

किसी बच्चे का स्कूल जाना उसके लिए जितना सामान्य लगता है, कई परिवारों के लिए यह पीढ़ियों से चले आ रहे अभाव को तोड़ने जैसा है।
भारत में 2.8 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने अपने परिवार में छह साल की स्कूली शिक्षा पूरी करने वाली पहली पीढ़ी बनकर यह बदलाव शुरू किया है। यह आंकड़ा उम्मीद जगाता है, लेकिन दुनिया भर के बच्चों की स्थिति बताती है कि यह राह अभी लंबी है।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अध्ययन के अनुसार, विकासशील देशों में पांच साल से कम उम्र के 25.2 करोड़ बच्चे कुपोषण, बहुआयामी गरीबी या दोनों से जूझ रहे हैं। स्कूल जाने की उम्र के 13.6 करोड़ बच्चे भी स्कूल से बाहर हैं और इनमें 11 करोड़ बच्चे बहुआयामी गरीबी का सामना कर रहे हैं।
भारत के 2.8 करोड़ बच्चों की उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा केवल एक बच्चे का भविष्य नहीं बदलती, बल्कि पूरे परिवार की अगली पीढ़ी के लिए नए अवसर खोल सकती है।
लेकिन इस बदलाव को स्थाई बनाने के लिए शिक्षा के साथ पोषण, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं पर भी समान ध्यान देना जरूरी है।
किसी बच्चे के लिए भूख सिर्फ पेट खाली होने का एहसास नहीं और स्कूल से दूर रहना केवल पढ़ाई छूट जाना नहीं है। जब एक बच्चे के घर में पर्याप्त भोजन, शिक्षा, साफ पानी या दूसरी जरूरी सुविधाएं नहीं होतीं, तो उसके बचपन पर अभाव की कई परतें एक साथ चढ़ जाती हैं। एक नए वैश्विक अध्ययन ने इसी कठोर सच्चाई को आंकड़ों में सामने रखा है।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ओपीएचआई) की रिपोर्ट से पता चला है कि विकासशील देशों में पांच साल से कम उम्र के 25.2 करोड़ यानी करीब आधे बच्चे कुपोषण, बहुआयामी गरीबी या दोनों समस्याओं से एक साथ जूझ रहे हैं।
इस रिपोर्ट में, 97 देशों के पांच साल से कम उम्र के 51.8 करोड़ बच्चों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।
इस रिपोर्ट में केवल यह नहीं देखा गया कि बच्चे पर्याप्त पोषण पा रहे हैं या स्कूल जा रहे हैं। इसमें यह भी देखा गया है कि जिस घर में बच्चा रह रहा है, वहां स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़ी दूसरी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति कैसी है।
साथ ही इसमें संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और ओपीएचआई द्वारा तैयार वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (ग्लोबल एमपीआई) के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है, जिसमें गरीबी को केवल आय के आधार पर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़े 10 संकेतकों के आधार पर मापा जाता है।
हर तीन में से एक बच्चा कुपोषित
रिपोर्ट के मुताबिक, 97 देशों में पांच साल से कम उम्र के करीब एक-तिहाई बच्चे कुपोषित हैं। इनमें वे बच्चे भी शामिल हैं जो अपनी उम्र के हिसाब से पर्याप्त लंबाई हासिल नहीं कर पाए या जिनका वजन कम है। सबसे चिंताजनक स्थिति उन बच्चों की है जो एक साथ कुपोषण और गरीबी दोनों से जूझ रहे हैं।
दुनिया में करीब 9.6 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो कुपोषित होने के साथ-साथ बहुआयामी गरीबी के साए में जी रहे हैं। यानी पांच साल से कम उम्र का करीब हर पांचवा बच्चा इन दोनों समस्याओं का सामना कर रहा है।
