पेड़-पौधों का बढ़ता तापमान दे रहा बड़े खतरे की दस्तक: हवा से 16 फीसदी ज्यादा तपेंगी पत्तियां

वैज्ञानिकों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन का बड़ा असर अब पेड़ों की पत्तियों पर दिखाई देगा, जो हवा से भी ज्यादा तेजी से गर्म होकर पूरी पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं।
गर्मी, बढ़ते तापमान और पानी की कमी से झुलसाए पौधे; फोटो: आईस्टॉक
गर्मी, बढ़ते तापमान और पानी की कमी से झुलसाए पौधे; फोटो: आईस्टॉक
Published on
सारांश
  • जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल हवा के बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं है। एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि इस सदी के अंत तक पेड़-पौधों की पत्तियां हवा की तुलना में औसतन 16 फीसदी अधिक गर्म होंगी।

  • पत्तियां सीधे सूर्य की किरणें सोखती हैं और सामान्य परिस्थितियों में वाष्पोत्सर्जन के जरिए खुद को ठंडा रखती हैं। लेकिन बढ़ती गर्मी और सूखे के कारण जब पानी की कमी होती है, तो पौधे यह प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया बंद कर देते हैं। नतीजतन उनकी पत्तियां तेजी से तपने लगती हैं, प्रकाश संश्लेषण घटता है और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है।

  • इससे धरती के गर्म होने की रफ्तार और तेज हो सकती है। अध्ययन के अनुसार, सबसे बड़ा खतरा शुष्क क्षेत्रों और उष्णकटिबंधीय जंगलों पर मंडरा रहा है, जहां तापमान में मामूली बढ़ोतरी भी व्यापक पारिस्थितिक नुकसान का कारण बन सकती है।

  • वैज्ञानिकों का कहना है कि अब जलवायु नीतियों और मॉडलों में केवल हवा का तापमान नहीं, बल्कि पेड़ों की पत्तियों और कैनोपी के वास्तविक तापमान को भी शामिल करना होगा।

  • यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि पेड़ों की बढ़ती तपन केवल जंगलों का नहीं, बल्कि हमारी हवा, वर्षा, खेती और भविष्य की जीवन-व्यवस्था का भी सवाल है।

हम अक्सर खबरों में सुनते हैं कि 'आज हवा का तापमान इतने डिग्री बढ़ गया।' जलवायु परिवर्तन की जब भी बात होती है, हमारा पूरा ध्यान हवा के तापमान पर ही रहता है।

ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि इसी हवा में हम सांस लेते हैं और यही तापमान हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को सीधे प्रभावित करता है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि हमारे आसपास मौजूद पेड़-पौधे और उनकी हरी-भरी पत्तियां अंदर ही अंदर कितनी तपन झेल रही हैं?

हाल ही में किए एक नए अध्ययन में जलवायु परिवर्तन के एक ऐसे खौफनाक पहलू को उजागर किया है, जो अब तक हमारी नजरों से ओझल था। वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि पेड़-पौधों की पत्तियों और उनकी ऊपरी सतह (कैनोपी) का तापमान हवा के मुकाबले बहुत तेजी से बढ़ रहा है।

वैज्ञानिकों ने अंदेशा जताया है कि इससे पौधों, जंगलों, वर्षा चक्र और पूरी पृथ्वी की जलवायु पर गंभीर असर पड़ सकता है।

यह भी पढ़ें
जलवायु संकट: हिमालय में तेजी से ऊपर की ओर शिफ्ट हो रहे पेड़-पौधे, बदल रहा पारिस्थितिकी तंत्र
गर्मी, बढ़ते तापमान और पानी की कमी से झुलसाए पौधे; फोटो: आईस्टॉक

यह पहला मौका है जब वैज्ञानिकों ने उस दर्द को नापा है जो भविष्य में पत्तियां सहने वाली हैं। स्टडी के मुताबिक, इस सदी के अंत तक हवा जितनी भी गर्म होगी, पत्तियां उससे 16 फीसदी यानी करीब 0.11 डिग्री सेल्सियस ज्यादा तपन झेलेंगी। ऐसे में जब हवा की गर्मी से ज्यादा पौधों का शरीर जलने लगेगा, तो सोचिए इस धरती की छांव का वजूद कैसे बचेगा?

जैसे जलती सड़क पर रखा हाथ...

इस बात को समझाने के लिए अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता जूलिया ग्रीन एक सीधा सा उदाहरण देती हैं, "कड़कड़ाती धूप में किसी तपती हुई पार्किंग में जाकर डामर की सड़क पर हाथ रखिए। आपको जो जलन महसूस होगी, वह आसपास की हवा से कहीं ज्यादा गर्म होगी।“

“ठीक यही बात पेड़-पौधों के साथ हो रही है। पत्तियां सीधे सूरज की किरणें सोखती हैं, इसलिए वे आसपास की हवा की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से गर्म हो जाती हैं।"

जब पौधों का 'पसीना' भी सूख जाए

क्या आप जानते हैं कि इंसानों की तरह पेड़-पौधों के पास भी खुद को ठंडा रखने का एक कुदरती तरीका होता है, और वो तरीका है वाष्पोत्सर्जन।

जब गर्मी बढ़ती है, तो पौधे जड़ों से पानी खींचकर पत्तियों तक लाते हैं। यह पानी भाप बनकर उड़ता है और पत्तियों को ठंडक देता है। ठीक वैसे ही, जैसे पसीना आने पर इंसान को राहत महसूस होती है।

यह भी पढ़ें
प्रकृति की बिगड़ती ताल: जलवायु परिवर्तन से बदल रहा फूलों का ‘कैलेंडर’
गर्मी, बढ़ते तापमान और पानी की कमी से झुलसाए पौधे; फोटो: आईस्टॉक

लेकिन त्रासदी तब शुरू होती है जब हवा बहुत ज्यादा गर्म और सूखी हो जाती है और पौधे अपनी ठंडक बनाए रखने के लिए सारा पानी खर्च देते हैं। ऐसे में उन्हें जमीन से और पानी नहीं मिलता, तो वे खुद को बचाने के लिए हार मान लेते हैं। वे अपना भोजन बनाने की प्रक्रिया (प्रकाश संश्लेषण) और वाष्पोत्सर्जन दोनों बंद कर देते हैं। नतीजा? पत्तियां बिना किसी ढाल के सीधे जलने लगती हैं।

कहां है सबसे ज्यादा खतरा?

