2026 का ‘सुपर अल नीनो’: अभूतपूर्व गर्मी, सूखा, बाढ़ और वैश्विक महाविनाश का खतरा

1876-78 से भी अधिक ताकतवर हो सकता है यह महासागरीय तूफान, पृथ्वी पहले से 1.4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म हो चुकी है। ऐसे में हीटवेव, सूखा, बाढ़ और जंगलों में आग जैसी चरम घटनाओं के नए रिकॉर्ड की आशंका जताई जा रही है
2026 का ‘सुपर अल नीनो’: अभूतपूर्व गर्मी, सूखा, बाढ़ और वैश्विक महाविनाश का खतरा
फोटो: विकास चौधरी / सीएसई
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इस साल यानी 2026 के अंत तक एक बेहद शक्तिशाली महासागरीय-वायुमंडलीय घटना, “सुपर अल नीनो” के विकसित होने की आशंका जताई जा रही है। इसका व्यापक असर न सिर्फ दुनिया के कई हिस्सों में छोटी और मध्यम अवधि वाले मौसमों पर बल्कि लंबी अवधि के जलवायु पर भी पड़ सकता है। इस घटना के चलते लोगों की आजीविका पर भी गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है। खासतौर से खेती-किसानी, समुदायों के स्वास्थ्य, जल उपलब्धता, पारिस्थितिक तंत्रों और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर इसका नकारात्मक असर दिखाई दे सकता है। भारत भी उन देशों में शामिल है, जो शायद इसके व्यापक प्रभावों से बच नहीं पाएगा। अल नीनो के सबसे तात्कालिक प्रभावों में कुछ क्षेत्रों में हीटवेव, सूखा और जंगलों में आग जैसी चरम मौसमी घटनाएं देखने को मिल सकती हैं, जबकि अन्य इलाकों में अत्यधिक वर्षा, तूफान और बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इन घटनाओं की तीव्रता इस बात पर निर्भर करती है कि अल नीनो कितना शक्तिशाली है और इसके साथ दूसरे महासागरों तथा स्थानीय मौसम प्रणालियों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है।

लंबी अवधि में सुपर अल नीनो पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में बड़े और स्थायी बदलाव भी पैदा कर सकता है। इन बदलावों को “क्लाइमेट रिजीम शिफ्ट” (सीआरएस) कहा जाता है। दिसंबर 2025 में जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक शोध पत्र के मुताबिक, सीआरएस दरअसल जलवायु प्रणाली की अलग-अलग स्थिर अवस्थाओं के बीच अचानक और लंबे समय तक बने रहने वाले बदलाव हैं। शोध के अनुसार, यह बदलाव पारिस्थितिक तंत्रों और मानव कल्याण, दोनों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।

क्राइस्ट चाइल्ड

स्पेनिश भाषा में अल नीनो का अर्थ “क्राइस्ट चाइल्ड” या “द बॉय” होता है। यह नाम 17वीं सदी में पेरू के मछुआरों ने दिया था, जिन्होंने भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में इस असामान्य मौसमी घटना को सबसे पहले दर्ज किया था।

मछुआरों ने पाया कि कुछ वर्षों के अंतराल पर क्रिसमस के आसपास पेरू के तट के पास समुद्र का पानी सामान्य से कहीं अधिक गर्म हो जाता था। सतही जल के गर्म होने से मछलियां कम मात्रा में सतह के पास आती थीं, जिससे वे कम मछलियां हासिल करते थे। बाद में वैज्ञानिकों ने पाया कि इस दौरान गर्म पानी केवल पेरू के तट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूर्वी और मध्य भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के बड़े हिस्से में फैल जाता है। साथ ही इसका असर समुद्र की सतह के ऊपर मौजूद वायुमंडल पर भी पड़ता है। आगे चलकर हुए शोधों में अल नीनो की इस घटना को अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन (ईएनएसओ) की उस अवस्था के रूप में परिभाषित किया गया, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है।

