

भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या 2017-18 के 10.4 करोड़ से बढ़कर 2025 में 20.1 करोड़ हो गई।
कुल कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी आठ वर्षों में 22 फीसदी से बढ़कर 38 फीसदी तक पहुंच गई।
ग्रामीण महिलाओं की रोजगार भागीदारी 23.7 फीसदी से बढ़कर 44.9 फीसदी हुई, जबकि शहरों में यह 25.9 फीसदी पहुंची।
महिलाएं रोजाना औसतन 464 मिनट घरेलू काम करती हैं, जबकि पुरुष केवल 178 मिनट घरेलू जिम्मेदारियों में लगाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की मजदूरी पुरुषों की तुलना में 45 फीसदी और शहरी क्षेत्रों में 61 फीसदी है।
भारत में महिलाएं तेजी से कामकाज की दुनिया में अपनी जगह बना रही हैं। गांवों से लेकर शहरों तक महिलाएं नौकरी कर रही हैं, कारोबार संभाल रही हैं और परिवार की आमदनी बढ़ाने में योगदान दे रही हैं। पिछले आठ वर्षों में देश में कामकाजी महिलाओं की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है।
लेकिन इस बदलाव की एक दूसरी तस्वीर भी है, जो कई सवाल खड़े करती है। घर के भीतर महिलाओं की जिम्मेदारियां आज भी पहले जैसी ही हैं। नौकरी के साथ घर संभालने का बोझ भी ज्यादातर महिलाओं के कंधों पर है। यानी बाहर काम करने के घंटे बढ़े हैं, लेकिन घर के कामों से राहत नहीं मिली है।
आठ साल में दोगुनी हुई कामकाजी महिलाओं की संख्या
इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (आईसीआरआईईआर) की 'पार्टिसिपेशन पैराडॉक्स' नाम की रिपोर्ट में यह तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या 2017-18 में 10.4 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर 20.1 करोड़ हो गई। कुल कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी भी 22 फीसदी से बढ़कर 38 फीसदी पहुंच गई है।
यह बदलाव बताता है कि महिलाएं अब पहले से कहीं अधिक संख्या में रोजगार से जुड़ रही हैं। खास बात यह है कि इस बदलाव की रफ्तार गांवों में ज्यादा देखने को मिली है।
गांवों की महिलाओं ने दिखाई बड़ी छलांग
ग्रामीण भारत में महिलाओं की कामकाज में भागीदारी 2017-18 में 23.7 फीसदी थी, जो 2025 में बढ़कर 44.9 फीसदी हो गई। वहीं, शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 18.2 फीसदी से बढ़कर 25.9 फीसदी पहुंचा।
गांवों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के पीछे खेती, स्वरोजगार और दूसरे रोजगार के अवसरों की भूमिका हो सकती है। हालांकि, रोजगार में बढ़ती भागीदारी का मतलब यह नहीं है कि महिलाओं के जीवन का बोझ भी कम हुआ है।
घर के काम में महिलाओं के हिस्से ज्यादा मेहनत
रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू घरेलू कामकाज से जुड़ा है। आंकड़ों के मुताबिक, महिलाएं हर दिन औसतन 464 मिनट घरेलू कामों में लगाती हैं, जबकि पुरुष केवल 178 मिनट देते हैं। यानी महिलाएं पुरुषों के मुकाबले रोजाना करीब 4 घंटे 46 मिनट ज्यादा घरेलू काम करती हैं।
खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना, बच्चों की देखभाल करना और परिवार के बुजुर्गों की जरूरतों का ध्यान रखना जैसे काम आज भी मुख्य रूप से महिलाओं की जिम्मेदारी बने हुए हैं। दिलचस्प बात यह है कि महिलाओं के नौकरी करने के बावजूद घर के भीतर काम का बंटवारा बराबर नहीं हो पाया है।
नौकरी के रास्ते में घर की जिम्मेदारियां
घरेलू जिम्मेदारियां महिलाओं के रोजगार के रास्ते में बड़ी बाधा भी बनी हुई हैं। सर्वे में करीब 60 फीसदी महिलाओं ने कहा कि घर के काम और बच्चों की देखभाल के कारण वे घर से बाहर नौकरी नहीं कर पातीं। इसके मुकाबले केवल 1 फीसदी पुरुषों ने घरेलू जिम्मेदारियों को रोजगार में बाधा बताया।
यह अंतर दिखाता है कि परिवार और बच्चों की देखभाल को आज भी महिलाओं का काम समझा जाता है। कई महिलाएं नौकरी करना चाहती हैं, लेकिन घर की जिम्मेदारियों के कारण उन्हें अपने करियर और परिवार के बीच चुनाव करना पड़ता है।
आराम और अपनी जिंदगी के लिए भी कम समय
इस असमानता का असर महिलाओं के खाली समय पर भी पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों और महिलाओं के बीच फुर्सत के समय का अंतर 2019 में 57 मिनट था, जो 2024 में बढ़कर 70 मिनट हो गया। यानी महिलाएं आज भी पुरुषों के मुकाबले अपने लिए कम समय निकाल पा रही हैं।
जबकि आराम, मनोरंजन और खुद के लिए समय निकालना किसी भी व्यक्ति की जिंदगी का जरूरी हिस्सा है। लगातार काम और जिम्मेदारियों के बीच महिलाओं को यह मौका भी कम मिल रहा है।
कमाई में भी कायम है बड़ा अंतर
रोजगार में भागीदारी बढ़ने के बावजूद महिलाओं और पुरुषों की कमाई में भी बड़ा अंतर बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की मजदूरी पुरुषों की मजदूरी का केवल 45 फीसदी है। वहीं, शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 61 फीसदी है।
इसका मतलब है कि महिलाएं काम तो कर रही हैं, लेकिन उन्हें पुरुषों के बराबर आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा है। रोजगार में बढ़ती संख्या के साथ समान वेतन और बेहतर अवसरों का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।
बदलाव सिर्फ नौकरी से नहीं आएगा
भारत में महिलाओं की बढ़ती कार्यबल भागीदारी निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण बदलाव है। लेकिन असली समानता तभी आएगी, जब घर की जिम्मेदारियां भी पुरुष और महिलाएं मिलकर उठाएंगे। बच्चों की देखभाल, खाना बनाना और घर संभालना केवल महिलाओं का काम नहीं है।
जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें महिलाओं को रोजगार के साथ-साथ अपने लिए भी समय मिल सके। परिवारों में जिम्मेदारियों का बराबर बंटवारा हो, बच्चों की देखभाल के बेहतर इंतजाम हों और महिलाओं को समान वेतन तथा रोजगार के अवसर मिलें।
आखिरकार, महिला सशक्तीकरण का मतलब सिर्फ महिलाओं का नौकरी करना नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि उन्हें घर और बाहर, दोनों जगह बराबरी मिले। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक देश की करोड़ों महिलाएं एक नहीं, बल्कि दो-दो पालियों में काम करती रहेंगी।