हिमालय पर बाढ़ का बढ़ता खतरा: तीन लाख लोगों की जिंदगी पर मंडरा रहा संकट

नेपाल, भारत और चीन के हिमालयी इलाकों में बढ़ रहा खतरा, सात साल में बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में इमारतों का क्षेत्रफल 45 फीसदी से ज्यादा बढ़ा
हिमालयी क्षेत्रों में करीब 2.94 लाख लोग बाढ़ के खतरे वाले इलाकों में रह रहे हैं, अध्ययन में हुआ खुलासा।
हिमालयी क्षेत्रों में करीब 2.94 लाख लोग बाढ़ के खतरे वाले इलाकों में रह रहे हैं, अध्ययन में हुआ खुलासा।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • हिमालयी क्षेत्रों में करीब 2.94 लाख लोग बाढ़ के संभावित खतरे वाले इलाकों में रह रहे हैं, अध्ययन में हुआ खुलासा।

  • नेपाल, भारत और चीन के हिमालयी इलाकों में 2016 से 2023 के बीच बाढ़ संभावित क्षेत्रों में इमारतों का क्षेत्रफल 45.75 फीसदी बढ़ा।

  • ग्लेशियर झीलों के फटने से बाढ़ का खतरा ज्यादा, ऐसे क्षेत्रों में इमारतों का क्षेत्रफल सात साल में करीब 78 फीसदी बढ़ा।

  • अध्ययन के अनुसार, नेपाल में करीब 1.08 लाख लोग बाढ़ के संभावित खतरे वाले भवनों में रह सकते हैं।

  • जलवायु परिवर्तन, भारी बारिश और बढ़ते निर्माण से हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़ का जोखिम बढ़ने की आशंका, बेहतर निगरानी जरूरी है।

हिमालय की ऊंची चोटियां, बर्फ से ढकी पहाड़ियां और कल-कल बहती नदियां देखने में जितनी खूबसूरत हैं, उनके बीच रहने वाले लोगों के लिए खतरा भी उतना ही गंभीर होता जा रहा है। नेपाल, भारत और चीन के हिमालयी क्षेत्रों में करीब 2.94 लाख लोग ऐसे इलाकों में रह सकते हैं, जहां बाढ़ का खतरा बना रहता है। एक नए अध्ययन में यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। शोध के मुताबिक, साल 2016 से 2023 के बीच संभावित बाढ़ वाले क्षेत्रों में इमारतों का कुल क्षेत्रफल लगभग 46 फीसदी बढ़ गया।

यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने हिमालयी झीलों के आसपास और नदियों के किनारे बसे इलाकों का अध्ययन कर यह समझने की कोशिश की कि कितनी इमारतें और कितने लोग बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं।

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मानसून की बारिश से लेकर ग्लेशियर झीलों तक खतरा

हिमालय में बाढ़ आने के कई कारण हैं। मानसून के दौरान मूसलाधार बारिश, अचानक होने वाली अत्यधिक बारिश और पहाड़ों से बहकर आने वाला मलबा बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। इसके अलावा, ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों के अचानक फटने पर भी विनाशकारी बाढ़ आ सकती है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ कहा जाता है।

पहाड़ों की भौगोलिक बनावट इस खतरे को और बढ़ा देती है। संकरी घाटियों और ढलानदार रास्तों से गुजरने वाली नदियों में पानी का स्तर तेजी से बढ़ सकता है। ऐसे में बाढ़ को फैलने के लिए कम जगह मिलती है और पानी अपने रास्ते में आने वाली बस्तियों, सड़कों और इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

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जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में ऐसी घटनाओं की गंभीरता बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

सात साल में 45 फीसदी से ज्यादा बढ़ा इमारतों का क्षेत्रफल

शोधकर्ताओं ने नेपाल तथा भारत और चीन के पड़ोसी हिमालयी क्षेत्रों में 1,361 झीलों के आसपास के इलाकों का अध्ययन किया। इसमें झीलों से नीचे की ओर 50 किलोमीटर तक के क्षेत्रों को शामिल किया गया।

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शोधकर्ताओं ने पांच अलग-अलग आंकड़ा स्रोतों का इस्तेमाल करते हुए इमारतों के वास्तविक आकार और उनके फैलाव का अनुमान लगाया। इसके बाद उन्होंने नदी के किनारे से 50 मीटर की ऊंचाई के भीतर स्थित इमारतों के क्षेत्रफल को संभावित बाढ़ के खतरे का एक संकेतक माना।

अध्ययन के अनुसार, 2016 में ऐसे क्षेत्रों में इमारतों का कुल क्षेत्रफल 12.38 वर्ग किलोमीटर था। 2023 तक यह बढ़कर 18.04 वर्ग किलोमीटर हो गया। यानी इसमें 45.75 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।

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सबसे अधिक चिंता उन इलाकों को लेकर है, जहां ग्लेशियर झीलों के फटने से बाढ़ आने का खतरा ज्यादा है। इन क्षेत्रों में इमारतों का क्षेत्रफल 0.72 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 1.28 वर्ग किलोमीटर हो गया। यह करीब 77.78 फीसदी की बढ़ोतरी है।

करीब 2.94 लाख लोग खतरे के दायरे में

शोधकर्ताओं ने इमारतों के क्षेत्रफल के आधार पर आबादी का अनुमान भी लगाया। इसके मुताबिक, वर्ष 2026 में अध्ययन क्षेत्र के करीब 2,93,800 लोग संभावित बाढ़ के खतरे वाले भवनों में रह सकते हैं। यह अध्ययन क्षेत्र की कुल आबादी का लगभग 18 फीसदी है।

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इनमें नेपाल के करीब 1,08,500 लोग शामिल हैं। इनमें से लगभग 22,800 लोग नदी के किनारे से 10 मीटर की ऊंचाई के भीतर रहते हैं। ऐसे क्षेत्रों में बाढ़ आने पर लोगों को संभलने और सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने के लिए बहुत कम समय मिल सकता है।

अध्ययन के अनुसार, 2015 से 2030 के बीच बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी में करीब 17,900 लोगों यानी छह फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है।

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बेहतर आंकड़ों की जरूरत

हालांकि शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि इमारतों के क्षेत्रफल और आबादी से जुड़े ये अनुमान पूरी तरह सटीक नहीं हैं। आंकड़ों में काफी अनिश्चितता है। इसलिए खतरे का सही आकलन करने के लिए इमारतों और आबादी से जुड़े अधिक विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत है।

हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती आबादी और निर्माण गतिविधियों के बीच यह अध्ययन एक अहम चेतावनी देता है। बाढ़ का खतरा केवल नदियों के उफान तक सीमित नहीं है, बल्कि उन बस्तियों तक भी पहुंचता है जो धीरे-धीरे नदी घाटियों में फैल रही हैं।

समय रहते खतरे वाले इलाकों की पहचान, बेहतर निगरानी, मजबूत चेतावनी व्यवस्था और सुरक्षित निर्माण की योजना बनाई जाए, तो जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है। हिमालय की सुंदरता को बचाने के साथ-साथ वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।

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