मिडिल ईस्ट संकट: 2026 में 1.1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है जीवाश्म ईंधन को दी जा रही सब्सिडी

मिडिल ईस्ट तनाव से बढ़ी तेल कीमतों ने विकासशील देशों को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां महंगाई से जनता को राहत देने की कीमत स्कूलों, अस्पतालों और जलवायु निवेश में कटौती के रूप में चुकानी पड़ रही है।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने दुनिया के विकासशील देशों को गहरे आर्थिक संकट की ओर धकेल दिया है।

  • संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की नई रिपोर्ट 'मिलिट्री एस्केलेशन इन द मिडिल ईस्ट: कुशनिंग द ग्लोबल शॉक' के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से जनता को राहत देने के लिए कमजोर और मध्यम आय वाले देशों को जीवाश्म ईंधन पर भारी सब्सिडी देनी पड़ रही है।

  • अनुमान है कि यदि तेल की औसत कीमत 88.6 डॉलर प्रति बैरल पर रहती है, तो 2026 में वैश्विक जीवाश्म ईंधन सब्सिडी 1.1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। अगर हालात और बिगड़े तथा तेल 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा, तो यह बोझ 1.43 ट्रिलियन डॉलर तक जा सकता है।

  • रिपोर्ट चेतावनी देती है कि इस राहत की भारी कीमत विकासशील देशों को शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छ ऊर्जा जैसे जरूरी क्षेत्रों में कटौती के रूप में चुकानी पड़ रही है।

  • यह संकट ऐसे समय में आया है, जब कई देश पहले ही कर्ज के बोझ से दबे हैं। इस साल विकासशील देशों को अपनी सरकारी आय का औसतन 9.53 फीसदी हिस्सा सिर्फ ब्याज चुकाने में खर्च करना पड़ सकता है।

  • यूएनडीपी का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सस्ती वित्तीय मदद और अक्षय ऊर्जा निवेश का रास्ता नहीं खोला, तो यह तेल झटका आने वाले वर्षों में विकास, जलवायु और आर्थिक स्थिरता—तीनों पर गहरा असर डालेगा।

मिडिल ईस्ट में भड़के तनाव की चिंगारियों ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को अपनी चपेट में ले लिया है। हालांकि इसका सबसे ज्यादा असर कमजोर और विकासशील देशों पर पड़ रहा है, जो पहले ही बढ़ते कर्ज और सीमित वित्तीय संसाधनों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की नई रिपोर्ट के मुताबिक, इस भू-राजनीतिक टकराव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में आए तेज उछाल ने विकासशील देशों को ऐसे मुश्किल मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां उनके लिए जनता को राहत देने और विकास पर खर्च के बीच संतुलन साधना मुश्किल हो रहा है।

तेल झटके ने क्यों बढ़ाई विकासशील देशों की मुश्किलें

हालात ये हैं कि देश अपनी जनता को महंगाई के तात्कालिक झटके से बचाने के लिए अपने सीमित वित्तीय संसाधनों को 'जीवाश्म ईंधन सब्सिडी' की भट्टी में झोंकने पर मजबूर हो गए हैं। नतीजतन, बच्चों की शिक्षा, बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी दूसरी जरूरी प्राथमिकताओं निपटने के लिए रखा गया बजट स्वाहा हो रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की इस ताजा रिपोर्ट, 'मिलिट्री एस्केलेशन इन द मिडिल ईस्ट: कुशनिंग द ग्लोबल शॉक' में चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन को दी जा रही सब्सिडी को कम करने के जो प्रयास बीते वर्षों में किए गए थे, वे इस युद्ध की भेंट चढ़ चुके हैं।

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ऐसे में अगर कच्चे तेल की औसत कीमत 88.6 डॉलर प्रति बैरल पर भी थमती है, तो 2026 में दुनिया का जीवाश्म ईंधन सब्सिडी बिल बढ़कर 1.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 104.9 लाख करोड़ रुपए) के ऐतिहासिक आंकड़े को छू लेगा। यह आंकड़ा बीते साल की तुलना में 41,000 करोड़ डॉलर (39.1 लाख करोड़ रुपए) अधिक है।

जनता को राहत, लेकिन किस कीमत पर?

