डाउन टू अर्थ विशेष: होर्मुज पर जंग से भड़का वैश्विक ‘तेल युद्ध’: भारत की रसोई से लेकर अर्थव्यवस्था तक हिली बुनियाद

पश्चिमी एशिया में जारी युद्ध अब तक का सबसे गंभीर तेल संकट पैदा कर सकता है, जिसका एशियाई देशों पर असर भीषण होगा
डाउन टू अर्थ विशेष: होर्मुज पर जंग से भड़का वैश्विक ‘तेल युद्ध’: भारत की रसोई से लेकर अर्थव्यवस्था तक हिली बुनियाद
सभी इलस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई
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मार्च के मध्य में भारत ने अपनी पर्दे के पीछे की कूटनीति और नौसैनिक सुरक्षा दल के जरिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से चार गैस टैंकर्स को जिस तरह सुरक्षित निकाला, उससे साफ हो जाता है कि तेल और गैस का व्यापार अब केवल व्यावसायिक लेनदेन तक सीमित नहीं रह गया है। इसके बजाय यह तेजी से वर्चस्व की एक ऐसी होड़ में तब्दील हो रहा है, जहां एक की जीत दूसरे की हार पर टिकी है और जिसे किसी भी कीमत पर जीतना ही अब सर्वोच्च प्राथमिकता है।

बड़े पैमाने पर खाना पकाने में इस्तेमाल होने वाली लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) ले जा रहे ये चारों जहाज उन 22 भारतीय जहाजों में शामिल थे, जो 28 फरवरी को ईरान में अमेरिका और इजरायल की बमबारी शुरू होने के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पश्चिम में पर्शियन गल्फ में फंस गए थे। तेहरान ने जवाबी हमले करते हुए इस होर्मुज स्ट्रेट को लगभग बंद कर दिया। ईरान और उसके खाड़ी पड़ोसी देशों के बीच स्थित यह 33 किलोमीटर चौड़ा चैनल सामरिक रूप से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। यह एक ऐसा चोक-पॉइंट है, जहां से एशिया, यूरोप समेत दुनिया भर के बाजारों को होने वाली तेल और गैस सप्लाई का पांचवां हिस्सा गुजरता है।

संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन के आंकड़ों के मुताबिक, संघर्ष शुरू होने से ठीक एक हफ्ते पहले तक वैश्विक सीबोर्न क्रूड ट्रेड का 35 प्रतिशत, एलपीजी का 29 प्रतिशत और एलएनजी व रिफाइंड प्रोडक्ट्स का 19-19 प्रतिशत हिस्सा इसी होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता था। इसके साथ ही, फर्टिलाइजर सहित दुनिया का 13 प्रतिशत केमिकल्स भी इसी रास्ते से ले जाया जाता था। सामान्य दिनों में यहां से हर दिन करीब 100 जहाज गुजरते थे, लेकिन युद्ध छिड़ने के चंद दिनों के भीतर ही इस ट्रैफिक में 97 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई। इसके चलते लगभग 3,000 जहाज बीच में ही फंस गए और क्रूड व एलएनजी की सप्लाई पूरी तरह ठप हो गई। यह संघर्ष कुछ ही समय में एक एनर्जी वॉर में तब्दील हो गया। 18 मार्च को इजरायल ने ईरान के दक्षिणी तट पर स्थित दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला कर दिया। इसके जवाब में ईरान ने भी चंद घंटों के भीतर कतर की रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी पर कई मिसाइलें दागकर पलटवार किया। गौर करने वाली बात यह है कि यहीं दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी एक्सपोर्ट प्लांट मौजूद है। तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें पहले से ही आसमान छू रही थीं। ऊर्जा संयंत्रों पर हमलों के तेज होते ही कीमतों में और ज्यादा बढ़ोतरी हो गई। इसका असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फर्टिलाइजर से लेकर सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में बेहद अहम माने जाने वाले हीलियम तक हर चीज की लागत में भारी उछाल आया (देखें, युद्ध के विनाशकारी नतीजे,)।

