

जलवायु परिवर्तन के कारण शीतकालीन ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों के आयोजन में गंभीर चुनौतियां आ रही हैं। बढ़ती गर्मी के चलते प्राकृतिक बर्फ की कमी हो रही है, जिससे आयोजकों को कृत्रिम बर्फ पर निर्भर होना पड़ रहा है।
अध्ययन के अनुसार, अगर मौजूदा नीतियां जारी रहीं, तो भविष्य में खेलों के लिए उपयुक्त स्थानों की संख्या तेजी से घट सकती है।
शोधकर्ताओं ने उन 93 संभावित शहरों का विश्लेषण किया, जहां अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के मुताबिक पहले से शीतकालीन खेलों का बुनियादी ढांचा मौजूद है। अनुमान दर्शाते हैं कि यदि दुनिया मौजूदा जलवायु नीतियों पर ही चलती रही तो भविष्य में ओलंपिक खेलों के लिए 52 और पैरालंपिक खेलों के लिए महज 22 स्थान ही जलवायु की दृष्टि से भरोसेमंद रह जाएंगे।
1950 के बाद शीतकालीन ओलंपिक की मेजबानी करने वाले सभी 19 शहरों में औसतन 2.7 डिग्री सेल्सियस की गर्मी बढ़ी है। कॉर्टिना में फरवरी के दौरान बर्फ की औसत मोटाई 1970 के दशक से अब तक करीब 15 सेंटीमीटर घट चुकी है।
जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ मौसम ही नहीं बदल रहा, बल्कि शीतकालीन ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण सर्दियां छोटी और कम ठंडी होती जा रही हैं, जिससे आयोजकों को प्राकृतिक बर्फ की जगह कृत्रिम बर्फ पर निर्भर होना पड़ रहा है।
इस बारे में किए एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में खुलासा हुआ है कि अगर मौजूदा जलवायु नीतियां ही जारी रहीं, तो आने वाले दशकों में शीतकालीन खेलों के लिए उपयुक्त स्थान तेजी से कम होते जाएंगे। वॉटरलू विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ इंसब्रुक और यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के वैज्ञानिक शामिल थे।
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने उन 93 संभावित शहरों का विश्लेषण किया, जहां अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के मुताबिक पहले से शीतकालीन खेलों का बुनियादी ढांचा मौजूद है।
इस विश्लेषण के नतीजे बेहद चिंताजनक हैं। इनके मुतबिक यदि दुनिया मौजूदा जलवायु नीतियों पर ही चलती रही तो भविष्य में ओलंपिक खेलों के लिए 52 और पैरालंपिक खेलों के लिए महज 22 स्थान ही जलवायु की दृष्टि से भरोसेमंद रह जाएंगे।
इटली में होने वाले 2026 शीतकालीन ओलंपिक भी इसी संकट की चपेट में हैं। मिलान और पहाड़ी शहर कॉर्टिना एम्पेजो की संयुक्त मेजबानी में होने वाले इन खेलों के लिए लाखों घन मीटर कृत्रिम बर्फ की जरूरत पड़ेगी। इसकी सबसे बड़ी वजह है, आल्प्स में ठंडे दिनों की संख्या का लगातार घटना।
क्लाइमेट सेंट्रल के मुताबिक कॉर्टिना में फरवरी का औसत तापमान 1956 के बाद से 3.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, जब वहां पिछली बार शीतकालीन ओलंपिक हुए थे। उस समय हर साल औसतन 214 दिन तापमान शून्य से नीचे रहता था। अब यह संख्या घटकर 173 दिन रह गई है, जो करीब 20 फीसदी की गिरावट को दर्शाती है।
कुछ ऐसा ही रुझान मिलान में भी देखा गया है, जहां फिगर स्केटिंग और आइस हॉकी जैसे इनडोर मुकाबले होंगे। वहां फरवरी का तापमान 3.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। ऐसे में मार्च में होने वाले विंटर पैरालंपिक के लिए हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
1950 के बाद शीतकालीन ओलंपिक की मेजबानी करने वाले सभी 19 शहरों में औसतन 2.7 डिग्री सेल्सियस की गर्मी बढ़ी है। कॉर्टिना में फरवरी के दौरान बर्फ की औसत मोटाई 1970 के दशक से अब तक करीब 15 सेंटीमीटर घट चुकी है।
2024 के एक अध्ययन में यह आकलन किया गया कि जलवायु परिवर्तन दुनिया भर के 93 पुराने और संभावित भविष्य के शीतकालीन ओलंपिक व पैरालंपिक मेजबान शहरों में खेलों की परिस्थितियों को कैसे प्रभावित कर सकता है।
अध्ययन में सामने आया है कि अभी 94 फीसदी स्थान जलवायु के लिहाज से उपयुक्त हैं, लेकिन 2050 तक यह आंकड़ा घटकर 56 फीसदी पर सिमट जाएगा। विंटर पैरालंपिक की स्थिति और भी गंभीर है। मार्च में होने वाले इन खेलों के लिए फिलहाल महज 53 फीसदी शहर ही भरोसेमंद माने जाते हैं। वहीं 2050 तक यह आंकड़ा 24 फीसदी तक गिर सकता है।