देखा जाए तो इन बच्चों की मुश्किलें केवल भोजन की कमी तक सीमित नहीं हैं। रिपोर्ट से पता चला है कि कुपोषण और बहुआयामी गरीबी दोनों से प्रभावित प्रत्येक बच्चे को इसके अलावा औसतन चार से पांच अन्य अभावों का भी सामना करना पड़ता है। यानी जिस बच्चे को पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा, उसके घर में शिक्षा, स्वच्छता, साफ पानी, बिजली, आवास या स्वास्थ्य सेवाओं जैसी दूसरी बुनियादी जरूरतों की कमी भी हो सकती है।
ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव की निदेशक और अध्ययन की सह-लेखिका सबीना अल्कायर के मुताबिक, बच्चों में गरीबी की कई परतों का इस तरह एक साथ दिखाई देना चिंताजनक है। उनके अनुसार, ऐसे आंकड़े बताते हैं कि बच्चों की समस्याओं का समाधान केवल एक क्षेत्र में काम करके नहीं किया जा सकता। सामाजिक सुरक्षा जैसे बहु-क्षेत्रीय कार्यक्रमों की जरूरत है।
स्कूल से बाहर 13.6 करोड़ बच्चे
गरीबी का असर बच्चों की शिक्षा पर भी गहराई से दिखाई देता है। 108 देशों में उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, स्कूल जाने की उम्र के 104 करोड़ बच्चों में से करीब 13.6 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं। इनमें से 11 करोड़ यानी 80 फीसदी से अधिक बच्चे बहुआयामी गरीबी में भी जी रहे हैं।
स्कूल से बाहर और गरीब प्रत्येक बच्चे को औसतन पांच अन्य प्रकार के अभावों का सामना करना पड़ता है। कुल मिलाकर, अध्ययन में शामिल 104 करोड़ स्कूल जाने की उम्र के बच्चों में 31 फीसदी बच्चे या तो स्कूल से बाहर हैं, बहुआयामी गरीबी में हैं या दोनों स्थितियों का सामना कर रहे हैं।
यह आंकड़ा बताता है कि स्कूल से बाहर होना केवल शिक्षा से जुड़ी समस्या नहीं है। इसके पीछे परिवार की आर्थिक स्थिति, घर में शिक्षा का स्तर, रहने की परिस्थितियां और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की कमी भी बड़ी भूमिका निभाती है।
एक ही घर में बच्चों की किस्मत अलग-अलग
रिपोर्ट की एक अहम बात यह है कि गरीबी का असर एक ही परिवार के सभी बच्चों पर समान नहीं पड़ता। गरीब बच्चों में एक-तिहाई से अधिक ऐसे हैं जो अपने ही घर में असमान परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। यानी एक ही परिवार में एक बच्चा कुपोषित हो सकता है, जबकि दूसरा नहीं।
इसी तरह किसी घर में एक बच्चा स्कूल जा रहा हो सकता है, जबकि दूसरा स्कूल से बाहर हो। यह अंतर बताता है कि केवल परिवार को गरीबी में मान लेना पर्याप्त नहीं है। परिवार के भीतर बच्चों की वास्तविक स्थिति को भी समझना जरूरी है।
ऐसी असमानताएं यह सवाल भी उठाती हैं कि बच्चों के लिए बनाई जाने वाली योजनाओं को केवल पूरे परिवार को एक इकाई मानकर नहीं, बल्कि बच्चों की अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाए।
गरीब बच्चों की शिक्षा में महिलाओं की कमी बड़ी बाधा
रिपोर्ट में बच्चों की स्थिति और घर की महिलाओं की शिक्षा के बीच भी गहरा संबंध सामने आया है। उदाहरण के लिए बहुआयामी गरीबी में रह रहे दो-तिहाई से अधिक बच्चे ऐसे घरों में रह रहे हैं, जहां किसी महिला ने छह साल की स्कूली शिक्षा पूरी नहीं की है।
इसकी तुलना में करीब आधे बच्चे ऐसे परिवारों में रहते हैं जहां किसी पुरुष ने भी छह साल की शिक्षा पूरी नहीं की है।
स्कूल से बाहर रहने वाले गरीब बच्चों की स्थिति और गंभीर है। इनमें करीब 82 फीसदी बच्चे ऐसे घरों में रह रहे हैं जहां किसी महिला ने छह साल की शिक्षा पूरी नहीं की है। वहीं 62 फीसदी बच्चे ऐसे परिवारों में रहते हैं जहां किसी पुरुष ने छह साल की शिक्षा पूरी नहीं की है।