युद्ध के दूसरे सप्ताह के दौरान तेल की कीमतों में पिछले कई वर्षों का सबसे बड़ा उछाल दर्ज किया गया। 9 मार्च को कीमतें बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, जो 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद का उच्चतम स्तर है। हालांकि, 11 मार्च को अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की तरफ से अपने रणनीतिक भंडारों से 40 करोड़ बैरल तेल बाजार में उतारने के फैसले के बाद कीमतों में मामूली गिरावट आई और ये करीब 90 डॉलर तक आ गईं। स्टॉक से निकाले गए इस तेल में अकेले अमेरिका का हिस्सा 17.2 करोड़ बैरल था। यह 2022 की आपातकालीन आपूर्ति से दोगुने से भी अधिक है और इतिहास का सबसे बड़ा संयुक्त प्रयास है, ताकि इस संकट की वजह से तेल की कमी न हो।

इसके बावजूद 12 मार्च को ब्रेंट क्रूड लगभग 9-10 प्रतिशत की बढ़त के साथ 100.5 डॉलर के आसपास बना रहा। यह हालात सप्लाई चेन के लगातार बाधित रहने की आशंकाओं के कारण पैदा हो रहे हैं। हालांकि युद्ध के सातवें हफ्ते कीमतें 100 डॉलर से कुछ कम होकर 98.4 डॉलर प्रति बैरल हो गईं। विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर समुद्री परिवहन पर पाबंदियां जारी रहीं, तो तेल की कीमतें 150 डॉलर तक पहुंच सकती हैं।

युद्ध में जान गंवाने वालों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। एक गैर-लाभकारी संस्था “ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स इन ईरान” के अनुसार, 7 अप्रैल 2026 तक कम से कम 3,636 ईरानी मारे गए, जिनमें 1,701 आम नागरिक शामिल थे। इनमें 210 से अधिक बच्चे भी थे। जैसे-जैसे यह संघर्ष लेबनान सहित पूरे वेस्ट एशिया में फैला, सभी पक्षों की ओर से हताहतों की संख्या में भारी बढ़ोतरी होती गई। युद्ध समाप्त करने के लिए संभावित बातचीत के बारे में वाशिंगटन और तेहरान के विरोधाभासी संकेतों के बीच आयात करने वाली सरकारों और कंपनियों ने इस स्ट्रेट से अपने जहाजों के सुरक्षित मार्ग के लिए ईरान के साथ बातचीत शुरू कर दी है। हालांकि पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला और संकट जस का तस है।

आपूर्ति का संकट

होर्मुज मार्ग के बंद होने का सबसे बुरा असर एशिया पर पड़ा है, जो युद्ध से पहले यहां से रोज गुजरने वाले 2.1 करोड़ बैरल तेल का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा खरीदता था। इस चोक-पॉइंट से गुजरने वाले कुल तेल के तीन-चौथाई हिस्से और करीब 60 प्रतिशत एलएनजी की खपत अकेले चार बड़ी अर्थव्यवस्थाओं चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया में होती है।

इस संकट की मार सबसे पहले गरीब देशों पर पड़ी। नेपाल ने रसोई गैस की राशनिंग शुरू कर दी है, जबकि श्रीलंका ने ईंधन बचाने के लिए कंपनियों से हर बुधवार को कामकाज बंद रखने का आग्रह किया है। अपनी लगभग पूरी एलएनजी कतर से मंगवाने वाला पाकिस्तान इस समय सबसे अधिक जोखिम वाली स्थिति में है, वहां स्कूल बंद कर दिए गए हैं और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई ऑनलाइन मोड पर शिफ्ट कर दी गई है। सप्लाई चेन को अचानक लगे इस झटके ने भारत की एक पुरानी और गंभीर कमजोरी को उजागर कर दिया है, आयातित जीवाश्म ईंधन पर हमारी भारी निर्भरता। भारत अपनी जरूरत का 88-90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है।

जिसका लगभग आधा हिस्सा यानी प्रतिदिन 25 लाख से 27 लाख बैरल होर्मुज के रास्ते आता है। यह आपूर्ति मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत से होती है। देश में एलपीजी की कुल खपत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा आयात किया जाता है। इस आयात का करीब 90 प्रतिशत इसी होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है। इसी तरह, एलएनजी की लगभग 68 प्रतिशत आपूर्ति खाड़ी देशों से होती है, जिसका मुख्य स्रोत कतर है। कुल मिलाकर भारत में प्राकृतिक गैस की खपत का लगभग आधा हिस्सा आयात पर आधारित है। मौजूदा संकट के कारण अब कुल आपूर्ति का करीब एक-चौथाई हिस्सा बाधित हो गया है। इस संकट की सबसे ज्यादा मार देशभर की रसोइयों पर पड़ रही है।

