

चंडीगढ़ के आसपास, खासकर पंजाब के वन क्षेत्रों से सटी जमीनों पर कथित अवैध निर्माण और कॉलोनियों के विकास को लेकर केंद्र सरकार ने सख्त रुख अपनाया है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एनजीटी में दाखिल अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि डीलिस्ट की गई वन भूमि को अवैध कॉलोनियों या व्यावसायिक केंद्रों में बदलना 2009 में दी गई मंजूरी की शर्तों का सीधा उल्लंघन है।
मंत्रालय ने कहा है कि वन भूमि पर किसी भी गैर-वानिकी या व्यावसायिक गतिविधि के लिए केंद्र की पूर्व अनुमति अनिवार्य है और इसकी निगरानी तथा कानूनों के पालन की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2009 में 55,339.95 हेक्टेयर भूमि को केवल कृषि और स्थानीय लोगों की आजीविका के लिए वन सूची से बाहर किया गया था, लेकिन अब इन क्षेत्रों में अवैध विकास के आरोप सामने आए हैं। इसी वजह से केंद्र ने पंजाब सरकार से तथ्यात्मक रिपोर्ट और दस्तावेजी साक्ष्य मांगे हैं।
दूसरी ओर, जीएमएडीए ने मिर्जापुर, जयंती माजरी, करोरण और सिसवां जैसे गांवों में कार्रवाई शुरू करते हुए 92 नए नोटिस जारी किए हैं। मंत्रालय ने जोर दिया है कि संरक्षित प्राकृतिक परिदृश्यों के व्यावसायीकरण को रोकना और वन कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
चंडीगढ़ के आसपास विशेषकर पंजाब के वन क्षेत्रों से सटे संवेदनशील इलाकों में हो रहे कथित अवैध निर्माण और कॉलोनियों के विकास को लेकर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने चिंता जताई है।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यदि संरक्षित या डीलिस्ट की गई भूमि का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है, तो यह केंद्र की मंजूरी की शर्तों का सीधा उल्लंघन है।
मंत्रालय द्वारा 8 जून 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दाखिल अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि भूमि से जुड़े रिकॉर्ड, उसकी कानूनी स्थिति और सीमाओं का निर्धारण राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। साथ ही वनों की सुरक्षा प्राथमिक रूप से राज्य सरकार का विषय है।
राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी भूमि पर केंद्र और राज्य कानूनों, नियमों, अधिसूचनाओं तथा सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन न हो।
राज्य सरकार पर वन भूमि की सुरक्षा की जिम्मेदारी
मंत्रालय ने रिपोर्ट में कहा है कि 'वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980' की धारा 2(1) के तहत वन भूमि पर किसी भी तरह की गैर-वानिकी या व्यावसायिक गतिविधि शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है। बिना इसके किया गया कोई भी निर्माण पूरी तरह अवैध माना जाएगा।
इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2009 के एक आदेश से जुड़ी हैं। मंत्रालय ने याद दिलाया कि 24 जुलाई 2009 को पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम (पीएलपीए) के तहत 55,339.95 हेक्टेयर कृषि और आवासीय भूमि को कुछ शर्तों के साथ वन सूची से बाहर (डी-लिस्ट) करने की मंजूरी दी गई थी।
यह मंजूरी तीन सख्त और अनिवार्य शर्तों के साथ दी गई थी। पहली शर्त के मुताबिक इस जमीन पर किसी भी व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति नहीं होगी।
दूसरी शर्त के तहत इसका उपयोग सिर्फ कृषि और स्थानीय लोगों की आजीविका के लिए किया जाएगा, और तीसरी शर्त यह थी कि यदि गलती से कोई अधिसूचित वन क्षेत्र इस सूची में शामिल हो गया हो, तो उसे वन क्षेत्र से बाहर नहीं माना जाएगा।
अवैध कॉलोनियों ने खड़े किए शर्तों के उल्लंघन के सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, चंडीगढ़ की परिधि में अवैध कॉलोनियों और व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े आरोप इन शर्तों के संभावित उल्लंघन की ओर इशारा करते हैं। मंत्रालय ने कहा कि डीलिस्ट की गई भूमि को अवैध कॉलोनियों या व्यावसायिक केंद्रों में बदलना मंजूरी की शर्तों के विपरीत है।
इसी संदर्भ में मंत्रालय ने 17 दिसंबर 2025 को पंजाब सरकार को पत्र लिखकर तथ्यात्मक रिपोर्ट और दस्तावेजी साक्ष्य मांगे थे। साथ ही यह भी पूछा था कि क्या इन क्षेत्रों में वन अधिनियम का उल्लंघन हुआ है या नहीं।
इस बीच, ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (जीएमएडीए) ने भी अपनी स्थिति रिपोर्ट सौंप दी है। इस रिपोर्ट में बताया है कि मिर्जापुर, जयंती माजरी, करोरण और सिसवां जैसे गांवों में अवैध निर्माण के खिलाफ जमीनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। इसके अलावा, 15 सितंबर 2025 के बाद से अवैध विकास पर रोक लगाने के लिए 92 नए कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस जारी किए गए हैं।
रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के तहत पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी केवल उन्हीं निर्माण या टाउनशिप परियोजनाओं के लिए आवश्यक होती है, जो निर्धारित सीमा या थ्रेशोल्ड के दायरे में आती हैं।
मंत्रालय ने जोर देकर कहा है कि 2009 में दी गई डीलिस्टिंग मंजूरी की मूल शर्तों का सख्ती से पालन होना चाहिए, ताकि संरक्षित प्राकृतिक परिदृश्यों का व्यावसायीकरण रोका जा सके और पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।