिक्कतों को हल करने के लिए सूरत में नियुक्त किया गया है।
शिबा सूरत में किराये पर रहते हैं और उन्होंने रसोई गैस (एलपीजी) का कनेक्शन भी लिया हुआ है। उनको 27 फरवरी 2026 को सिलेंडर मिला था। इसके बाद गैस का संकट बढ़ गया तो प्रशासन की ओर से कहा गया कि 35 दिन बाद बुकिंग होगी। तीन अप्रैल 2026 को बुकिंग कराई, लेकिन अब तक सिलेंडर नहीं आया। अब उनकेउनके सामने गांव लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।
डायमंड, पावरलूम जैसे औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र होने के कारण सूरत में प्रवासियों की संख्या बहुत बड़ी है। कोविड-19 लॉकड़ाउन के दौरान किए गए एक अध्ययन में कहा गया था कि सूरत में लगभग 41.76 लाख प्रवासी रहते हैं। ये मजदूर शहर की कुल आबादी का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा हैं।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) , बेंगलुरु द्वारा प्रकाशित इस पेपर में बताया गया कि ये मजदूर मुख्य रूप से कपड़ा निर्माण, डाइंग और प्रिंटिंग, पावरलूम, कढ़ाई, कपड़ों की कटिंग और पैकिंग, निर्माण कार्य, हीरा कटिंग तथा पॉलिशिंग जैसे उद्योगों में कार्यरत हैं। इनमें से लगभग 60 प्रतिशत प्रवासी मजदूर ठेका श्रमिक या दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं।
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान यहां से बड़ी संख्या में मजूदर अपने अपने गांव लौट गए हैं। इस वजह से मची भगदड़ के कारण सूरत काफी चर्चा में रहा था, लेकिन अब एक बार फिर से मजदूरों के लौटने की खबरों के कारण सूरत चर्चा में है।
यह संकट प्रवासियों के लिए कोविड से भी बड़ा है। प्रवासी मजदूरों पर काम कर रही संस्था आजीविका ब्यूरो के सह-संस्थापक एवं चीफ मैंटोर कृष्ण अवतार शर्मा ने डाउन टू अर्थ से कहा, “रसोई गैस न होने की वजह से इस तरह से शहर छोड़ कर लौटने की यह पहली घटना है। अगर गैस आपूर्ति सामान्य हो भी जाए, तब भी हालात सामान्य होने में काफी समय लग जाएगा।”
सूरत में दशकों से प्रवासी मजदूर काम करने आ रहे हैं। इनमें से कई परिवार तो यहां स्थायी रूप से बस गए हैं। अश्विन उनमें से ही एक हैं। पिता ओडिशा से सूरत काम की तलाश में आए और यहीं बस गए। अश्विन का जन्म भी सूरत में हुआ। वह कहते हैं कि उनका परिवार जहां रहता है, वहां पाइप लाइन के जरिए गैस मिलती है, लेकिन बाकी इलाकों में गैस सिलेंडर न मिलने के कारण ओडिशा के ज्यादातर परिवार गांव लौट गए हैं।
सबसे पहले परिवार वाले लौटे। मार्च में जैसे ही बच्चों की परीक्षाएं खत्म हुई। प्रवासी परिवारों ने अपने बच्चों को भूख से बचाने के लिए गांव लौटना ही ठीक समझा। प्रवासी परिवारों के पास गैस कनेक्शन नहीं था। जब तक सामान्य सप्लाई होती थी तो लोगों को आसानी से ब्लैक में सिलेंडर मिल जाता था, लेकिन सप्ताई बंद होने के बाद जो सिलेंडर 1000 रुपए में मिल जाता था, उसका दाम 3000 से 4000 रुपए तक बढ़ गया। प्रशासन की सख्ती के बाद इस कीमत पर भी सिलेंडर मिलना बंद हुआ तो प्रवासी परिवारों कोको गांव लौटने का फैसला लेना पड़ा।
पोषण का संकट
