

भारत में भूजल कृषि, पीने के पानी, उद्योग और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जीवनदायिनी संसाधन के रूप में कार्य करता है।
मध्यम भूजल स्तर पौधों की वृद्धि और कार्बन भंडारण को बढ़ाता है, जबकि बहुत गहरा स्तर हानि पहुंचाता है।
मानसून क्षेत्रों में जलभराव से पौधों की जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिलती, जिससे उत्पादकता और कार्बन संचित करने की क्षमता कम हो जाती है।
भूजल की कमी से पारिस्थितिकी तंत्र कार्बन कम जमा करता है, जिससे वायुमंडलीय कार्बन बढ़ता और जलवायु परिवर्तन तेज होता है।
स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर सतत भूजल प्रबंधन आवश्यक है, ताकि पारिस्थितिकी तंत्र, कृषि और जलवायु सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोग करने वाला देश है। भूजल कृषि, पीने के पानी, उद्योग और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जीवनदायिनी संसाधन है। हालांकि भूजल की कमी का प्रभाव इन क्षेत्रों पर पहले से जाना गया है, लेकिन इसका असर पारिस्थितिकी तंत्र की कार्बन भंडारण क्षमता और जल चक्र पर कैसे पड़ता है, यह अब तक पूरी तरह समझा नहीं गया था। अधिकांश अध्ययन केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित थे, जिससे पूरे देश के परिदृश्य पर जानकारी की कमी थी।
हाल ही में भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के शोध ने यह दिखाया है कि भूजल का स्तर सीधे पौधों की कार्बन संचित करने की क्षमता को प्रभावित करता है। शोध में उपग्रह चित्रण, मौजूदा आंकड़े और सांख्यिकीय मॉडल का उपयोग कर विभिन्न क्षेत्रों में भूजल स्तर और पारिस्थितिकी तंत्र की कार्बन भंडारण क्षमता के बीच संबंध का अध्ययन किया गया। यह अध्ययन इकोलॉजिकल इन्फार्मेटिक्स नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
भूजल का सही स्तर और पौधों की वृद्धि
शोध के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जल ताल का स्तर को मापा, जो भूमि की सतह और भूमिगत जल के बीच की दूरी को दर्शाता है। साथ ही, उन्होंने पौधों की उत्पादकता मापने के लिए सकल प्राथमिक उत्पादकता (जीपीपी) और कुल प्राथमिक उत्पादकता (एनपीपी) का मूल्यांकन किया। इसके अलावा वाष्पोत्सर्जन का अध्ययन किया गया, जो पौधों द्वारा वायुमंडल में छोड़े गए पानी की मात्रा को दर्शाता है।
शोध में दो महत्वपूर्ण संकेतकों का मूल्यांकन किया गया-
कार्बन उपयोग क्षमता: यह दर्शाती है कि पौधे कितनी कुशलता से अवशोषित कार्बन को वृद्धि में बदलते हैं।
जल उपयोग क्षमता : यह बताती है कि पौधे हर यूनिट पानी में कितनी कार्बन संचित कर सकते हैं।
पौधों की वृद्धि के लिए जल और कार्बन दोनों की आवश्यकता होती है। शोध अनुसार, जब पानी की कमी होती है, खासकर प्राकृतिक जंगलों और घास के मैदानों में, तो पौधे जल संरक्षण और वृद्धि के बीच चयन करने के लिए मजबूर होते हैं। अतः भूजल की कमी पौधों की वृद्धि और कार्बन भंडारण क्षमता को कम कर देती है।
भूजल का स्तर और उत्पादकता का संबंध
अध्ययन में पाया गया कि भारत के अधिकांश हिस्सों में भूजल का गहरा स्तर पौधों की उत्पादकता और कार्बन भंडारण क्षमता को कम कर देता है। जब पौधों को पानी जमीन के नीचे गहरे स्तर से खींचना पड़ता है, तो उनकी वृद्धि धीमी हो जाती है और वे कम कार्बन संचित कर पाते हैं।
हालांकि मानसून के दौरान अधिक बारिश वाले इलाकों में यह पैटर्न अलग होता है। इन क्षेत्रों में भूजल स्तर बहुत कम गहरा होता है और भारी बारिश के कारण मिट्टी में जलभराव हो जाता है। इससे जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती और उत्पादकता कम हो जाती है। सिंचाई वाली खेती के इलाकों में भी ऐसा देखा गया।
इसका मतलब है कि बहुत कम या बहुत ज्यादा भूजल दोनों ही पौधों की वृद्धि और कार्बन भंडारण क्षमता को सीमित कर सकते हैं। शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि बहुत पानी से जलभराव और पौधों की मृत्यु हो सकती है, जबकि बहुत गहरा पानी पौधों की जड़ों तक पानी पहुंचने में बाधा डालता है। अधिकांश पौधे मध्यम, स्थायी भूजल स्तर में ही अच्छे से बढ़ते हैं।
राष्ट्रीय नजरिया और जल प्रबंधन
यह अध्ययन पूरे देश के स्तर पर दिखाता है कि भूजल प्रबंधन से पारिस्थितिकी तंत्र और जलवायु पर कैसे असर पड़ता है। इससे नीति निर्माता यह पहचान सकते हैं कि किन क्षेत्रों में अत्यधिक भूजल उपयोग से पर्यावरणीय दबाव अधिक है और क्षेत्र-विशेष रणनीति बनाई जा सकती है।
शोध में कहा गया है कि भारत में मानसून आधारित जलवायु में बारिश असमान होती है और सूखे के वर्ष आते रहते हैं। ऐसे समय में भूजल पारिस्थितिकी तंत्र का प्राथमिक जल स्रोत बन जाता है। यदि भूजल समाप्त हो जाए, तो प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित होंगे।
जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव
यदि भूजल की कमी के कारण पारिस्थितिकी तंत्र की वृद्धि कम हो जाती है, तो कम कार्बन जमा होगा और अधिक कार्बन वायुमंडल में रहेगा। इससे वायुमंडलीय कार्बन स्तर बढ़ेगा, लू या हीटवेव और सूखे जैसी परिस्थितियां और गंभीर हो जाएंगी। स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र प्राकृतिक जलवायु बफर का काम करता है और भूजल की कमी इसे कमजोर कर देती है।
कुल मिलाकर भूजल को केवल जल स्रोत के रूप में नहीं बल्कि प्राकृतिक जलवायु नियंत्रण सेवा के रूप में भी मानना आवश्यक है। मध्यम, स्थायी भूजल स्तर पौधों की वृद्धि, पारिस्थितिकी तंत्र और कार्बन भंडारण के लिए आवश्यक है। अत्यधिक भूजल उपयोग या भूजल की कमी दोनों ही पर्यावरण और जलवायु के लिए हानिकारक हैं। नीति निर्धारण में भूजल संरक्षण और सतत जल प्रबंधन को शामिल करना जरूरी है।