वॉटरलू विश्वविद्यालय और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर डॉक्टर डैनियल स्कॉट का इस बारे में कहना है, “जलवायु परिवर्तन यह तय कर रहा है कि शीतकालीन ओलंपिक और पैरालंपिक कहां हो सकते हैं। पैरालंपिक खेलों पर खतरा कहीं ज्यादा है, और हमें इससे निपटने के लिए तुरंत समाधान तलाशने होंगे।“
कहीं न कहीं खिलाड़ी भी इस बदलाव को महसूस कर रहे हैं। सर्वे बताते हैं कि 94 फीसदी शीर्ष खिलाड़ी और कोच मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन उनके खेल के भविष्य को नुकसान पहुंचाएगा। कई खिलाड़ियों को प्रशिक्षण के लिए अलग-अलग देशों में “बर्फ की तलाश” करनी पड़ रही है।
तारीख बदलने से बढ़ सकता है पैरालंपिक का भविष्य
अपने इस शोध में शोधकर्ताओं ने अलग-अलग अनुकूलन रणनीतियों का अध्ययन किया है। इसके मुताबिक ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों को एक साथ फरवरी में आयोजित करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि इससे खेलों का आकार और जटिलता करीब-करीब दोगुनी हो जाती है।
हालांकि, एक अहम समाधान सामने आया है, दोनों खेलों को कुछ हफ्ते पहले आयोजित करना। विश्लेषण दर्शाता है कि अगर पैरालंपिक खेल फरवरी के आखिरी सप्ताह में शुरू हों, तो जलवायु के लिहाज से सुरक्षित मेजबान शहरों की संख्या बढ़कर 38 तक पहुंच सकती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ इंसब्रुक में प्रोफेसर डॉक्टर रॉबर्ट स्टाइगर के मुताबिक, “तारीख में कुछ हफ्तों के ही बदलाव से ही बड़ा फर्क पड़ता है। यह पैरालंपिक खिलाड़ियों की सुरक्षा और निष्पक्षता बनाए रखने का मजबूत विकल्प है।“
बिना कृत्रिम बर्फ के नहीं बचेंगे शीतकालीन खेल
रिसर्च में यह भी साफ किया गया है कि स्नो मेकिंग यानी कृत्रिम बर्फ के बिना शीतकालीन ओलंपिक की कल्पना करना लगभग असंभव होगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर स्नो मेकिंग का इस्तेमाल नहीं किया गया, तो 2050 के दशक तक महज चार स्थान ही ऐसे बचेंगे जहां विंटर गेम्स हो सकेंगे।
डॉक्टर स्कॉट का कहना है, “बीजिंग समेत हाल के खेलों में स्नो मेकिंग की आलोचना हुई है, लेकिन इसके बिना शीतकालीन खेलों की कल्पना करना वैसा ही है जैसे हॉकी या फिगर स्केटिंग को फिर से खुले मैदान में ले जाना।“
उनके मुताबिक स्नोमेकिंग छोड़ी गई, तो असुरक्षित हालात, रद्द प्रतियोगिताएं और बिना बर्फ वाले शीतकालीन गेम्स तय हैं।
अनुमान है कि इतालवी आल्प्स के ऊंचे पहाड़ी इलाके, खासकर कॉर्टिना शहर के आसपास होने के बावजूद, 2026 ओलंपिक में 30 लाख क्यूबिक यार्ड से अधिक कृत्रिम बर्फ की जरूरत पड़ेगी।
हालांकि देखा जाए तो बड़े स्तर के शीतकालीन खेलों में कृत्रिम बर्फ अब आम हो चुकी है, लेकिन इसकी भी अपनी सीमाएं हैं। बर्फ जमने के लिए लगातार शून्य से नीचे तापमान जरूरी होता है। अगर तापमान ज्यादा रहा तो बारिश, असमान सतह और कठोर बर्फ से खिलाड़ियों के चोटिल होने का खतरा बढ़ जाता है।
जलवायु से अछूता नहीं कोई खेल
टोरंटो विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉक्टर मैडलिन ओर का स्पष्ट तौर पर कहना है, “कोई भी खेल जलवायु परिवर्तन के असर से नहीं बच सकता। जिन खिलाड़ियों ने अपना जीवन खेल को समर्पित किया है, वे सुरक्षित और निष्पक्ष परिस्थितियों के हकदार हैं।“
उन्होंने जोर देकर कहा है, "लोगों को साथ मिलकर इसके समाधान खोजने होंगें और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करना होगा।“
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने भी 2030 से खेलों को “क्लाइमेट पॉजिटिव” बनाने का वादा किया है। लेकिन आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि बढ़ती गर्मी के साथ शीतकालीन ओलंपिक की मेजबानी करने योग्य जगहें लगातार कम होती जाएंगी।
‘एडवांसिंग क्लाइमेट चेंज रेजिलिएंस ऑफ द विंटर ओलंपिक-पैरालंपिक गेम्स’ नामक इस अध्ययन के नतीजे जर्नल करंट इश्यूज इन टूरिज्म में प्रकाशित हुए हैं।
गौरतलब है कि इससे पहले भी इसी टीम की एक स्टडी की सिफारिशों को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति अपना चुकी है, जो दर्शाता है कि जलवायु संकट के दौर में खेलों का भविष्य अब सही नीतियों और फैसलों पर टिका है।
यह अध्ययन एक बार फिर दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन किसी एक क्षेत्र या गतिविधि तक सीमित नहीं है। खेलों का भविष्य भी उसी वैश्विक संघर्ष से जुड़ा है, जिसमें आज लिए गए फैसले तय करेंगे कि आने वाली पीढ़ियां शीतकालीन ओलंपिक को सिर्फ तस्वीरों में देखेंगी या बर्फ पर खेलते हुए।