इस घटना का एक ठंडा चरण भी होता है, जिसे ला नीना या “द गर्ल” कहा जाता है। इसके प्रभाव ज्यादातर अल नीनो के उलट होते हैं। आमतौर पर ये घटनाएं हर दो से सात साल के बीच देखने को मिलती हैं। किसी अल नीनो की आधिकारिक घोषणा तब की जाती है, जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र सतह तापमान (एसएसटी) सामान्य से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाए। यह “सामान्य” स्थिति ओशन नीनो इंडेक्स (ओएनआई) के आधार पर तय की जाती है। ओएनआई नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र सतह तापमान का तीन महीने का औसत होता है। यह क्षेत्र मध्य भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का एक अहम हिस्सा है।

अमेरिका के नेशनल ओशियानिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के मुताबिक, अल नीनो की तीव्रता इस बात से तय होती है कि ओएनआई शून्य से कितना ऊपर है। यदि ओएनआई 0.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो तो अल नीनो को कमजोर, 1.0 डिग्री पर मध्यम, 1.5 डिग्री पर मजबूत और 2.0 डिग्री या उससे ऊपर होने पर बहुत मजबूत माना जाता है। एनओएए के अनुसार, जलवायु विज्ञान में जितना अधिक शक्तिशाली अल नीनो होगा, उसके प्रभाव भी उतने ही व्यापक और गंभीर होंगे।

एनओएए के अलावा दुनिया भर की कई मौसम एजेंसियां भी अल नीनो की निगरानी करती हैं। इसके लिए उपग्रह अवलोकनों और भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर लगाए गए स्वचालित तैरते उपकरणों का नेटवर्क बॉय (बीयूओवाई) से प्राप्त समुद्र सतह तापमान के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) भी ईएनएसओ परिस्थितियों का नियमित आकलन करता है और विभिन्न राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय मौसम एजेंसियों के विश्लेषणों के आधार पर आधिकारिक स्थिति जारी करता है।

अल नीनो के दौरान पूर्वी और मध्य प्रशांत महासागर के ऊपर पश्चिम की ओर बहने वाली व्यापारिक हवाएं (उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में चलने वाली स्थिर पूर्वी हवाओं को कमजोर व्यापारिक हवाएं कहा जाता है ) सामान्य से काफी कमजोर पड़ जाती हैं। कई बार वे उलटी दिशा में भी बहने लगती हैं। इसके कारण गर्म सतही जल पश्चिम की ओर नहीं जा पाता और ठंडे पानी का ऊपर आना भी कम हो जाता है। नतीजतन इस क्षेत्र में समुद्र सतह तापमान तेजी से बढ़ने लगता है।

समुद्री सतह के तापमान में यह वृद्धि और व्यापारिक हवाओं की कमजोरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह के वायुमंडलीय प्रभाव पैदा करती है। इनमें सबसे प्रमुख प्रभाव पूर्वी प्रशांत महासागर में वर्षा बढ़ना और ऑस्ट्रेलिया तथा मैरिटाइम कॉन्टिनेंट क्षेत्र में वर्षा कम होना है।

आमतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप में अल नीनो की स्थिति दक्षिण-पश्चिम माॅनसून के दौरान वर्षा को कमजोर कर देती है, जबकि उत्तर-पूर्व मानसून के समय वर्षा बढ़ा सकती है। ऐसी अल नीनो घटनाएं, जिनमें ओएनआई 2.0 डिग्री सेल्सियस से काफी ऊपर पहुंच जाता है और जिनके प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किए जाते हैं, उन्हें कभी-कभी “सुपर अल नीनो” भी कहा जाता है। दिसंबर 2025 में प्रकाशित नेचर कम्युनिकेशंस के अध्ययन में 1950 के बाद की तीन सुपर अल नीनो घटनाओं की पहचान की गई है। इनमें वर्ष 1982-83, 1997-98 और 2015-16 शामिल हैं।

