मधुमक्खियों व अन्य परागण करने वाले जीवों के लिए खतरा है बढ़ता कार्बन डाइऑक्साइड: अध्ययन

बढ़ते सीओ2 के स्तर से परागण करने वाले जीवों पर मंडरा रहा खतरा, बड़ी मधुमक्खियों की घटती संख्या ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाई
बढ़ते सीओ2 स्तर से बड़ी मधुमक्खियों की संख्या में गिरावट, परागण प्रक्रिया और प्राकृतिक संतुलन पर मंडरा रहा गंभीर खतरा।
बढ़ते सीओ2 स्तर से बड़ी मधुमक्खियों की संख्या में गिरावट, परागण प्रक्रिया और प्राकृतिक संतुलन पर मंडरा रहा गंभीर खतरा।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • बढ़ते सीओ2 स्तर से बड़ी मधुमक्खियों की संख्या में गिरावट, परागण प्रक्रिया और प्राकृतिक संतुलन पर मंडरा रहा गंभीर खतरा।

  • नए अध्ययन में खुलासा, अधिक कार्बन डाइऑक्साइड से बड़े परागणकर्ता प्रभावित जबकि छोटे जीवों को मिल सकता है लाभ।

  • जलवायु परिवर्तन बना परागणकर्ताओं के लिए चुनौती, घटते आवास और बढ़ते प्रदूषण से बिगड़ रहा पारिस्थितिक संतुलन।

  • बड़ी मधुमक्खियां बचाना जरूरी, क्योंकि वे पौधों के प्रजनन और खाद्य फसलों के उत्पादन में निभाती हैं अहम भूमिका।

  • वैज्ञानिकों की चेतावनी, सीओ2 उत्सर्जन कम करने और प्राकृतिक आवास बचाने से ही परागणकर्ताओं का भविष्य सुरक्षित होगा।

हमारी धरती पर मधुमक्खियां, मक्खियां, ततैया, तितलियां, पतंगे और रस पीने वाले कुछ पक्षी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये जीव फूलों से पराग को एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचाते हैं, जिससे पौधों में बीज बनते हैं और नई वनस्पतियां पैदा होती हैं। इनके बिना प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है और कई खाद्य फसलों का उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है।

लेकिन अब जलवायु परिवर्तन इन छोटे मेहनती जीवों के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है। बढ़ता तापमान और वातावरण में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) की मात्रा इनके जीवन और संख्या को प्रभावित कर रही है। यह अध्ययन ग्लोबल इकोलॉजी एंड बायोजियोग्राफी नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

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बढ़ता सीओ2 स्तर बना नई चिंता

अब तक हुए कई अध्ययनों में यह देखा गया था कि बढ़ते तापमान का असर मधुमक्खियों पर पड़ता है। कुछ प्रकार की मधुमक्खियां अधिक गर्मी को सहन नहीं कर पातीं। लेकिन एक नए अध्ययन से पता चला है कि केवल तापमान ही नहीं, बल्कि वातावरण में बढ़ती सीओ2 की मात्रा भी परागण करने वाले जीवों के लिए खतरा बन सकती है।

अध्ययन में पाया गया कि बड़ी आकार वाली मधुमक्खियां ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। वहीं कुछ छोटी मधुमक्खियां और छोटे परागण करने वाले जीव अधिक सीओ2 वाले क्षेत्रों में बेहतर स्थिति में पाए गए।

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बड़ी मधुमक्खियों पर ज्यादा असर

शोधकर्ताओं ने पाया कि बड़ी मधुमक्खियों जैसे बॉम्बस और जाइलोकोपा समूह की मधुमक्खियों की संख्या अधिक सीओ2 वाले क्षेत्रों में कम थी। साथ ही उनमें आनुवंशिक विविधता भी कम देखी गई। इसका मतलब है कि इन जीवों में बदलते पर्यावरण के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता कम हो सकती है।

बड़ी मधुमक्खियां पर्यावरण के लिए बहुत उपयोगी होती हैं। वे अपने शरीर पर अधिक पराग ले जा सकती हैं और लंबी दूरी तक उड़कर पौधों के बीच पराग पहुंचाती हैं। इससे पौधों को फैलने और अपनी प्रजाति को बचाए रखने में मदद मिलती है।

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सीओ2 फूलों और पराग को कैसे प्रभावित करता है

वातावरण में अधिक सीओ2 होने से फूलों के पराग में मौजूद प्रोटीन की मात्रा कम हो सकती है। परागण करने वाले जीवों के विकास और स्वास्थ्य के लिए प्रोटीन जरूरी होता है।

इसके अलावा सीओ2 का बढ़ा स्तर फूलों के रस यानी नेक्टर की गुणवत्ता को भी बदल सकता है। इसमें शर्करा की मात्रा कम हो सकती है, जिससे मधुमक्खियों और अन्य जीवों को पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिल पाती।

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दुनिया भर में बढ़ रहा है परागण संकट

पूरी दुनिया में परागण करने वाले जीवों की संख्या में गिरावट चिंता का विषय बन रही है। इसके कई कारण हैं, जैसे जंगलों और प्राकृतिक क्षेत्रों का खत्म होना, कीटनाशकों का अधिक उपयोग, और बाहर से लाई गई कुछ प्रजातियों का प्रभाव।

जलवायु परिवर्तन इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। इंसानों द्वारा जीवाश्म ईंधन के अधिक उपयोग से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही है, जिससे सीओ2 का स्तर लगातार बढ़ रहा है।

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बचाव के लिए उठाने होंगे कदम

विशेषज्ञों का कहना है कि परागण करने वाले जीवों को बचाने के लिए उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करनी होगी। जंगलों और हरित क्षेत्रों को नष्ट होने से रोकना जरूरी है, ताकि इन जीवों को रहने और भोजन खोजने की जगह मिल सके।

इसके अलावा ऐसे पौधे अधिक लगाए जाने चाहिए जो मधुमक्खियों के लिए लाभदायक हों। ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में यूकेलिप्टस, बैंकसिया और मेलाल्यूका जैसे पेड़ परागण करने वाले जीवों के लिए अच्छे माने जाते हैं। बड़ी मधुमक्खियों की संख्या बनाए रखने के लिए अन्य खतरों को भी कम करना होगा, जैसे बाहरी प्रजातियों से प्रतिस्पर्धा और पर्यावरण प्रदूषण।

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समय रहते कदम उठाना जरूरी

परागण करने वाले जीव केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि हमारी खाद्य व्यवस्था की नींव भी हैं। अगर इनकी संख्या कम होती गई तो इसका असर पौधों, खेती और मानव जीवन पर भी पड़ेगा।

बढ़ते सीओ2 और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए हमें अपने पर्यावरण की रक्षा करनी होगी और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना होगा। परागण करने वाले जीवों को बचाना धरती के भविष्य को सुरक्षित रखने की दिशा में एक जरूरी कदम है।

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