

नए शोध में पता चला कि एरोसोल का प्रभाव स्थिर नहीं होता, यह समय के अनुसार जलवायु को गर्म या ठंडा कर सकता है।
अध्ययन के अनुसार एरोसोल बढ़ने के शुरुआती दो दिनों में ऊंचे बादल बनते हैं, जिससे वातावरण में गर्मी बढ़ती है।
समय बीतने पर वायुमंडल अनुकूलन करता है और अधिक ऊष्मा अंतरिक्ष में निकलने लगती है, जिससे ठंडक बढ़ती है।
शोधकर्ताओं ने वायुमंडलीय स्मृति के संकेत पाए, जहां एरोसोल का प्रभाव पिछले बदलावों पर भी निर्भर करता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज जलवायु मॉडलों की सटीकता बढ़ाकर भविष्य के बेहतर जलवायु अनुमान लगाने में मदद करेगी।
जलवायु परिवर्तन को समझने में एरोसोल की भूमिका लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए एक जटिल विषय रहा है। अब एक नए शोध ने इस विषय पर नई रोशनी डाली है। शोध के अनुसार, वायुमंडल में मौजूद एरोसोल यानी बेहद छोटे कण केवल जलवायु को ठंडा ही नहीं करते, बल्कि कुछ परिस्थितियों में गर्म भी कर सकते हैं। यह प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस समय अवधि में देखा जा रहा है।
यह अध्ययन इजराइल के हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम के वैज्ञानिक प्रोफेसर गाय डैगन के नेतृत्व में किया गया है। शोध के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुए हैं।
क्या होते हैं एरोसोल?
एरोसोल वायुमंडल में तैरने वाले बहुत छोटे कण होते हैं। ये कई प्राकृतिक और मानव-निर्मित स्रोतों से आते हैं। जंगलों में लगने वाली आग, समुद्री लहरों से उठने वाले नमक के कण, धूल और औद्योगिक प्रदूषण इसके प्रमुख स्रोत हैं।
वैज्ञानिक लंबे समय से जानते हैं कि एरोसोल बादलों के निर्माण और पृथ्वी के तापमान को प्रभावित करते हैं। हालांकि, इनका वास्तविक प्रभाव कितना है, इसका सही अनुमान लगाना अब तक मुश्किल रहा है।
शुरुआत में दिखाई देता है गर्माहट का असर
शोधकर्ताओं ने उन्नत कंप्यूटर मॉडल की मदद से यह अध्ययन किया कि जब वायुमंडल में अचानक एरोसोल की मात्रा बढ़ती है तो बादल किस प्रकार प्रतिक्रिया देते हैं।
अध्ययन में पाया गया कि एरोसोल बढ़ने के बाद शुरुआती दो दिनों तक वातावरण में गर्मी बढ़ने का प्रभाव दिखाई देता है। इस दौरान बादलों की संरचना में बदलाव आता है और अधिक ऊंचाई पर बादल बनने लगते हैं।
ऊंचाई पर मौजूद ये बादल पृथ्वी से निकलने वाली ऊष्मा को अंतरिक्ष में जाने से रोकते हैं। परिणामस्वरूप वातावरण में अतिरिक्त गर्मी जमा होने लगती है और अस्थायी रूप से तापमान बढ़ सकता है।
समय के साथ बदल जाता है प्रभाव
शोध के अनुसार यह गर्माहट स्थायी नहीं रहती। कुछ समय बाद वायुमंडल स्वयं को नई परिस्थितियों के अनुसार ढालने लगता है। ऊपरी वायुमंडलीय परतें गर्म होने के बाद बादलों के बनने का तरीका बदल जाता है।
इस बदलाव के कारण अधिक गर्मी अंतरिक्ष में निकलने लगती है। धीरे-धीरे शुरुआती गर्माहट का प्रभाव कम हो जाता है और उसकी जगह ठंडक पैदा करने वाला प्रभाव अधिक मजबूत हो जाता है। यही कारण है कि लंबे समय के पैमाने पर एरोसोल का कुल प्रभाव जलवायु को ठंडा करने वाला माना जाता है।
दो बड़े कारण
वैज्ञानिकों ने पाया कि एरोसोल के प्रभाव को दो प्रमुख बातें निर्धारित करती हैं। पहली, एरोसोल की मात्रा कितनी तेजी से बदल रही है। दूसरी, वायुमंडल उन बदलावों के प्रति कितनी तेजी से प्रतिक्रिया करता है।
यदि एरोसोल का स्तर बहुत तेजी से बढ़ता या घटता है, तो छोटे अवधि की गर्माहट का प्रभाव ज्यादा दिखाई दे सकता है। वहीं यदि बदलाव धीरे-धीरे होता है, तो लंबे समय वाली ठंडक अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
वायुमंडल की ‘याददाश्त’ का मिला संकेत
इस अध्ययन की सबसे रोचक खोजों में से एक है "वायुमंडलीय स्मृति" का विचार।
शोधकर्ताओं के अनुसार, किसी समय एरोसोल का प्रभाव केवल उसकी वर्तमान मात्रा पर निर्भर नहीं करता। यह भी महत्वपूर्ण है कि पिछले कुछ दिनों में एरोसोल का स्तर बढ़ रहा था या घट रहा था। इसका अर्थ है कि समान मात्रा में मौजूद एरोसोल अलग-अलग परिस्थितियों में अलग प्रभाव पैदा कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, वायुमंडल हाल की परिस्थितियों को कुछ समय तक "याद" रखता है।
जलवायु मॉडल के लिए महत्वपूर्ण निष्कर्ष
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहना है कि एरोसोल और बादलों के बारे में हमारी अधिकांश जानकारी एक समय विशेष पर किए गए अवलोकनों से आती है। लेकिन नया अध्ययन बताता है कि केवल एक क्षण की तस्वीर देखकर पूरे प्रभाव को समझना संभव नहीं है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि जलवायु मॉडल में इन समय-आधारित प्रक्रियाओं को शामिल किया जाए तो भविष्य के जलवायु परिवर्तन के अनुमान अधिक सटीक हो सकते हैं। इससे जलवायु विज्ञान में मौजूद सबसे बड़ी अनिश्चितताओं में से एक को कम करने में मदद मिलेगी।
भविष्य के लिए नई दिशा
यह शोध बताता है कि एरोसोल का प्रभाव केवल यह नहीं है कि वे वातावरण को गर्म करते हैं या ठंडा। असली सवाल यह है कि यह प्रभाव किस समय अवधि में मापा जा रहा है।
नई खोज से वैज्ञानिकों को जलवायु प्रणाली को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी। साथ ही, भविष्य में जलवायु परिवर्तन के अधिक विश्वसनीय अनुमान लगाने का रास्ता भी खुल सकता है।