रिसर्च से पता चला है कि जहां भविष्य में हवा अधिक गर्म और शुष्क होने की आशंका है, वहां पत्तियों का तापमान सबसे ज्यादा बढ़ेगा। जैसे-जैसे पौधे पानी बचाने के लिए वाष्पोत्सर्जन कम करेंगे, आसपास की हवा भी और अधिक सूखी होती जाएगी। इससे एक दुष्चक्र (फीडबैक लूप) बन जाएगा, जो पत्तियों के तापमान को और बढ़ा देगा।

अमेरिका, चीन और फ्रांस के शोध संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन दर्शाता है कि सूखे और रेगिस्तानी इलाकों में जहां हवा पहले से सूखी है, वहां पत्तियों का तापमान हवा से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ेगा।

यह भी पढ़ें
जलवायु संकट में भटकते पौधे: सदी के अंत तक अपने प्राकृतिक आवास खो देंगी 16 फीसदी प्रजातियां
गर्मी, बढ़ते तापमान और पानी की कमी से झुलसाए पौधे; फोटो: आईस्टॉक

हालांकि वैज्ञानिकों को उष्णकटिबंधीय जंगलों की सबसे ज्यादा चिंता है। इन सदाबहार जंगलों के पौधे बहुत ज्यादा तापमान झेलने के आदी नहीं होते। यहां तापमान में जरा सा भी बदलाव पूरे जंगल को तबाह कर सकता है।

यह सिर्फ पौधों की बात नहीं, हमारी सांसों का भी है सवाल

हमें समझना होगा कि पेड़ सिर्फ हरियाली भर नहीं हैं, वे इस धरती के फेफड़े हैं। अगर वे बीमार पड़ेंगे, तो केवल जंगल ही नहीं, बल्कि हमारी हवा, बारिश, खेती और जीवन का पूरा संतुलन खतरे में पड़ जाएगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक जब बहुत ज्यादा गर्मी की वजह से पौधे भोजन बनाना बंद कर देंगे, तो वे हवा से कार्बन डाइऑक्साइड खींचना कम कर देंगे। जब यह जहरीली गैस हवा में ही रह जाएगी, तो धरती पर गर्मी और तेजी से बढ़ेगी।

यह भी पढ़ें
जलवायु परिवर्तन से पौधों के अंकुरण में हो रहा बदलाव, बिगड़ रहा पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन
गर्मी, बढ़ते तापमान और पानी की कमी से झुलसाए पौधे; फोटो: आईस्टॉक

वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि इसके साथ ही कई क्षेत्रों में वनस्पतियों का वितरण बदल सकता है और बड़े पैमाने पर पौधों के नष्ट होने का खतरा बढ़ सकता है। देखा जाए तो पौधों का वाष्पोत्सर्जन केवल उन्हें ठंडा ही नहीं रखता, बल्कि वातावरण में नमी पहुंचाकर बादलों और वर्षा बनने की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

ऐसे में जब पौधे वाष्पोत्सर्जन बंद कर देंगें, तो हवा में नमी कम हो जाएगी। नमी कम होगी, तो बादल कम बनेंगे और बारिश का चक्र पूरी तरह बिगड़ जाएगा।

जलवायु नीतियों में बदलाव की है दरकार

वैज्ञानिकों का मानना है कि अब समय आ गया है जब हम केवल हवा के तापमान को देखकर नीतियां बनाना बंद करें। हमें यह समझना होगा कि हमारी कैनोपी (पेड़ों की छांव) कितनी तप रही है। जलवायु मॉडल में इस सच्चाई को शामिल करके ही हम भविष्य के लिए सही और असरदार योजनाएं बना सकते हैं।

इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अधिक सटीक आकलन किया जा सकेगा और सरकारें तथा नीति-निर्माता बेहतर अनुकूलन और शमन रणनीतियां तैयार कर सकेंगे।

यह अध्ययन स्पष्ट संकेत देता है कि जलवायु संकट अब केवल बढ़ते तापमान का नहीं, बल्कि धरती के प्राकृतिक सुरक्षा कवच के कमजोर पड़ने का भी है। यदि पेड़ों की पत्तियां हवा से तेज तपने लगीं, तो कार्बन अवशोषण, वर्षा चक्र और पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर पड़ेंगे।

यह भी पढ़ें
जलवायु परिवर्तन के साथ बढ़ रही ‘घुसपैठ’, नए इलाकों में फैल रहे विदेशी पौधे
गर्मी, बढ़ते तापमान और पानी की कमी से झुलसाए पौधे; फोटो: आईस्टॉक

सच कहें तो यदि समय रहते हमने धरती के इन हरे-भरे फेफड़ों की तपन को नहीं समझा, तो कल हवा इतनी गर्म हो जाएगी कि हमारे पास खुद को बचाने का कोई रास्ता नहीं बचेगा।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in