इतना ही नहीं, यदि युद्ध की स्थिति और बदतर होती है और तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंचती हैं, तो यह बोझ 1.43 ट्रिलियन डॉलर (करीब 136.3 लाख करोड़ रुपए) के विनाशकारी स्तर पर पहुंच सकता है, जो दुनिया की कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की कमर तोड़ देगा।

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रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि कमजोर और मध्यम आय वाले देशों ने तेल की बढ़ती कीमतों के असर से लोगों को बचाने के लिए जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी, कीमतों पर नियंत्रण, कर में छूट और खपत घटाने जैसे कदम उठाए हैं। इन उपायों से लोगों को फिलहाल कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन इसकी आर्थिक कीमत बहुत बड़ी है।

यूएनडीपी के प्रशासक अलेक्जेंडर डी क्रू का कहना है, "मिडिल ईस्ट संकट का यह वैश्विक असर न केवल बेहद गहरा है, बल्कि इसके परिणाम लंबे समय तक भुगतने होंगे।"

उनके मुताबिक, कई विकासशील देश पहले ही कर्ज के बोझ तले दबे हैं, फिर भी ये देश इस ऊर्जा संकट से अपनी जनता को बचाने के लिए जो अस्थाई तौर पर जो कुछ कर सकते हैं, वो कर रहे हैं। लेकिन इसकी एक छिपी हुई कीमत है, आज के संकट को टालने के लिए सरकारें अपने कल के भविष्य का सौदा कर रही हैं।

कर्ज का जाल और ब्याज का बढ़ता बोझ

जो पैसा नए स्कूल, अत्याधुनिक अस्पताल और साफ-सुथरे ऊर्जा संयंत्र बनाने में इस्तेमाल होना चाहिए था, वह सिर्फ डूबती अर्थव्यवस्थाओं की सांसें चालू रखने के लिए ईंधन में फूंका जा रहा है। ऐसे में बिना किसी अंतरराष्ट्रीय सहयोग के ये देश इस सदमे से उबर नहीं पाएंगे और यह रिकवरी सीधे तौर पर उनके भविष्य के विकास की कीमत पर हो रही है।

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रिपोर्ट के मुताबिक, यह संकट ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के करीब आधे सबसे कमजोर देश पहले ही कर्ज के भंवर जाल में फंसे हैं या बेहद जोखिम भरे दौर से गुजर रहे हैं। विकासशील देशों की स्थिति यह हो चुकी है कि इस साल उन्हें अपनी कुल सरकारी आय का औसतन 9.53 फीसदी हिस्सा केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में गंवाना पड़ेगा।

सब्सिडी कैसे बढ़ा रही है जलवायु जोखिम

यह हिस्सा बीते एक दशक की तुलना में दोगुना और पिछले 25 वर्षों में ब्याज भुगतान का सबसे उच्चतम स्तर है। वहीं, 2024 से 2026 के तीन साल के औसत के आधार पर 55 विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के अपनी आय का 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सा केवल ब्याज भुगतान पर खर्च करने का अनुमान है। एक दशक पहले ऐसे देशों की संख्या महज 32 थी। यह दिखाता है कि आर्थिक दबाव कितनी तेजी से बढ़ा है।

ऐसे में संयुक्त राष्ट्र ने आगाह किया है कि ईंधन पर दी जा रही यह भारी सब्सिडी भले ही आम जनता को कुछ समय के लिए राहत दे रही हो, लेकिन यह अंततः देशों को अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन वाले पुराने ढर्रे पर ही लॉक कर देगी और भविष्य में पर्यावरण अनुकूल निवेश के सारे रास्ते बंद हो जाएंगे।

क्या है इस संकट से निकलने का रास्ता

यूएनडीपी प्रशासक ने स्पष्ट किया कि किसी भी देश को उस संकट की इतनी बड़ी कीमत नहीं चुकानी चाहिए जिसे पैदा करने में उसका कोई हाथ नहीं था। उनके अनुसार, सबसे पहले बहुपक्षीय वित्तीय सहायता को इस तरह उपलब्ध कराना होगा कि कमजोर और मध्यम आय वाले देशों के लिए उसे हासिल करना आसान हो। दूसरा, अक्षय ऊर्जा में निवेश तेज करना होगा, क्योंकि स्वच्छ ऊर्जा में हर निवेश भविष्य के ऐसे झटकों से सुरक्षा देता है।

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साफ है कि मिडिल ईस्ट का यह संकट सिर्फ तेल की बढ़ती कीमतों का संकट नहीं, बल्कि विकासशील देशों के भविष्य पर मंडराता दोहरा खतरा है, एक ओर जनता को तत्काल राहत देने की मजबूरी, तो दूसरी ओर शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छ ऊर्जा जैसे बुनियादी निवेशों में लगातार आ रही गिरावट।

ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने समय रहते सस्ती वित्तीय मदद और अक्षय ऊर्जा निवेश का रास्ता नहीं खोला, तो यह तेल झटका आने वाले वर्षों में विकास, जलवायु और आर्थिक स्थिरता, तीनों पर गहरा घाव छोड़ सकता है।

एक डॉलर = 95.35 भारतीय रुपए

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