संघर्ष से पहले भारत के 25,000 एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स रोजाना लगभग 55 लाख सिलेंडर बुक करते थे। लेकिन घबराहट में बढ़ी खरीदारी के चलते महज दो हफ्तों के भीतर यह आंकड़ा उछलकर 88 लाख तक पहुंच गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 लागू कर दिया और चार स्तरीय राशनिंग व्यवस्था शुरू कर दी।

युद्ध जैसी परिस्थितियों के अलावा इतने बड़े पैमाने पर इस कानून का इस्तेमाल विरले ही किया जाता है। इस व्यवस्था के तहत घरों और सीएनजी वाहनों को तो पूरी आपूर्ति दी गई, लेकिन औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं की सप्लाई में 50 प्रतिशत की कटौती कर दी गई। खाद्य सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण फर्टिलाइजर प्लांट्स की आपूर्ति को 70 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया। इसका व्यापक असर उद्योगों पर भी पड़ा। मुंबई जैसे शहरों में लगभग 20 प्रतिशत रेस्टोरेंट्स अस्थायी रूप से बंद हो गए। गुजरात के सिरेमिक हब मोरबी में गैस का इस्तेमाल घटाकर 80 प्रतिशत कर दिया गया। सबसे बड़ी चुनौती तब खड़ी हुई, जब खरीफ की बुवाई का सीजन नजदीक आने पर फर्टिलाइजर प्लांट्स ने यूरिया के उत्पादन में कमी कर दी। सिलेंडरों के लिए वेटिंग टाइम शहरों में 25 दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिन तक पहुंच गई।

आपूर्ति को स्थिर करने के लिए रिफाइनरीज को अधिकतम एलपीजी उत्पादन करने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे उत्पादन में 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके साथ ही सरकार अमेरिका, नॉर्वे, कनाडा, अल्जीरिया और रूस जैसे वैकल्पिक देशों से कार्गो जुटाने के लिए लगातार कोशिश कर रही है। हालांकि अधिकारियों का दावा है कि आपूर्ति पर्याप्त है, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी मार्च की रिपोर्ट में स्थिति की “बारीकी से निगरानी” करने का आग्रह किया है।

बैंक का यह भी मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब किसी भी बाहरी झटके को झेलने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक पुख्ता है। पाइप्ड नेचुरल गैस के विस्तार में तेजी लाने के लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 24 मार्च को आवश्यक वस्तु अधिनियम का सहारा लेते हुए नियमों में सुधार किए, ताकि घरेलू और व्यावसायिक दोनों स्तरों पर पीएनजी नेटवर्क के विस्तार की बाधाओं को दूर किया जा सके। इन प्रयासों के बावजूद विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर आपूर्ति में यह रुकावट लंबे समय तक खिंचती है, तो इससे न केवल कीमतें बढ़ेंगी बल्कि आर्थिक विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ जाएगी। अब सबसे बड़ा सवाल इस संकट की अवधि को लेकर है।

मार्केट इंटेलिजेंस कंपनी एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी के वाइस प्रेजिडेंट जिम बुरखार्ड के मुताबिक, “संकट के पहले हफ्ते में यह केवल परिवहन की एक समस्या थी। इसे जल्दी सुलझाया जा सकता था। लेकिन अब यह उत्पादन क्षमता से जुड़ी गंभीर समस्या में बदल गई है।” इतने बड़े पैमाने पर तेल उत्पादन फिर से शुरू करना एक विशाल तकनीकी चुनौती है। इसे पूरी तरह बहाल करने में कई हफ्ते या उससे भी अधिक समय लग सकता है। डाउनस्ट्रीम और तेल से जुड़े अन्य बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचा है। बुरखार्ड कहते हैं कि इससे कच्चे तेल और रिफाइंड उत्पादों की बहाली की गति धीमी हो सकती है। एशिया में इस संकट का असर सबसे साफ दिख रहा है। साल 2025 में एशिया में प्रोसेस होने वाले कुल कच्चे तेल का आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से ही आया था। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जितने लंबे समय तक प्रभावी रूप से बंद रहेगा, इसके नतीजे उतने ही भयावह होंगे। इसका सीधा असर आपूर्ति, स्टॉक और कीमतों पर पड़ेगा।

क्या भारत तैयार है?

