

समुद्र का बढ़ता जलस्तर नई तटीय जमीन को डुबो सकता है, जिससे जो देशी नहीं हैं ऐसी समुद्री प्रजातियों को फैलने का नया अवसर मिलेगा।
वैज्ञानिकों ने 122 समुद्री आक्रमणकारी प्रजातियों का अध्ययन किया, जिनमें चाइनीज मिटेन क्रैब और पैसिफिक ऑयस्टर शामिल हैं।
वर्ष 2100 तक समुद्र का औसत स्तर 56 सेंटीमीटर बढ़ने का अनुमान है, जिससे बड़े तटीय क्षेत्र डूब सकते हैं।
पूर्वी अमेरिका, मैक्सिको की खाड़ी, उत्तरी सागर, दक्षिण-पूर्वी चीन और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में खतरा अधिक बताया गया है।
वैज्ञानिकों ने समुद्री आक्रमणकारी प्रजातियों की निगरानी बढ़ाने और समुद्र के बढ़ते स्तर को भविष्य के आकलन में शामिल करने पर जोर दिया।
जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का बढ़ता स्तर केवल तटीय इलाकों को डुबोने का खतरा नहीं बढ़ा रहा है, बल्कि इससे समुद्र में पाई जाने वाली गैर-देशी और आक्रमणकारी प्रजातियों को भी फैलने का नया मौका मिल सकता है। एक नए वैश्विक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस सदी के मध्य और अंत तक समुद्र के पानी में डूबने वाली तटीय जमीन का बड़ा हिस्सा कई गैर-देशी समुद्री जीवों के लिए उपयुक्त आवास बन सकता है।
यह अध्ययन नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों ने 122 ऐसी समुद्री पशु प्रजातियों के भविष्य के फैलाव का अध्ययन किया, जो अपने मूल क्षेत्र से बाहर पहले ही स्थापित हो चुकी हैं।
122 समुद्री प्रजातियों पर अध्ययन
शोधकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते स्तर को ध्यान में रखते हुए इन प्रजातियों के संभावित फैलाव का मॉडल तैयार किया। इनमें चाइनीज मिटेन क्रैब, पैसिफिक ऑयस्टर, एशियन टाइगर श्रिम्प, अटलांटिक ब्लू क्रैब, यूरोपियन ग्रीन क्रैब और नॉर्दर्न पैसिफिक सी स्टार जैसी प्रजातियां शामिल हैं।
इनमें से कई जीव अपने नए क्षेत्रों में स्थानीय प्रजातियों के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं। वे भोजन और रहने की जगह के लिए स्थानीय जीवों से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव ला सकते हैं।
लाखों हेक्टेयर नई जमीन डूब सकती है
अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के एक मध्यम स्तर वाले अनुमान के तहत दुनिया का औसत समुद्री स्तर वर्ष 2050 तक करीब 20 सेंटीमीटर और साल 2100 तक करीब 56 सेंटीमीटर बढ़ सकता है।
इस बढ़ते समुद्री स्तर के कारण लगभग 2.9 लाख से 4.7 लाख वर्ग किलोमीटर तटीय जमीन पानी में डूब सकती है। यह क्षेत्रफल करीब इटली से लेकर स्वीडन के आकार तक के क्षेत्र के बराबर है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस नई डूबी हुई जमीन का बड़ा हिस्सा उन समुद्री आक्रमणकारी प्रजातियों के लिए उपयुक्त हो सकता है, जो आसपास के क्षेत्रों में पहले से मौजूद हैं।
मुहानों के आसपास सबसे ज्यादा खतरा
अध्ययन में समुद्र और नदियों के मिलने वाले स्थानों यानी मुहानों को खास तौर पर संवेदनशील बताया गया है। मुहाने समुद्र और जमीन के बीच प्राकृतिक संपर्क का काम करते हैं। यहां पानी, भोजन और अलग-अलग प्रकार के जीवों की मौजूदगी के कारण कई प्रजातियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां होती हैं।
इसके अलावा दुनिया के कई बड़े शहर, बंदरगाह और औद्योगिक क्षेत्र भी तटीय इलाकों और मुहानों के आसपास बसे हैं। जहाजों और समुद्री व्यापार के जरिए गैर-देशी प्रजातियां नए क्षेत्रों तक पहुंच सकती हैं। समुद्र का बढ़ता पानी इन जीवों को आगे फैलने के लिए अतिरिक्त जगह दे सकता है।
कई तटीय क्षेत्रों में बढ़ सकता है खतरा
शोधकर्ताओं ने पूर्वी अमेरिका, मैक्सिको की खाड़ी, उत्तरी सागर के आसपास के तट, दक्षिण-पूर्वी चीन और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों को संभावित रूप से अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में शामिल किया है।
अध्ययन के अनुसार, अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में उन क्षेत्रों की डूबी हुई तटीय जमीन के दो-तिहाई से अधिक हिस्से में आक्रमणकारी समुद्री प्रजातियों के बसने की संभावना हो सकती है, जहां ये प्रजातियां पहले से मौजूद हैं।
निगरानी और तैयारी जरूरी
वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्री आक्रमणकारी प्रजातियों के खतरे का आकलन करते समय अब समुद्र के बढ़ते स्तर को भी ध्यान में रखना चाहिए। तटीय क्षेत्रों में शुरुआती निगरानी से नई प्रजातियों के फैलाव को समय रहते पहचानने में मदद मिल सकती है।
हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी जमीन का किसी प्रजाति के लिए उपयुक्त होना यह तय नहीं करता कि वह वहां वास्तव में तेजी से फैल ही जाएगी। स्थानीय पर्यावरण, भोजन, दूसरी प्रजातियों से प्रतिस्पर्धा और नई जगह तक पहुंचने की क्षमता जैसे कई कारक भी महत्वपूर्ण होंगे।
फिर भी यह अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता का संकट एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। समुद्र का बढ़ता पानी जहां तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रहा है, वहीं यह कुछ गैर-देशी समुद्री जीवों के लिए नए रास्ते भी खोल सकता है। ऐसे में तटीय क्षेत्रों की निगरानी और समय रहते प्रबंधन करना भविष्य में जैव विविधता और मत्स्य संसाधनों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।