आकार लेता महाविनाश

2026 की उत्तरी गोलार्ध की गर्मियों के दौरान पृथ्वी पर अल नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है। अनुमान बताते हैं कि यह घटना 1876-1878 के अल नीनो जैसी ताकत हासिल कर सकती है, जिसे अब तक का दर्ज सबसे विनाशकारी अल नीनो माना जाता है। उस दौर में दुनिया के कई हिस्सों में भीषण सूखा पड़ा था, अकाल फैला था और लाखों लोगों की मौत हुई थी। विश्व मौसम संगठन ने भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो परिस्थितियों के विकसित होने की घोषणा कर दी है। इससे पहले दो जून को विश्व मौसम संगठन ने कहा कि जून से अगस्त 2026 के बीच भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो परिस्थितियां विकसित होने की 80 प्रतिशत आशंका जताई थी। संगठन के मुताबिक, नवंबर 2026 तक अल नीनो के बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत तक है। वहीं, एक जून को जारी अमेरिका के नेशनल ओशियानिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के अल नीनो अपडेट में मई से जुलाई 2026 के बीच इसके विकसित होने की संभावना 82 प्रतिशत बताई गई। एजेंसी ने यह भी अनुमान जताया कि दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक उत्तरी गोलार्ध की सर्दियों के दौरान इसके बने रहने की संभावना 96 प्रतिशत है।

यह ध्यान देने लायक है कि हर अल नीनो के प्रभाव अलग-अलग होते हैं। मसलन, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में समुद्री सतह कितनी और किस पैटर्न में गर्म हो रही है, वायुमंडल की स्थिति कैसी है और जलवायु में स्वाभाविक उतार-चढ़ाव किस तरह काम कर रहे हैं। इसके बावजूद, अल नीनो को आमतौर पर बढ़ते तापमान, कई क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा, कुछ इलाकों में अत्यधिक बारिश और चरम मौसमी घटनाओं से जोड़ा जाता है।

2026 के संभावित अल नीनो और पहले की घटनाओं (खासकर 1876-1878 के विनाशकारी अल नीनो) के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि आज पृथ्वी पहले से कहीं अधिक गर्म हो चुकी है। औद्योगिक काल से पहले यानी 1850-1900 की तुलना में महासागर और वायुमंडल अब ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण काफी ज्यादा गर्म हैं।

यूरोपीय संघ की कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार, पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक-पूर्व काल की तुलना में पहले ही 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। यह अतिरिक्त गर्मी और उससे पैदा हुआ जलवायु परिवर्तन अल नीनो के प्रभावों को और तीव्र बना सकता है। साथ ही इससे वैश्विक औसत तापमान नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है।

कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट फॉर वाटर रिसोर्सेज और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया एग्रीकल्चर एंड नेचुरल रिसोर्सेज से जुड़े जलवायु वैज्ञानिक डैनियल स्वेन ने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि गर्मियों के अंत तक विकसित होने वाला अल नीनो मजबूत से अत्यधिक मजबूत श्रेणी तक पहुंच सकता है, जबकि महासागरों के गर्म होने के कारण वैश्विक तापमान का आधार स्तर पहले ही ऊपर जा चुका है। उन्होंने कहा, “इसका मतलब है कि 2026 या 2027 या संभव है दोनों ही साल, वैश्विक तापमान का नया रिकॉर्ड बना सकते हैं।”

डब्ल्यूएमओ के मुताबिक, 2023-24 का पिछला अल नीनो ग्रीनहाउस गैसों से पैदा हुई तेज गर्मी के साथ मिलकर 2024 को अब तक का सबसे गर्म वर्ष बना चुका है। अब 2026 के संभावित अल नीनो की तुलना पिछली सुपर अल नीनो घटनाओं से की जा रही है, जिनके दौरान दुनिया ने व्यापक सूखा, भीषण गर्मी, हीटवेव, जंगलों में आग और बड़े पैमाने पर कोरल ब्लीचिंग जैसी घटनाएं देखी थीं।

2026 के अल नीनो के लिए ओएनआई आधारित मौसम मॉडल संकेत दे रहे हैं कि यह 1876-78 के ऐतिहासिक अल नीनो से भी अधिक शक्तिशाली हो सकता है। इसे अब तक का सबसे विनाशकारी अल नीनो माना जाता रहा है। उसी घटना को वैश्विक अकाल का एक प्रमुख कारण माना जाता है, जिसमें करीब पांच करोड़ लोगों की मौत हुईं थीं। हालांकि, 150 साल पहले की दुनिया आज की तुलना में कहीं अधिक ठंडी थी। 2026 का संभावित अल नीनो ऐसे समय में विकसित हो रहा है, जब पृथ्वी पहले ही औद्योगिक-पूर्व काल की तुलना में 1.4 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो चुकी है। 1876-78 और 1982-83 के बीच केवल 1888-89 का अल नीनो ही ऐसा था, जिसे सुपर अल नीनो की श्रेणी में रखा जा सकता है।