शर्मा कहते हैं, “इस संकट का एक बड़ा परिणाम कुपोषण के रूप में दिखेगा।” जो लोग पहले तीन टाइम खाना खाते थे, वो दो याा एक टाइम ही खाना खा पा रहे हैं। पावरलूम सेक्टर में 12-12 घंटे की दो शिफ्ट होती हैं। मजदूर एक बार ही खाना घर बनाता था, उसके बाद वह या तो खाना बांध कर लाता था, या पावर लूम के पास खड़ी रेहड़ियों या ढाबे पर खाना खाता था।
जब से गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है तो सबसे पहले ढाबों पर असर पड़ा। ज्यादातर बंद हो चुके हैं या चल भी रहे हैं तो सीमित खाना बना रहे हैं और ज्यादा कीमत वसूल रहे हैं। शर्मा के मुताबिक, पिछले लगभग दो माह से किसी भी मजदूर ने पूरा खाना नहीं खाया होगा। इसी तरह जो मजदूर परिवार के साथ रह रहे हैं, उनके बच्चे भी पूरा खाना नहीं पा रहे हैं।
मकान मालिक किराये के घरों में न तो लकड़ी जलाने दे रहे हैं और ना कोयला।
जीने की लागत बढ़ी
ऊर्जा संकट का व्यापक असर जीने की लागत पर साफ दिख रहा है। शिबा बताते हैं कि घर का किराया यदि छोड़ दें तो उनका महीने भर का खर्च 4,500 रुपए में पूरा हो जाता था, लेकिन अब वह बढ़ कर 7,500 रुपए तक पहुंच गया है। खाने के साथ-साथ कई खर्चे बढ़ गए हैं।
सूरत में प्रवासी श्रमिकों के आवास के लिए कई निजी हॉस्टल भी हैं। जहां रहने के साथ-साथ खाने का भी इंतजाम किया जाता है। लेकिन गैस संकट से यह भी नहीं बच पाए हैं। प्रवासी श्रमिक सुरक्षा मंच की आरे से सायण शुगर रोड पर एक हॉस्टल चलाया जाता है, जहां मात्र 3600 रुपए महीना पर मजदूरों को खाने व रहने की व्यवस्था की जाती है।
संचालक बताते हैं कि उनके यहां फरवरी में 130 श्रमिक थे, जिनकी संख्या लगातार घट रही है और अब लगभग 70 श्रमिक ही रह रहे हैं। प्रशासन से लगातार गुहार के बाद भी उन्हें पर्याप्त गैस नहीं मिल पा रही है।
नहीं काम आई उज्ज्वला 2.0
प्रवासी श्रमिकों को रसोई गैस का कनेक्शन मिलने में बड़ी दिक्कतें होती हैं। यही वजह थी कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना 2.0 में प्रवासी परिवारों के लिए नए कनेक्शन प्राप्त करने के विशेष प्रावधान किए गए। इसके तहत प्रवासी आवेदकों के लिए ‘परिवार घोषणा’ और ‘पते के प्रमाण’ के रूप में स्वयं-घोषणा को ही पर्याप्त माना गया। लेकिन इस योजना का प्रचार तक नहीं किया गया।
इस योजना का शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अगस्त 2021 को उत्तर प्रदेश के महोबा जिले से पूरे देश में किया गया। जमा-राशि (डिपॉजिट) मुक्त एलपीजी कनेक्शन के साथ-साथ उज्ज्वला 2.0 के अंतर्गत सभी लाभार्थियों को पहली गैस रिफिल और हॉटप्लेट निःशुल्क प्रदान किए गए।
उज्ज्वला 2.0 के तहत 31 मार्च 2025 तक देश में कुल 10.33 करोड़ कनेक्शन दिए गए, लेकिन इनमें से कितने कनेक्शन प्रवासियों को दिए गए, इसका विवरण कहीं उपलब्ध नहीं है।
शर्मा मानते हैं कि यदि इस योजना का व्यापक प्रचार प्रसार किया जाता और हमारी जैसी संस्थाओं का सहयोग लिया जाता तो इस समय इतना बड़ा संकट देखने को नहीं मिलता।
इरान-इसरायल-अमेरिका युद्ध के बाद गैस आपूर्ति में संकट के बाद सरकार ने यह भी कहा कि पांच किलो के सिलेंडर आसानी से उपलब्ध कराए जाएंगे, लेकिन यह भी संभव नहीं हुआ तो प्रवासी मजदूरों को सूरत जैसे औद्योगिक शहर छोड़ कर गांव लौटने को मजबूर होना पड़ा।