

पश्चिमी हवाएं अब केवल बारिश नहीं, बल्कि बिना वर्षा भी तिब्बती पठार तक नमी पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
वैज्ञानिकों ने तिब्बती पठार में वायुमंडल की तीन परतें खोजीं, जो स्थानीय और बाहरी नमी को अलग-अलग नियंत्रित करती हैं।
रात के समय तापमान गिरने से वायुमंडल में “डिकपलिंग” प्रक्रिया होती है, जिससे नमी नीचे की परतों में जुड़ती है।
अध्ययन में पाया गया कि लगभग 30 प्रतिशत नमी बिना बारिश के भी वायुमंडलीय प्रक्रियाओं से जल चक्र में शामिल होती है।
यह शोध एशियाई जल टावरों के जल स्रोत को समझने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का बेहतर अनुमान लगाने में मदद करेगा।
वैज्ञानिकों ने एशिया के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र, जिसे “एशियाई जल टावर” कहा जाता है, में पानी पहुंचने की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण नई खोज की है। यह क्षेत्र लगभग 4,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित है और यहां से निकलने वाली नदियां करीब दो अरब लोगों की पानी की जरूरतें पूरी करती हैं।
अब तक माना जाता था कि यहां पानी मुख्य रूप से भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून से आता है, लेकिन नई रिसर्च ने बताया है कि पश्चिमी हवाएं भी पूरे साल इसमें अहम भूमिका निभाती हैं।
पश्चिमी हवाओं की छुपी भूमिका सामने आई
चीनी विज्ञान अकादमी के शोधकर्ताओं और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने पाया है कि मध्य अक्षांशों से आने वाली पश्चिमी हवाएं केवल बारिश के जरिए ही नहीं, बल्कि एक “ऊर्ध्वाधर परिवहन” प्रक्रिया के जरिए भी नमी को इस क्षेत्र तक पहुंचाती हैं। यह प्रक्रिया बारिश के बिना भी हवा में मौजूद पानी को नीचे की परतों तक लाने में मदद करती है। यह अध्ययन प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
गुब्बारों और आधुनिक मॉडल से हुई जांच
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया। उन्होंने हीलियम से भरे विशेष “जिमू बैलून” की मदद से तिब्बती पठार के दो जगहों लुलांग और नामको पर वायुमंडल के अलग-अलग स्तरों से नमूने लिए। इसके साथ ही उन्होंने एक उन्नत कंप्यूटर मॉडल एचएम6 -विसो का उपयोग किया, जिससे हवा में मौजूद पानी के अणुओं और उनके समस्थानिकों का विश्लेषण किया गया।
इस अध्ययन में पहली बार वायुमंडल की ऊर्ध्वाधर संरचना को इतने विस्तार से समझा गया।
वायुमंडल की तीन परतों की पहचान
वैज्ञानिकों ने पाया कि इस क्षेत्र का वायुमंडल तीन मुख्य परतों में बंटा होता है। सबसे नीचे की परत लगभग 600 से 900 मीटर तक होती है, जहां स्थानीय नमी दिन और रात के तापमान से प्रभावित होती है। इसके ऊपर 600 से 1600 मीटर के बीच एक मध्य परत होती है, जहां नमी अपेक्षाकृत स्थिर रहती है। सबसे ऊपर 1600 से 1800 मीटर से ऊपर की परत है, जहां पश्चिमी हवाओं द्वारा लाई गई नमी मौजूद रहती है। यह ऊपरी नमी हिमालयी बाधा को पार करके इस क्षेत्र तक पहुंचती है।
रात में होने वाली ‘डिकपलिंग’ प्रक्रिया
शोधकर्ताओं ने पाया कि रात के समय एक खास प्रक्रिया होती है जिसे “डिकपलिंग” कहा गया है। इसमें तापमान गिरने के कारण वायुमंडल में अलग-अलग परतें बन जाती हैं, जो एक-दूसरे से कम मिलती हैं। ये परतें एक तरह की “ढक्कन” की तरह काम करती हैं और हवा के मिश्रण को रोक देती हैं।
इस स्थिति में ऊपर की परतों में मौजूद नमी नीचे की परतों के साथ सीधे नहीं मिलती, लेकिन ठंडा होने के कारण संघनन होता है, जिससे पानी की मात्रा नीचे की ओर जुड़ जाती है।
बारिश के बिना भी पानी का जुड़ना
इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि बारिश के बिना भी वायुमंडल में मौजूद पानी का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय जल चक्र में शामिल हो जाता है। यह मुख्य रूप से रात के समय होने वाले संघनन और परतों के अलगाव के कारण होता है। इसका मतलब है कि पश्चिमी हवाएं केवल बारिश लाने का काम नहीं करतीं, बल्कि लगातार वातावरण में नमी जोड़ती रहती हैं।
जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में महत्व
यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और नदियों के प्रवाह में बदलाव आ रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि पानी का स्रोत केवल मानसून नहीं है, बल्कि पश्चिमी हवाओं की यह छुपी भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अध्ययन से जलवायु मॉडल अधिक सटीक बन सकेंगे और भविष्य में पानी की उपलब्धता को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।
यह शोध बताता है कि एशियाई जल टावरों में पानी पहुंचाने की प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक जटिल और गतिशील है। पश्चिमी हवाएं और रात में होने वाली वायुमंडलीय प्रक्रियाएं मिलकर इस विशाल क्षेत्र के जल चक्र को संतुलित रखती हैं, जो करोड़ों लोगों के जीवन से सीधे जुड़ा हुआ है।