दिसंबर 2018 में जर्नल ऑफ क्लाइमेट में प्रकाशित एक शोध पत्र में 1875-1878 के वैश्विक सूखों के कारणों का विश्लेषण किया गया था। इस अवधि में एशिया, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के कई हिस्सों में अकाल पड़ा था। अध्ययन के अनुसार, दोनों गोलार्धों के अनेक क्षेत्रों में लगातार कई मौसमों तक रिकॉर्ड तोड़ सूखा रहा। माॅनसून प्रभावित एशियाई क्षेत्रों ने 800 वर्षों में सबसे तीव्र और दूसरा सबसे व्यापक सूखा झेला था।

जैसे-जैसे जलवायु गर्म हो रही है, अल नीनो और ला नीना की घटनाएं और भी तीव्र और कुछ मामलों में अधिक बार हो सकती हैं, जिससे चरम मौसम का खतरा बढ़ जाता है। कुछ क्षेत्र अधिक शुष्क हो सकते हैं, वहीं अन्य क्षेत्रों में भारी वर्षा हो सकती है

शोधकर्ताओं ने पाया कि 1876-78 का रिकॉर्ड तोड़ अल नीनो (1877 का अत्यधिक मजबूत इंडियन ओशन डाइपोल और उत्तर अटलांटिक महासागर का रिकॉर्ड गर्मी होना) इन तीनों का संयुक्त प्रभाव वैश्विक सूखे, फसल विफलता और अकाल का कारण बना था। अध्ययन ने यह चेतावनी भी दी कि गर्म होती दुनिया में भविष्य में ऐसी घटनाएं फिर से हो सकती हैं। डैनियल स्वेन के अनुसार, “एक मजबूत अल नीनो घटना अस्थायी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण वैश्विक गर्मी पैदा करेगी। जब यह मानव गतिविधियों से उत्पन्न दीर्घकालिक गर्मी के ऊपर जुड़ जाएगी, तो पृथ्वी कम से कम 6 से 12 महीनों के लिए 1.5 डिग्री सेल्सियस से काफी ऊपर पहुंच सकती है।” उन्होंने कहा कि ग्रीनहाउस गैसों से पैदा अतिरिक्त गर्मी के बिना भी मजबूत अल नीनो घटनाएं वर्षा के पैटर्न को क्षेत्रीय से महाद्वीपीय स्तर तक बदल सकती हैं, जिससे सूखे और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। लेकिन 2026 तक दुनिया पहले ही लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुकी होगी, इसलिए इन प्रभावों की तीव्रता और अधिक बढ़ सकती है। स्वेन ने आगे कहा, “आधुनिक मानव इतिहास में हमने कभी भी ऐसी स्थिति में मजबूत या अत्यधिक मजबूत अल नीनो नहीं देखा, जब वैश्विक तापमान पहले से इतना अधिक हो। इसलिए 2026 के अंत और 2027 में बाढ़, सूखे और जंगलों में आग जैसी अभूतपूर्व वैश्विक घटनाएं देखना आश्चर्यजनक नहीं होगा।” वह जोड़ते हैं, “अल नीनो घटनाएं वैश्विक मौसम पैटर्न को बदल देती हैं। कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होती है, जबकि अन्य हिस्सों में सूखा और जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ जाती हैं।” इंडियाना यूनिवर्सिटी के जलवायु वैज्ञानिक और सहायक प्रोफेसर क्रिस्टोफर डब्ल्यू कैलहन ने डाउन टू अर्थ से इस मुद्दे पर कहा, “ऐसी चरम जलवायु स्थितियां बुनियादी ढांचे को नष्ट कर सकती हैं, संक्रामक बीमारियों के प्रसार को बढ़ा सकती हैं, फसल उत्पादन बाधित कर सकती हैं और उष्णकटिबंधीय देशों की आर्थिक वृद्धि को कमजोर कर सकती हैं।”

