

1950 में दुनिया ने छह अरब टन सीओ2 उत्सर्जित किया, जो 2024 में बढ़कर सालाना 38 अरब टन से अधिक हो गया है।
2024 में केवल 32 बड़ी कंपनियों ने वैश्विक सीओ2 उत्सर्जन का लगभग 50 प्रतिशत उत्सर्जन किया।
2015 के पेरिस समझौते में 196 देशों ने मध्य 21वीं सदी तक जलवायु तटस्थता हासिल करने का लक्ष्य तय किया।
औद्योगिक क्रांति से पहले उत्सर्जन कम था, पर 1990 तक दुनिया भर में सीओ2 स्तर 20 अरब टन से अधिक पहुंचा।
पूरी दुनिया आज एक बड़ी समस्या का सामना कर रही है, जिसे हम जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं। यह समस्या किसी एक देश या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी पृथ्वी को प्रभावित कर रही है। ग्लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा कारण कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) जैसी गैसों का बढ़ता उत्सर्जन है। इसी कारण हर साल 28 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय सीओ2 उत्सर्जन कम करने का दिवस मनाया जाता है।
इस दिवस का उद्देश्य लोगों, सरकारों और कंपनियों को यह याद दिलाना है कि अगर हमें अपने ग्रह को सुरक्षित रखना है, तो हमें सीओ2 उत्सर्जन को कम करना ही होगा। यह दिन हमें प्रेरित करता है कि हम अपने रोजमर्रा के जीवन में छोटे-छोटे बदलाव करके पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं।
सीओ2 और जलवायु परिवर्तन
सीओ2 एक ग्रीनहाउस गैस है, जो पृथ्वी के चारों ओर एक परत बना लेती है। यह परत सूर्य की गर्मी को बाहर जाने से रोकती है, जिससे पृथ्वी का तापमान धीरे-धीरे बढ़ता है। इस प्रक्रिया को ग्रीनहाउस प्रभाव कहा जाता है। जब यह प्रभाव जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है, तो ग्लोबल वार्मिंग होती है।
आज हम इसके परिणाम साफ देखे जा सकते हैं -
सूखा और बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं
जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ी हैं
पीने के पानी की कमी हो रही है
मौसम का संतुलन बिगड़ गया है
सीओ2 उत्सर्जन का इतिहास
वैज्ञानिकों को सीओ2 और तापमान के संबंध के बारे में बहुत पहले से जानकारी थी।
1824 में जोसेफ फूरियर ने बताया कि पृथ्वी जितनी ठंडी होनी चाहिए, उतनी नहीं है, क्योंकि वातावरण एक कंबल की तरह काम करता है।
1856 में यूनिस न्यूटन फूट ने कहा कि गैसों की मात्रा बदलने से पृथ्वी का तापमान बदल सकता है।
1896 में स्वांते आरहीनियस ने बताया कि सीओ2 बढ़ने से पृथ्वी गर्म होगी।
1938 में गाइ कैलेंडर ने यह साबित किया कि सीओ2 उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग आपस में जुड़े हैं।
औद्योगिक क्रांति के बाद स्थिति
औद्योगिक क्रांति से पहले सीओ2 उत्सर्जन बहुत कम था।
1950 में दुनिया ने लगभग छह अरब टन सीओ2 उत्सर्जित किया।
1990 तक यह बढ़कर 20 अरब टन हो गया।
आज हम हर साल 38 अरब टन से अधिक सीओ2 उत्सर्जित कर रहे हैं।
हाल के वर्षों में उत्सर्जन की गति थोड़ी धीमी हुई है, लेकिन अभी तक यह अपने उच्चतम स्तर पर नहीं पहुंची है।
बड़ी कंपनियों की भूमिका
हाल की रिपोर्टों के अनुसार, 2024 में केवल 32 कंपनियां दुनिया के कुल सीओ2 उत्सर्जन का लगभग 50 फीसदी उत्सर्जन कर रही थीं। इनमें से ज्यादातर कंपनियां सरकारी स्वामित्व वाली हैं। एशियाई कंपनियां, खासकर चीन की, सबसे बड़ा योगदान कर रही हैं।
यह दिखाता है कि केवल आम लोगों पर ही नहीं, बल्कि बड़ी कंपनियों और सरकारों पर भी बड़ी जिम्मेदारी है।
वैश्विक प्रयास
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया ने कुछ अहम कदम उठाए हैं।
1997 में क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें विकसित देशों को उत्सर्जन कम करने की जिम्मेदारी दी गई।
2015 में पेरिस समझौता हुआ, जिसमें 196 देशों ने ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने का वादा किया।
इनका लक्ष्य है कि 21वीं सदी के मध्य तक दुनिया को जलवायु-तटस्थ (क्लाइमेट नेचुरल) बनाया जाए।
आम लोग क्या कर सकते हैं?
अंतरराष्ट्रीय सीओ2 उत्सर्जन कम करने का दिवस हमें यह सिखाता है कि हर व्यक्ति का योगदान मायने रखता है। हम सभी छोटे कदम उठाकर बड़ा बदलाव ला सकते हैं, जैसे -
बिजली की बचत करना
सार्वजनिक यातायात का उपयोग करना
साइकिल या पैदल चलना
पेड़ लगाना
प्लास्टिक का कम उपयोग करना
ऊर्जा-सक्षम उपकरणों का प्रयोग करना
अंतरराष्ट्रीय सीओ2 उत्सर्जन कम करने का दिवस केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि एक संदेश है। यह हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी हमारे पास सीमित संसाधनों के साथ है। अगर हम आज सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।
अगर हर व्यक्ति हर दिन थोड़ा-सा भी प्रयास करे, तो हम अपनी पृथ्वी को सुरक्षित, स्वच्छ और रहने योग्य बना सकते हैं, आज के लिए भी और आने वाले भविष्य के लिए भी।