“हमारा खेल जलवायु परिवर्तन की मार की अग्रिम कतार में है”
लद्दाख में बड़ा होना आपको खिलाड़ी के रूप में कैसे गढ़ पाया?
चांगथांग में बड़े होते हुए प्रकृति मेरे लिए सर्वस्व थी। हल्की हवा, निष्ठुर ठंड और चुनौतीपूर्ण भूभाग ने मुझे स्केटिंग शुरू करने से पहले ही मजबूत बना दिया। लद्दाख में रहकर मैंने सहनशीलता, टीमवर्क और जन्मभूमि का सम्मान करना सीखा। ये सब किसी भी खिलाड़ी के लिए जरूरी सबक हैं। प्रकृति के करीब रहने से मुझे एक तरह का अनुशासन मिला। इसी कारण मैंने वातावरण में जल्दी ढलना, मुश्किल हालात में शांत रहना और साधारण चीजों से मजबूत बनना सीखा।
एक खिलाड़ी के रूप में जलवायु परिवर्तन के कौन-से प्रभाव या संकेत आपको प्रभावित करते हैं? वे आपके प्रदर्शन को कैसे प्रभावित करते हैं?
मेरे लिए सबसे बड़ा झटका बर्फ का कम होना है। बर्फ सिर्फ खेलने की जगह नहीं, बल्कि हमारा घर है। जब यह जल्दी पिघल जाती है या चिकनी नहीं होती तो हमारी ट्रेनिंग प्रभावित होती है और खेल से हमारा जुड़ाव टूटता है। इसके अलावा हर सर्दी यह अनिश्चितता कि बर्फ होगी या नहीं, मेरी प्रेरणा पर असर डालती है। यह लगातार याद दिलाता है कि हमारे खेल का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम पर्यावरण के साथ कैसा सलूक करते हैं। आज लद्दाख में आइस हॉकी खेलना जुनून भी है और एक स्टेटमेंट भी। हम जलवायु परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति पर स्केटिंग कर रहे हैं।<br>
जब मैंने खेल की शुरुआत की थी, तब साल में चार से पांच महीने प्राकृतिक बर्फ मिलती थी। अब यह घटकर सिर्फ दो महीने रह गई है, कभी-कभी उससे भी कम। बर्फ देर से जमती है और जल्दी पिघल जाती है और कई बार स्केटिंग के लिए सुरक्षित भी नहीं रहती। यह सिर्फ मेरे जैसे खिलाड़ियों के लिए ही नहीं बल्कि भूमि पर निर्भर किसानों और उन बच्चों के लिए भी दिल तोड़ने वाला है जो सर्दियों में स्केटिंग का इंतजार करते हैं। हमें अभ्यास के लिए ऊंचाई वाले इलाकों में जाना पड़ता है या छोटे प्रशिक्षण शिविरों का सहारा लेना पड़ता है। इसने हमें कृत्रिम रिंक के बारे में सोचने और बर्फ को बेहतर ढंग से संरक्षित करने के साथ खेल को जलवायु कार्रवाई (क्लाइमेट एक्शन) से जोड़ने के लिए प्रेरित किया है।
क्या आप अपने क्षेत्र में अन्य जलवायु या मौसम संबंधी बदलाव भी देखती हैं, जैसे सूखा या लू, अचानक बारिश या बर्फबारी, पानी व संसाधनों की कमी या बीमारियों का फैलना? इन संकटों के लिए आप किसे जिम्मेदार मानती हैं?
हर साल चीजें बदल रही हैं, जैसे छोटी होती सर्दियां, बारिश के अजब पैटर्न और अधिक शुष्क गर्मियां। जो धाराएं पहले साल भर बहती थीं, वे अब जल्दी सूख जाती हैं, जिससे गांवों में पानी की कमी होती है और चारागाह सिमट रहे हैं। यह सिर्फ एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि वैश्विक समस्या है। लेकिन मुझे लगता है कि संवेदनशील इलाकों में तेजी से बढ़ता पर्यटन और अनियंत्रित निर्माण इसे स्थानीय स्तर पर और बिगाड़ रहा है। इसलिए हमें संतुलन बनाना होगा, क्योंकि लद्दाख का पारिस्थितिकी तंत्र बहुत नाजुक है।
आपने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिस्पर्धा की है। क्या आपको लगता है कि भारत में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अन्य देशों की तुलना में अलग हैं, विशेष रूप से खिलाड़ियों के लिए?
अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं के बाद मैंने महसूस किया है कि भारत में जलवायु परिवर्तन का असर अलग तरह से पड़ता है। जिन जगहों पर कृत्रिम रिंक जैसी बेहतर सुविधाएं हैं वहां अनुकूलन आसान होता है। लद्दाख में हम प्रकृति पर निर्भर हैं, इसलिए जब बर्फ जल्दी पिघलती है तो हमारा पूरा प्रशिक्षण संकट में पड़ जाता है। हमारे समुदाय पानी और आजीविका के लिए प्राकृतिक चक्रों पर ज्यादा निर्भर हैं, इसलिए जलवायु प्रभाव हमें तेजी और गहराई से प्रभावित करते हैं। लेकिन हम हमेशा प्रकृति के करीब रहे हैं, इसलिए हमारे पास पारंपरिक ज्ञान और अनुकूलन क्षमता है, जिससे दुनिया बहुत कुछ सीख सकती है।
क्या इन प्रभावों ने आपको व्यक्तिगत रूप से बदला है या आपकी जीवनशैली को प्रभावित किया है?
मैं अपने पर्यावरणीय प्रभावों के प्रति सचेत हो गई हूं, मुख्यत: यात्रा, कचरा और पानी के उपयोग को लेकर। जलवायु परिवर्तन कोई दूर की समस्या नहीं है, हम इसे हर मौसम में महसूस करते हैं। एक खिलाड़ी के रूप में मैंने समझा है कि पर्यावरण हमारे खेल का हिस्सा है। मैं इन मुद्दों पर बात करने की कोशिश करती हूं, क्योंकि लद्दाख के युवा खिलाड़ियों को यह समझना चाहिए कि प्रकृति की रक्षा करना, अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने जैसा है। इसने मुझे बर्फ पर और बर्फ के बाहर दोनों जगह अधिक जागरूक और मुखर बनाया है।
आप किन खास संदेशों पर जागरुकता फैलाना चाहती हैं या लोगों को किस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करना चाहती हैं? अपने मंच से कौन-सा एक संदेश साझा करना चाहेंगी?
मैं अपने मंच का उपयोग यह दिखाने के लिए करना चाहती हूं कि जलवायु परिवर्तन दूरदराज इलाकों की युवा लड़कियों के अवसरों से कैसे जुड़ा है। यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि पहुंच का सवाल भी है। अगर हमारी झीलें जमना बंद कर देंगी तो लड़कियां सिर्फ अपना खेल का मैदान ही नहीं, अपने सपने भी खो देंगी। खेल के जरिये मैंने सीखा है कि छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। खिलाड़ियों, यात्रियों और साहसिक गतिविधियों के शौकीनों के लिए मेरा सरल संदेश यही है कि उस जमीन का सम्मान करें जो आपको रोमांच देती है। भले ही आप उस पर स्केटिंग कर रहे हों या यात्रा, आप उससे जितना लें, उसे अधिक लौटाएं भी। साथ ही मेरी अपील है, “बर्फ बचाओ, भविष्य बचाओ।”
यह साक्षात्कार डाउन टू अर्थ, हिंदी मासिक पत्रिका के फरवरी माह अंक में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका की प्रतियां बुक कराने के लिए क्लिक करें


