

ग्रीन क्लाइमेट फंड ने नेपाल की 49.9 मिलियन डॉलर की उस परियोजना को मंजूरी देने में सात साल लगा दिए, जिसका उद्देश्य करीब 24 लाख लोगों को हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ के खतरे से बचाना है।
26 अगस्त को नेपाल में आई बाढ़ के बाद इस देरी पर सवाल उठ रहे हैं। बाढ़ से भोटे कोशी और त्रिशूली नदी घाटियों में बस्तियों, बुनियादी ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा।
जलवायु क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं ने ज्ञात जलवायु और आपदा जोखिमों के बावजूद त्रिशूली नदी घाटी में बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को वित्तीय सहायता दी।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस आपदा से यह गंभीर सवाल उठता है कि क्या जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाव के लिए मिलने वाला वित्त हिमालय के अत्यधिक जोखिम वाले समुदायों तक समय पर पहुंच रहा है।
विकासशील देशों में जलवायु कार्रवाई के लिए सहायता देने वाली अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था ग्रीन क्लाइमेट फंड ने नेपाल की उस परियोजना को मंजूरी देने में सात साल लगा दिए, जिसका उद्देश्य तेजी से खतरनाक होते जा रहे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ से संवेदनशील समुदायों की रक्षा करना था। यह जानकारी डाउन टू अर्थ के हाथ लगे दस्तावेजों से सामने आई है।
26 अगस्त को नेपाल में हुई तबाही के बाद इस देरी पर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। उस दिन बर्फ, चट्टानों, मलबे और कीचड़ ने भोटे कोशी और त्रिशूली नदी घाटियों में तबाही मचा दी थी। इस आपदा में बस्तियों, बुनियादी ढांचे और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा।
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रीन क्लाइमेट फंड की इस परियोजना में उत्तरी नेपाल की भोटे कोशी और त्रिशूली नदी घाटियों को सीधे तौर पर शामिल नहीं किया गया था, जहां हाल की आपदा हुई। लेकिन परियोजना का दायरा पूरे नेपाल के लिए था।
इसके उद्देश्य हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ) और अन्य चरम प्राकृतिक खतरों की निगरानी क्षमता बढ़ाना, पूर्व चेतावनी प्रणालियों में सुधार करना और विभिन्न प्रकार की आपदाओं के जोखिम का आकलन करना शामिल था।
फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ नेपाल के एक प्रतिनिधि ने सवाल उठाया, “जब भोटे कोशी में अचानक बढ़े इस विनाशकारी खतरे ने बाढ़ को कीचड़ और मलबे से भरी जल समाधि में बदल दिया, तब वह ‘क्षमता’ कहां थी?”
ग्रीन क्लाइमेट फंड दुनिया की सबसे बड़ी समर्पित जलवायु वित्त संस्था है। इसकी स्थापना विकासशील देशों में कम उत्सर्जन वाले और जलवायु के प्रति अधिक सक्षम विकास को बढ़ावा देने के लिए की गई है।
इसी बीच, उन बहुपक्षीय और द्विपक्षीय वित्तीय संस्थाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिन्होंने जोखिमों की जानकारी होने के बावजूद प्रभावित क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता दी। इनमें एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक समूह की अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) शामिल हैं, जिन्होंने अपर त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना के लिए वित्त उपलब्ध कराया था। वहीं, चीन के निर्यात-आयात बैंक ने त्रिशूली-3ए परियोजना के लिए रियायती ऋण दिया था।
नेपाल में ग्लेशियरों का पिघलना हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है। इसका प्रमुख कारण जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से होने वाला जलवायु परिवर्तन है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) की रिपोर्टों के अनुसार, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर पिछले दशक में उससे पहले के दशक की तुलना में 65 प्रतिशत अधिक तेजी से पिघले।