उन्होंने कहा, “सुपर अल नीनो सामान्य अल नीनो से अलग इसलिए होता है क्योंकि प्रशांत महासागर में गर्मी कहीं अधिक तीव्र हो जाती है, जिससे वैश्विक मौसम पर इसका असर भी अधिक व्यापक हो जाता है।” वहीं, लंबे समय के मौसम का अनुमान लगाने वाले विशेषज्ञ आंद्रेज फ्लिस के अनुसार, “इससे सामान्य मौसमी बदलाव चरम घटनाओं में बदल सकते हैं, जैसे विशाल बाढ़, गंभीर सूखा और तूफानों के रास्तों में बड़े बदलाव, जिनका असर पूरी पृथ्वी पर पड़ सकता है।”

नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, सुपर अल नीनो मध्य दक्षिण एशिया, पश्चिमी अमेजन, पूर्वी अफ्रीका और मध्य ऑस्ट्रेलिया में सतही मिट्टी की नमी के पैटर्न को बदल सकता है, जिससे दीर्घकालिक सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। शोध पत्र के मुताबिक, 1997-98 के सुपर अल नीनो के बाद मध्य ऑस्ट्रेलिया में सतही मिट्टी की नमी सूखी स्थिति से गीली स्थिति में बदल गई थी। वहां औसत नमी लगभग 20 मिमी से बढ़कर 40 मिमी तक पहुंच गई थी। लेकिन 2015-16 के सुपर अल नीनो के बाद वही क्षेत्र फिर से गीली स्थिति से सूखे की ओर लौट गया।

अध्ययन में पाया गया कि सामान्य अल नीनो घटनाएं केवल स्थानीय और अपेक्षाकृत कमजोर बदलाव पैदा करती हैं, जबकि सुपर अल नीनो “क्लाइमेट रिजीम शिफ्ट” की संभावनाओं में व्यापक और संगठित वृद्धि कर सकते हैं। समुद्री सतह के तापमान में बदलाव के प्रमुख क्षेत्र मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रशांत, दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर, दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत, मैक्सिको की खाड़ी और अटलांटिक महासागर के कुछ हिस्से बताए गए हैं। वहीं, सतही वायु तापमान में बड़े बदलाव पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और मैरिटाइम कॉन्टिनेंट क्षेत्र में देखे गए हैं। 2015-16 के सुपर अल नीनो ने उस समय वैश्विक औसत तापमान का रिकॉर्ड तोड़ दिया था और दुनिया के लगभग सभी महासागरों में बड़े पैमाने पर कोरल ब्लीचिंग का कारण बना था। इसके साथ ही इसने कई अल नीनो-संवेदनशील क्षेत्रों में गंभीर सूखे भी पैदा किए थे।

सुपर अल नीनो ऐसे समय में विकसित हो रहा है, जब पृथ्वी का वायुमंडल पहले से ही तेज गर्मी का सामना कर रहा है। 2023-24 का अल नीनो सुपर घटना नहीं थी, फिर भी इसका वैश्विक औसत तापमान और महासागरों के समुद्री सतह के तापमान पर व्यापाक असर पड़ा

कैलहन ने कहा, “हाल के वर्षों में ही हमें यह समझ में आया है कि अल नीनो के आर्थिक प्रभाव इसके खत्म होने के बाद भी कई वर्षों तक बने रहते हैं और दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि पर लगातार नकारात्मक असर डालते हैं।” जून 2023 में साइंस जर्नल में प्रकाशित कैलहन और डार्टमाउथ कॉलेज के जस्टिन एस मैनकिन के शोध पत्र में दिखाया गया कि अल नीनो “देश की आर्थिक वृद्धि को लगातार कमजोर करता है।” शोध पत्र के अनुसार, “ये लगातार प्रभाव (ग्रोथ इफेक्ट्स) किसी अर्थव्यवस्था की बढ़ने की क्षमता को कम कर देते हैं और समय के साथ उनका असर बढ़ता जाता है। इन प्रभावों को कम करके आंकना आर्थिक नुकसान की वास्तविक लागत को समझने में बड़ी बाधा है।” कैलहन और मैनकिन ने अनुमान लगाया कि 1982-83 के अल नीनो से वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 4.1 ट्रिलियन डॉलर और 1997-98 की घटना से करीब 5.7 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ था। उन्होंने अल नीनो से पहले और बाद की आर्थिक वृद्धि की तुलना करके इसके संचयी प्रभावों का आकलन किया। उनका अध्ययन घटना के पांच साल बाद तक के प्रभावों पर केंद्रित था, हालांकि उन्होंने 10 वर्षों तक के प्रभावों का भी विश्लेषण किया। मौजूदा वैश्विक गर्मी के परिदृश्यों के आधार पर उन्होंने अनुमान लगाया कि 21वीं सदी में अल नीनो से होने वाला कुल आर्थिक नुकसान 84 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।