सैद्धांतिक तौर पर देखा जाए तो ऐसे संकट नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने की प्रक्रिया को तेज करने के तर्क को और मजबूती मिलती है।

संघर्ष के शुरुआती दौर में पूरे यूरोप में ऊर्जा की कीमतें बढ़ीं। लेकिन स्पेन जैसे उन देशों में कीमतों में कम उछाल देखा गया, जहां नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी अधिक थी। वहां कीमतों में उतार-चढ़ाव भी काफी कम रहा। जिन देशों में अक्षय ऊर्जा पर आधारित अलग-अलग तरह के एनर्जी सिस्टम मौजूद हैं, वे तेल और गैस के संकटों को बेहतर तरीके से झेल पाते हैं। इससे अर्थव्यवस्था को आंतरिक मजबूती मिलती है। हालांकि, भारत की जमीनी हकीकत इससे कहीं अधिक पेचीदा है।

दिल्ली के सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के अक्षय ऊर्जा विशेषज्ञ बिनीत दास के अनुसार, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के बड़े फायदे हुए हैं। इससे घरों के अंदर हवा की गुणवत्ता सुधरी है और लोगों का स्वास्थ्य बेहतर हुआ है। लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि इसने घरेलू जरूरतों के लिए आयातित ईंधन पर हमारी निर्भरता बढ़ा दी है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईआईएसडी) की फरवरी 2026 की रिपोर्ट भी यही कहती है। भारत का ऊर्जा परिवर्तन काफी हद तक एलपीजी और पीएनजी जैसे जीवाश्म ईंधनों पर टिका है।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि एलपीजी की खपत साल 2011-12 में 1.5 करोड़ टन थी। साल 2024-25 तक यह लगभग दोगुनी होकर 3.1 करोड़ टन हो गई है। गौर करने वाली बात यह है कि इस पूरी बढ़ोतरी का 93 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया गया है। इतनी भारी निर्भरता के कारण हम अंतरराष्ट्रीय कीमतों और सप्लाई में आने वाली रुकावटों के प्रति बेहद संवेदनशील हो गए हैं।

उज्ज्वला योजना जैसी स्कीमों से घर के भीतर की हवा साफ हुई और सार्वजनिक स्वास्थ्य में भी सुधार हुआ। लेकिन इसने भारत को अपनी बुनियादी जरूरत के लिए विदेशी ईंधन पर और अधिक निर्भर बना दिया है

बिनीत दास का कहना है कि मौजूदा संकट ने एक बड़ा सबक दिया है। हमें “क्लीन कुकिंग” और “एनर्जी सिक्योरिटी” को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ जोड़कर देखना होगा। भारत को सिर्फ साफ ईंधन नहीं, बल्कि “संप्रभु स्वच्छ रसोई ईंधन” की जरूरत है। यानी ऐसा ईंधन जिसके लिए हमें किसी दूसरे देश का मुंह न ताकना पड़े। इसका दीर्घकालिक समाधान खेती के कचरे और शहरी कूड़े से बनी बायोगैस और कंप्रेस्ड बायोगैस में छिपा है। सरकार अपनी सतत (एसएटीएटी) योजना के जरिए इसी विकल्प को बढ़ावा दे रही है।

इंटरनेशनल सोलर अलायंस के डायरेक्टर जनरल आशीष खन्ना ने डाउन टू अर्थ से बात करते हुए बिजली के उपयोग पर जोर दिया। उनका कहना है कि हमें ट्रांसपोर्ट, खाना पकाने और उद्योगों के लिए बिजली पर निर्भरता बढ़ानी चाहिए। इससे एलपीजी या एलएनजी की सप्लाई में आने वाली बाधाओं का भारत पर कम असर पड़ेगा।

आशीष खन्ना के अनुसार, विद्युतीकरण देशों को स्वदेशी बिजली पर निर्भर रहने की ताकत देता है। जैसे-जैसे सौर और अन्य अक्षय ऊर्जा स्रोतों का विस्तार होगा, यह निर्भरता और मजबूत होगी। हालांकि, बिनीत दास का मानना है कि अक्षय ऊर्जा को बड़े पैमाने पर ग्रिड से जोड़ने के लिए भारत को

कुछ कड़े कदम उठाने होंगे। इसमें देश के पावर ग्रिड को नए सिरे से तैयार करना, बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति सुधारना और घरेलू स्तर पर बैटरी का निर्माण करना शामिल है।

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