नेपाल के प्रस्ताव में हिमस्खलन के खतरे की चेतावनी
ग्रीन क्लाइमेट फंड की एफपी272 परियोजना का उद्देश्य नेपाल में हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ) के जोखिम और उसके प्रभाव को कम करना था।
इस संवाददाता को मिले ग्रीन क्लाइमेट फंड के आंकड़ों के अनुसार, परियोजना का अवधारणा प्रस्ताव 14 फरवरी 2018 से ही फंड की प्रस्तावित परियोजनाओं की सूची में था, लेकिन परियोजना को मंजूरी 3 जुलाई 2025 को ही मिली।
इस पर अमल 12 मार्च 2026 से शुरू हुआ और परियोजना 12 मार्च 2033 तक चलेगी। 49.9 मिलियन डॉलर (लगभग 473.83 करोड़ रुपए) की इस परियोजना का उद्देश्य करीब 24 लाख लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
इस संवाददाता ने परियोजना में हुई देरी के कारणों के बारे में ग्रीन क्लाइमेट फंड से जवाब मांगा था, लेकिन खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला था।
नेपाल की ओर से वित्तीय सहायता के लिए दिए गए प्रस्ताव की एक प्रति इस संवाददाता के पास है। इसमें ग्लेशियरों से जुड़े हिमस्खलन के खतरे को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया था।
प्रस्ताव में कहा गया था, “प्रतिनिधि सांद्रता पथ 4.5 और 8.5 परिदृश्य (जलवायु परिवर्तन की मध्यम और चरम स्थितियां) संकेत देते हैं कि भविष्य में तापमान और मानसूनी बारिश दोनों बढ़ती रहेंगी। इससे झीलों में पानी की मात्रा बढ़ेगी और हिमस्खलन, चट्टानें गिरने तथा बांध की दीवार टूटने की आशंका भी बढ़ेगी। खास तौर पर ये घटनाएं हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ) को जन्म देती हैं।”
प्रस्ताव में आगे कहा गया था, “1970 के दशक से अब तक 47 संभावित रूप से खतरनाक हिमनदीय झीलों से जीएलओएफ की 26 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनके विनाशकारी परिणाम हुए हैं।”
प्रस्ताव में चेतावनी दी गई थी कि जीएलओएफ के कारण भीषण बाढ़, भूस्खलन और कीचड़ के बहाव की घटनाएं हो सकती हैं। इससे बुनियादी ढांचे और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ परिवहन नेटवर्क, कृषि उत्पादन, जलविद्युत आपूर्ति और पर्यटन भी प्रभावित हो सकते हैं।
अभियान चलाने वाले संगठनों का कहना है कि प्रस्ताव के कुछ हिस्से अब 26 अगस्त को नेपाल में हुई तबाही की चेतावनी जैसे लगते हैं। इस संवाददाता को मिले जीसीएफ के दस्तावेजों में भी इस खतरे को स्वीकार किया गया था।
दस्तावेज में कहा गया था, “जलवायु परिवर्तन के कारण नेपाल में ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं, जिससे हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। इससे निचले इलाकों में रहने वाले समुदायों की सुरक्षा, आजीविका और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर खतरा मंडरा रहा है।”
प्रस्ताव में आगे चेतावनी दी गई थी कि “जीएलओएफ से होने वाला नुकसान अक्सर दशकों तक अपूरणीय रहता है और इसकी आर्थिक कीमत बहुत अधिक होती है, खासकर निचले इलाकों में रहने वाली आबादी के लिए।”
फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ नेपाल के एक प्रतिनिधि ने कहा, “यूएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार, यूएन की यह एजेंसी नेपाल के जल तथा मौसम विज्ञान विभाग के साथ मिलकर जीसीएफ से वित्तपोषित परियोजना को लागू कर रही है। ल्हेंदे-भोटे कोशी एफपी272 परियोजना के तहत हस्तक्षेप वाले क्षेत्रों में शामिल नहीं था। लेकिन एफपी272 के तहत पूरे देश में जीएलओएफ की निगरानी, पूर्व चेतावनी और विभिन्न आपदाओं के जोखिम का आकलन करने की व्यापक जिम्मेदारी थी।”
जलविद्युत परियोजनाओं पर खतरा
साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (सेंड्रप) ने 29 अगस्त को जारी अपने विश्लेषण में कहा कि यह आपदा दक्षिण एशिया में तेजी से बढ़ रहे जलविद्युत विस्तार के लिए “एक निर्णायक मोड़” साबित हो सकती है। इस जलविद्युत विस्तार को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं, एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक जैसे बहुपक्षीय बैंकों तथा चीन के एक्सिम बैंक का समर्थन मिला है।
संगठन ने कहा कि अपर त्रिशूली-1 और त्रिशूली-3ए जैसी परियोजनाओं की सुरंगों के भीतर सैकड़ों जलविद्युत मजदूर, इंजीनियर और स्थानीय लोग फंस गए थे। त्रिशूली-3ए परियोजना के लिए चीन के एक्सिम बैंक ने ऋण दिया था।
647.4 मिलियन डॉलर की अपर त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना नेपाल के इतिहास में सबसे बड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेशों में से एक है। विश्व बैंक समूह की सदस्य संस्था अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) ने 1 नवंबर 2019 को घोषणा की थी कि ऋणदाताओं के एक समूह ने परियोजना के निर्माण के लिए 453 मिलियन डॉलर के ऋण वित्तपोषण पैकेज को अंतिम रूप दे दिया है।
उस समय आईएफसी ने कहा था कि यह परियोजना नेपाल में मौजूदा बिजली आपूर्ति को एक-तिहाई बढ़ा देगी।
एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और एशियाई इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक ने परियोजना के लिए संयुक्त रूप से 150 मिलियन डॉलर का ऋण दिया था। ऋण पैकेज की शेष राशि विकास वित्त संस्थाओं के एक समूह से आई थी। इसमें ब्रिटेन का सीडीसी समूह, जिसे अब ब्रिटिश इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट के नाम से जाना जाता है, दक्षिण कोरिया का कोरिया डेवलपमेंट बैंक और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ कोरिया, नीदरलैंड का एफएमओ और ओपेक फंड शामिल थे।
परियोजना की शुरुआत में एडीबी ने कहा था कि जलवायु परिवर्तन के जोखिम का आकलन पहले ही किया जा चुका है और उसमें परियोजना पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का जोखिम कम पाया गया था। हालांकि, उसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि पिछले वर्षों में हुई अत्यधिक बारिश और 2025 में आई हिमनदीय झील के फटने से आई बाढ़ की एक घटना ने निर्माणाधीन परियोजना की कुछ सुविधाओं को क्षतिग्रस्त कर दिया था। इस घटना ने त्रिशूली नदी के किनारे नदी के स्वरूप को भी काफी हद तक बदल दिया था।
जून 2025 में स्वतंत्र विशेषज्ञों के एक पैनल की रिपोर्ट में इस परियोजना के लिए विशेष रूप से जलवायु अनुकूलन क्षमता का आकलन करने की सिफारिश की गई थी। अभियान चलाने वाले संगठनों का कहना है कि यह आकलन अभी तक नहीं किया गया है। सैंड्रप ने यह भी आरोप लगाया कि 2020 में त्रिशूली बेसिन के संचयी प्रभाव का आकलन करते समय, जो ऋण देने की शर्तों को पूरा करने के लिए किया गया था, आईएफसी और विश्व बैंक ने ऊपरी क्षेत्रों से आने वाले खतरों की पर्याप्त जांच नहीं की और तिब्बत पर पड़ने वाले प्रभावों का भी आकलन नहीं किया।
संगठन ने चीन के एक्सिम बैंक की भूमिका की ओर भी इशारा किया, जिसने त्रिशूली-3ए जलविद्युत परियोजना के लिए 149 मिलियन डॉलर का रियायती ऋण दिया था।
सैंड्रप का आरोप है कि चीन के एक्सिम बैंक ने स्वतंत्र और बाध्यकारी पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय सुनिश्चित नहीं किए। इसके बजाय उसने मेजबान देश के नियमों या स्वैच्छिक कदमों पर भरोसा किया, जबकि चीन और नेपाल हिमालय की उस सीमापार नदी घाटी के कुछ सबसे संवेदनशील और आपदा की दृष्टि से जोखिम वाले हिस्सों को साझा करते हैं।
जलवायु वित्त पर सवाल