स्रोत : एनओएए

गर्म होती दुनिया में अल नीनो

सुपर अल नीनो ऐसे समय में विकसित हो रहा है, जब पृथ्वी का वायुमंडल पहले ही तेज गर्मी का सामना कर रहा है। 2023-24 का अल नीनो सुपर घटना नहीं था, फिर भी इसका वैश्विक औसत तापमान और महासागरों के समुद्र सतह तापमान पर व्यापक असर पड़ा। इसकी बड़ी वजह यह थी कि मानव गतिविधियों से पैदा हुई ग्रीनहाउस गैसों के कारण पहले से मौजूद गर्मी, अल नीनो से उत्पन्न अतिरिक्त गर्मी के साथ मिल गई। फरवरी 2025 में एनवायरमेंट : साइंस एंड पॉलिसी फॉर सस्टेनबल डेवलपमेंट में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, 2023-2024 के दौरान वैश्विक औसत तापमान में 0.4 डिग्री सेल्सियस की छलांग दर्ज की गई। अध्ययन के लेखकों ने बताया कि अगस्त 2024 में 12 महीने का औसत वैश्विक तापमान विचलन 20वीं सदी की शुरुआत की तुलना में 1.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था।

इंडियाना यूनिवर्सिटी के जलवायु वैज्ञानिक क्रिस्टोफर डब्ल्यू कैलहन के अनुसार, “जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के प्रभावों को अलग-अलग समझना आसान नहीं है।” उन्होंने कहा कि हाल की घटना इसलिए अधिक गंभीर दिख रही है क्योंकि समुद्री सतह का तापमान पहले से ही काफी गर्म है और उस पर अल नीनो का प्रभाव भी जुड़ रहा है। उन्होंने कहा, “हमें इन दोनों को एक जैसा नहीं मानना चाहिए।”

कैलहन के मुताबिक, इसी कारण अमेरिकी क्लाइमेट प्रिडिक्शन सेंटर ने अल नीनो इंडेक्स को एक रिलेटिव इंडेक्स में बदल दिया है, जो जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र सतह तापमान में समग्र वृद्धि को ध्यान में रखता है। उन्होंने कहा, “हाल के ठंडे ला नीना वर्ष भी अतीत के मजबूत अल नीनो वर्षों से अधिक गर्म रहे हैं। यह दिखाता है कि पृष्ठभूमि जलवायु कितनी बदल चुकी है।”ब्रिटेन के मेट ऑफिस के अनुसार, हाल के तीन ला नीना वर्ष भी 1998 के शक्तिशाली अल नीनो वाले वर्ष से अधिक गर्म रहे हैं। संस्था ने कहा कि पिछले करीब 20 वर्षों में मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के कारण पृष्ठभूमि तापमान लगातार बढ़ता रहा है।

मेट ऑफिस के वैज्ञानिक मैज के अनुसार, “2023 पहला वर्ष था जब वैश्विक तापमान औद्योगिक-पूर्व स्तर से 1.4 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच गया। इसके बाद अगले दो वर्षों में भी दुनिया उन्हीं स्तरों के आसपास बनी रही।” उन्होंने कहा कि अल नीनो की स्थिति में अगले वर्ष वैश्विक तापमान के 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने की संभावना है। उन्होंने चेतावनी दी कि सरकारों और आमजन, दोनों के लिए आपदा जोखिम कम करने के उपाय बेहद जरूरी होंगे। उदाहरण के तौर पर किसानों को बीमा उपलब्ध कराना फसल उत्पादन में गिरावट से पैदा होने वाले दीर्घकालिक सामाजिक प्रभावों को कम कर सकता है। कैलहन ने कहा कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि ऐसे व्यवधानों के दौरान सामाजिक सुरक्षा तंत्र कमजोर न पड़े। विशेषज्ञों के मुताबिक, बढ़ती वैश्विक गर्मी और अल नीनो का संयुक्त प्रभाव आर्कटिक क्षेत्र में भी तेज बदलाव ला सकता है। इससे मौसम प्रणालियों में अचानक व अव्यवस्थित परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।