ये आंकड़े बताते हैं कि एक बच्चे की शिक्षा केवल स्कूल तक पहुंच पर निर्भर नहीं करती। घर में मौजूद माहौल और विशेष रूप से महिलाओं की शिक्षा भी अगली पीढ़ी के अवसरों को प्रभावित करती है।
अफगानिस्तान में बच्चियों की स्कूल से दूरी ज्यादा
बच्चियों और लड़कों के बीच शिक्षा की स्थिति भी कई देशों में अलग-अलग है। वैश्विक स्तर पर बच्चियों के स्कूल से बाहर रहने की दर लड़कों की तुलना में अधिक है, हालांकि देशों के बीच स्थिति काफी अलग है। 19 देशों में बच्चियों के स्कूल से बाहर रहने की दर लड़कों से अधिक है। इन देशों में दुनिया के स्कूल से बाहर बच्चों का करीब 56 फीसदी हिस्सा रहता है।
सबसे बड़ा अंतर अफगानिस्तान में सामने आया, जहां 67 फीसदी बच्चियां स्कूल से बाहर हैं, जबकि लड़कों में यह आंकड़ा 47 फीसदी है।
इसी तरह पाकिस्तान में 30.2 फीसदी बच्चियां और 22.3 फीसदी लड़के स्कूल से बाहर हैं। मध्य अफ्रीकी गणराज्य में यह आंकड़ा क्रमशः 29.3 और 21.5 फीसदी तथा गिनी में 41.3 और 33.7 फीसदी दर्ज किया गया है।
हालांकि, अध्ययन में यह भी सामने आया कि कुपोषण के मामले में कई जगह लड़के, बच्चियों की तुलना में अधिक प्रभावित हैं। इससे स्पष्ट है कि लैंगिक असमानता हर क्षेत्र और हर समस्या में एक जैसी नहीं है।
7.1 करोड़ बच्चे अपने परिवार में शिक्षा की पहली पीढ़ी
रिपोर्ट में कुछ उम्मीद जगाने वाले आंकड़े भी सामने आए हैं। 108 देशों में करीब 7.1 करोड़ बच्चे 10 से 17 वर्ष की उम्र के ऐसे हैं जिन्होंने अपने परिवार में छह साल की स्कूली शिक्षा पूरी करने वाले पहले बच्चे के रूप में नई राह बनाई है। इन्हें रिपोर्ट में ‘पायनियर चिल्ड्रन’ यानी शिक्षा की पहली पीढ़ी के बच्चे कहा गया है।
इनमें से करीब आधे बच्चे दक्षिण एशिया में रह रहे हैं। इस क्षेत्र में 10 से 17 वर्ष की उम्र के करीब हर नौ में से एक बच्चे ने अपने परिवार में छह साल की शिक्षा पूरी करने की पहली पीढ़ी के बच्चे का दर्जा हासिल किया है।
भारत में ऐसे बच्चों की संख्या करीब 2.8 करोड़ है। इसके अलावा बांग्लादेश में 30 लाख से अधिक, पाकिस्तान में करीब 20 लाख, नेपाल में 8.37 लाख और अफगानिस्तान में करीब 5.08 लाख बच्चे इस श्रेणी में हैं। इसी तरह भारत, भूटान और बांग्लादेश में 10 से 17 वर्ष की उम्र की बच्चियों में अपने परिवार की पहली शिक्षित पीढ़ी बनने वाली लड़कियों की हिस्सेदारी लड़कों की तुलना में अधिक है।
हालांकि, यह प्रगति अभी भी अधूरी है। दुनिया में शिक्षा की पहली पीढ़ी के करीब 9 फीसदी बच्चे ऐसे घरों में रह रहे हैं जहां उसी उम्र का कम से कम एक दूसरा बच्चा स्कूल से बाहर है।
गरीबी को सिर्फ आय से समझना काफी नहीं
देखा जाए तो इस रिपोर्ट का सबसे अहम संदेश यही है कि बच्चों की गरीबी केवल इस बात से तय नहीं होती कि उनके परिवार की आय कितनी है। भूख, कुपोषण, शिक्षा से दूरी, साफ पानी और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव अक्सर एक साथ बच्चों के जीवन को प्रभावित करता है। जो बच्चा आज कुपोषित है और स्कूल से बाहर है, उसके सामने आगे चलकर गरीबी से निकलने के अवसर भी सीमित हो सकते हैं।
इस तरह बचपन में शुरू हुआ एक अभाव अगली पीढ़ी तक पहुंचने वाली गरीबी का कारण बन सकता है।
ऐसे में बच्चे की भूख, उसकी शिक्षा और उसके घर की परिस्थितियों को अलग-अलग समस्याएं मानकर समाधान नहीं किया जा सकता। अगर बचपन को गरीबी के चक्र से बाहर निकालना है तो पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं को एक साथ मजबूत करना होगा। तभी करोड़ों बच्चों के लिए गरीबी में बीत रहा बचपन बेहतर भविष्य की ओर बढ़ सकेगा।