जलवायु क्षेत्र में काम करने वाले अभियानों से जुड़े लोगों और विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त की उस विफलता की आलोचना की, जिसके कारण उनके अनुसार बढ़ते खतरों से निपटने के लिए धन समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ एशिया पैसिफिक की मीना रमन ने कहा, “यह बेहद चौंकाने वाली बात है कि ग्रीन क्लाइमेट फंड ने मानव गतिविधियों के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन से बढ़ते हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ के खतरे से समुदायों, बुनियादी ढांचे और पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा के उद्देश्य से तैयार परियोजना को मंजूरी देने में सात साल लगा दिए।”
क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया के निदेशक संजय वशिष्ट ने कहा कि ग्लेशियरों से जुड़े खतरों से निपटने के लिए अनुकूलन कार्यों के वित्तपोषण में देरी और दूसरी ओर बड़े पैमाने पर जलविद्युत परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देना, उन संवेदनशील समुदायों को आपदा से बचने की क्षमता से वंचित करने के समान है, जिनके सामने “तत्काल मौत” का खतरा मंडरा रहा है।
फिल द फंड अभियान के वैश्विक संयोजक और सतत संपदा क्लाइमेट फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक हरजीत सिंह ने आरोप लगाया, “नेपाल में जो कुछ हम देख रहे हैं, वह एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था का घातक परिणाम है, जिसमें व्यवस्था को पहले से ही इस तरह बनाया गया है कि कुछ लोगों को लाभ मिले।”
उन्होंने कहा, “हिमनदीय बाढ़ से बचाव के लिए जरूरी सहायता उपलब्ध कराने में जीसीएफ की देरी इस बात का उदाहरण है कि औद्योगिक रूप से समृद्ध देशों ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त व्यवस्था को किस तरह बनाया है। विकसित देशों ने जानबूझकर जीसीएफ जैसी संस्थाओं को इस तरह तैयार किया है कि वे अक्षम बनी रहें और विकासशील देशों के लिए उनसे सहायता हासिल करना मुश्किल हो।”
“मैं यह सोच रहा हूं कि आखिर किस तरह का संचयी प्रभाव आकलन किया गया है। आदर्श रूप से, एक समग्र लागत-लाभ विश्लेषण में भूकंपीय गतिविधियों, हिमनदीय झीलों के फटने से आने वाली बाढ़, बादल फटने और अन्य संभावित चरम घटनाओं की आशंका के साथ-साथ पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली सेवाओं पर पड़ने वाले प्रभाव को भी शामिल किया जाना चाहिए। इन सभी कारकों का आर्थिक मूल्य निर्धारित कर उन्हें लागत-लाभ के आकलन में शामिल किया जाना जरूरी है। ऐसा किया जाता तो ऐसी परियोजनाएं आर्थिक, सामाजिक और वित्तीय रूप से अव्यवहारिक साबित होतीं।
यह दिखाता है कि परियोजनाओं की व्यवहार्यता का आकलन किस हद तक एक सीमित और संकुचित नजरिए से किया जाता है,” पारिस्थितिकी अर्थशास्त्री नीलांजन घोष ने कहा। वह ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के कोलकाता केंद्र के प्रमुख हैं और इस क्षेत्र की नदियों पर काम करते हैं।
जलवायु वैज्ञानिक और संयुक्त राष्ट्र की एक जलवायु रिपोर्ट के लेखक अंजल प्रकाश ने कहा कि नेपाल की जीएलओएफ परियोजना में हुई देरी ने जलवायु वित्त उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
उन्होंने कहा, “जब किसी तात्कालिक खतरे से निपटने की परियोजना को अवधारणा से मंजूरी तक पहुंचने में सात साल लग जाते हैं, तो समस्या केवल कागजी प्रक्रिया की नहीं है। सवाल यह है कि क्या आपदा आने से पहले संवेदनशील समुदायों को सुरक्षा मिल पाएगी।”
उन्होंने कहा कि एक बेहतर व्यवस्था में परियोजनाओं को मंजूरी की लंबी प्रक्रिया को छोटा करना चाहिए, मंजूरियों को सरल बनाना चाहिए और यह निगरानी करनी चाहिए कि क्या ऊंचे जोखिम वाले पर्वतीय क्षेत्रों तक धन इतनी तेजी से पहुंच रहा है कि उसका वास्तविक लाभ मिल सके।
विशेषज्ञ ने कहा, “अन्यथा, जलवायु वित्त उन जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए बहुत धीमा साबित होने का खतरा है, जिनका समाधान करने के लिए इसे बनाया गया है।”