क्वीन्स यूनिवर्सिटी के फिजिकल जियोग्राफी प्रोफेसर ग्रेम स्विंडल्स ने कहा, “जब ऐसे शक्तिशाली नैचुरल क्लाइमेट ऑशिलेसन मानव-जनित तेज गर्मी के साथ मिलते हैं तो इनके प्रभाव अचानक, अव्यवस्थित और बेहद गंभीर हो सकते हैं। इसमें अत्यधिक गर्मी से लेकर बाढ़ और सूखे तक की स्थितियां पैदा हो सकती हैं।” उन्होंने कहा कि एक मजबूत अल नीनो उच्च अक्षांशों तक पहुंचने वाले वायुमंडलीय परिसंचरण बदलावों को और बढ़ा सकता है, जिससे पहले से तेजी से गर्म हो रहे आर्कटिक में अतिरिक्त गर्मी जुड़ सकती है। स्विंडल्स के अनुसार, “दूर उत्तर में दिखाई दे रहे ये तेज बदलाव स्पष्ट चेतावनी हैं कि जलवायु प्रणाली अधिक अस्थिर हो रही है और समाजों को भविष्य में बड़े तथा तेज बदलावों के लिए तैयार रहना चाहिए।”

हालांकि मौजूदा पूर्वानुमान संभावित सुपर अल नीनो और 1876-78 जैसी परिस्थितियों की ओर इशारा कर रहे हैं, लेकिन दुनिया अब पहले की तुलना में कहीं अधिक तैयार मानी जाती है। डब्ल्यूएमओ समेत दुनिया की कई मौसम एजेंसियां और खाद्य एवं कृषि संगठन तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अब अल नीनो की प्रगति को लगातार ट्रैक कर सकती हैं। साथ ही, वे कृषि, खाद्य सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य पर इसके संभावित प्रभावों का पहले से अनुमान लगाने में भी सक्षम हैं। इससे सरकारों और समुदायों को समय रहते एहतियाती कदम उठाने का मौका मिलता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन संस्थाओं पर भारी दबाव पड़ सकता है और उन्हें पर्याप्त संसाधनों की जरूरत होगी।

ग्रीनहाउस गैसों के कारण महासागर और वायुमंडल के गर्म होने से खुद अल नीनो का स्वरूप भी बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की 2019 की विशेष रिपोर्ट ओशियन एंड क्रायोस्फेयर इन ए चेंजिंग क्लाइमेट में कहा गया था कि बढ़ती वैश्विक गर्मी के कारण अल नीनो और ला नीना घटनाएं भविष्य में अधिक तीव्र और अधिक बार हो सकती हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, इससे कुछ क्षेत्रों में सूखा और अन्य क्षेत्रों में अत्यधिक नमी की स्थितियां बढ़ सकती हैं। साथ ही अत्यधिक अल नीनो घटनाएं वर्तमान की तुलना में लगभग दोगुनी बार हो सकती हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया कि वर्षा की चरम घटनाएं गर्म चरणों के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में पूर्व की ओर और ठंडे चरणों में पश्चिम की ओर खिसक सकती हैं। एनओएए की पैसिफिक मरीन एनवायरनमेंटल लेबोरेटरी के वरिष्ठ वैज्ञानिक और अल नीनो सदर्न ऑशिलेशन इन ए चेंजिंग क्लाइमेट पुस्तक के सह-संपादक माइकल मैकफेडेन के अनुसार, मध्य अक्षांशों में भविष्य के वर्षा पैटर्न को लेकर अभी स्पष्टता कम है, लेकिन चरम मौसमी घटनाएं अधिक तीव्र हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य की ईएनएसओ घटनाएं उष्णकटिबंधीय चक्रवातों, हरिकेन और टाइफून को भी प्रभावित कर सकती हैं, हालांकि इस संबंध को अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है।

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