

हिमाचल प्रदेश के ऊंचे हिमालयी चरागाहों की ओर हर वर्ष होने वाला गद्दी और गुज्जर समुदायों का सदियों पुराना मौसमी प्रवास अब पहले जैसा नहीं रहा। जिन पहाड़ी रास्तों, बर्फबारी के चक्र, घास के मैदानों और जल स्रोतों के भरोसे इन समुदायों ने पीढ़ियों तक अपनी आजीविका और संस्कृति को जीवित रखा, वे तेजी से बदल रहे हैं।
कभी मौसम उनका सबसे भरोसेमंद साथी था, आज वही सबसे बड़ी अनिश्चितता बन चुका है। सिकुड़ते चरागाह, टूटते प्रवास मार्ग, बढ़ती पशु बीमारियां, चरम मौसमी घटनाएं और घटती आय ने इन पारंपरिक पशुपालक समुदायों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है।
ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2026 को अंतरराष्ट्रीय चरागाह एवं पशुपालक वर्ष घोषित किया है, ताकि चरागाहों, जैव विविधता और पारंपरिक पारिस्थितिकीय ज्ञान के संरक्षण में पशुपालक समुदायों के योगदान को वैश्विक मान्यता मिल सके। लेकिन हिमाचल के गद्दी और गुज्जर समुदायों के लिए यह वर्ष उत्सव से अधिक आत्ममंथन का अवसर बन गया है।
कौन हैं गद्दी और गुज्जर?
गद्दी और गुज्जर हिमाचल प्रदेश के दो प्रमुख पारंपरिक पशुपालक समुदाय हैं, जिनकी जीवनशैली ट्रांसह्यूमैन्स यानी मौसमी प्रवास पर आधारित है। गर्मियों में ये अपने पशुओं के साथ ऊंचे हिमालयी चरागाहों की ओर जाते हैं और सर्दियों में निचले क्षेत्रों में लौट आते हैं।
गद्दी समुदाय मुख्यतः चंबा (भरमौर और पांगी) तथा कांगड़ा क्षेत्र में निवास करता है और परंपरागत रूप से भेड़-बकरी पालन से जुड़ा है। वहीं गुज्जर समुदाय भैंस पालन करता है तथा सोलन, सिरमौर, शिमला की तलहटी, ऊना, बिलासपुर और कांगड़ा के वन क्षेत्रों में मौसमी प्रवास करता है। 2011 की जनगणना के अनुसार हिमाचल प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों की आबादी लगभग 3.9 लाख है, जिनमें गद्दी और गुज्जर सबसे प्रमुख समुदायों में शामिल हैं।
"अब मौसम अनुभव से नहीं चलता"
सोलन जिले के 62 वर्षीय गुज्जर चरवाहे हसन दीन कहते हैं, "पहले हमें पता होता था कि किस महीने में कहाँ पहुँचना है और रास्ते में कैसा मौसम मिलेगा। अब मौसम का कोई भरोसा नहीं रहा। कई बार वर्षों का अनुभव भी धोखा खा जाता है।"
हसन दीन बताते हैं कि उनके पूर्वज पिछले लगभग 250 वर्षों से सोलन के नालागढ़ से शिमला जिले के नारकंडा तक करीब 190 किलोमीटर लंबा मौसमी प्रवास करते आए हैं। यह यात्रा पीढ़ियों से संचित स्थानीय ज्ञान का हिस्सा थी जिसमें उन्हें पता रहता था कि कहाँ पानी मिलेगा, कहाँ घास होगी और किस पड़ाव पर विश्राम करना है। मगर अब कई जगह घास नहीं बची, पानी के स्रोत सूख गए हैं और मौसम कब बदल जाए, इसका कोई भरोसा नहीं," हसन दीन चिंतित होकर कहते हैं।
हसन दीन की यह कहानी अकेली नहीं है। यही चिंता हिमाचल के हजारों गद्दी और गुज्जर पशुपालकों की है, जिनकी पूरी जीवन-पद्धति जलवायु परिवर्तन और बदलते भू-दृश्य के बीच डगमगाने लगी है।
बदलता मौसम, बदलते रास्ते
भरमौर के 61 वर्षीय गद्दी चरवाहे दलती राम बताते हैं, "पहले बर्फ पिघलने का समय तय होता था। हमें पता रहता था कि कब ऊंची चोटियों की ओर चढ़ना है और कब नीचे उतरना है। अब तो कभी मई-जून में भी बर्फ पड़ जाती है, तो कभी अप्रैल में ही घास सूख जाती है।"
चरवाहों के ये अनुभव वैज्ञानिक अध्ययनों से भी मेल खाते हैं। नेपाल स्थित अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) की हाइ-वाइज रिपोर्ट बताती है कि हिमालयी पशुपालकों का पारंपरिक सीज़नल कैलेंडर जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार अस्थिर हो रहा है। रिपोर्ट इस स्थिति को प्रिडिक्टेबिलिटी क्राइसिस यानी पूर्वानुमान का संकट कहती है।
बर्फ, वर्षा, तापमान और वनस्पति के जिन संकेतों के आधार पर सदियों से प्रवास की योजना बनाई जाती थी, वे अब भरोसेमंद नहीं रहे।
भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे के अनुसार 1950 के बाद पश्चिमी हिमालय का औसत तापमान लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। इसके साथ ऊपरी हिमालय में बर्फबारी कम हुई है और अत्यधिक वर्षा जैसी चरम मौसमी घटनाएं बढ़ी हैं। सबसे पहला असर उन समुदायों पर पड़ा है जिनकी आजीविका सीधे मौसम पर निर्भर है।
मौसम के साथ प्रवास के रास्ते भी बदल गए हैं। सेंटर फॉर पेस्ट्रोलिज्म और हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा 2022–25 के बीच किए गए माइग्रेशन मैपिंग प्रोजेक्ट में गद्दी समुदाय के 1,637 पारंपरिक प्रवास मार्गों का दस्तावेजीकरण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाओं, भूस्खलन, शहरी विस्तार और जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक पुराने मार्ग बाधित हो चुके हैं।
हसन दीन कहते हैं, "पहले हम तय रास्तों से आते-जाते थे। अब कई जगह सड़कें और इमारतें बन गई हैं। पुराने रास्ते खत्म हो गए हैं। ट्रैफिक इतना बढ़ गया है कि कई बार दिन की बजाय रात में पशुओं को लेकर चलना पड़ता है।"
यानी जलवायु परिवर्तन ने केवल मौसम नहीं बदला, बल्कि हिमालय में सदियों से चले आ रहे पशुपालकों के भूगोल और जीवन की लय भी बदल दी है।
बदलती पहचान, चरागाहों का संकट और महिलाओं पर बढ़ता बोझ
जलवायु परिवर्तन का असर केवल मौसम और चरागाहों तक सीमित नहीं है, बल्कि गद्दी और गुज्जर समुदायों की सांस्कृतिक पहचान पर भी साफ दिखाई देने लगा है।
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी अजय कुमार बताते हैं कि कभी गद्दी चरवाहे प्रवास के दौरान 'चोला' (भेड़ की ऊन से बना लंबा कुर्तानुमा परिधान) और 'डोरा' (कमर पर बांधी जाने वाली ऊनी रस्सीनुमा पेटी) तथा पायजामा पहनते थे। ये परिधान उनकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा थे। आज अपेक्षाकृत गर्म मौसम, आधुनिक जीवनशैली और सुविधाजनक कपड़ों के कारण अधिकांश चरवाहे ट्रैक पैंट, जैकेट, टी-शर्ट और रेनकोट पहनकर प्रवास करते हैं। यह बदलाव केवल पहनावे का नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली और कमजोर पड़ती सांस्कृतिक विरासत का भी संकेत है।
पशुधन पर दोहरी मार
जलवायु परिवर्तन का सबसे सीधा असर पशुधन पर पड़ रहा है। भरमौर के 47 वर्षीय गद्दी चरवाहे स्वरूप बताते हैं, "पहले हमारी भेड़-बकरियां इतनी बीमार नहीं पड़ती थीं। अब खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियां बढ़ गई हैं। जंगली जानवर भी भोजन और पानी की तलाश में उन्हीं इलाकों में पहुंच रहे हैं जहां हमारे पशु चरते हैं।"
उनके अनुसार बीमारियों, जंगली जानवरों के हमलों, बिजली गिरने, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से हर वर्ष झुंड का लगभग 10 प्रतिशत नुकसान हो जाता है।
गुज्जर पशुपालक मोहम्मद आलम बताते हैं कि अनियमित वर्षा और बढ़ती नमी के कारण भैंसों में गलघोटू जैसी बीमारियां बढ़ी हैं। पिछले वर्ष उनके समुदाय की लगभग 40 भैंसों की मौत इसी बीमारी से हुई।
वैज्ञानिक संस्थाएं भी इन अनुभवों की पुष्टि करती हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन और विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बढ़ता तापमान, बदलती वर्षा और नमी पशुओं में रोग फैलाने वाले कीटों और परजीवियों के विस्तार को बढ़ा रहे हैं। इससे भेड़, बकरी और भैंसों में संक्रामक रोगों का जोखिम पहले की तुलना में अधिक हो गया है।
सिकुड़ते चरागाह, बढ़ती मुश्किलें
सिकुड़ती चारागाहों से इन समुदायों की मुश्किलें और बढ़ रही हैं। गुज्जर चरवाहे हसन दीन की पत्नी सफूरा कहती हैं, "पहले जहां घास के बड़े मैदान थे, वहां अब झाड़ियां और चीड़ फैल गए हैं। कई बार हमें पशुओं के लिए चारा साथ लेकर चलना पड़ता है।"
हिमाचल कृषि विश्वविद्यालय और अन्य वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार तापमान बढ़ने के साथ लैंटाना और पार्थेनियम जैसी आक्रामक खरपतवार ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक फैल रही हैं। जो खरपतवार पहले लगभग 2,000 फीट तक सीमित थे, वे अब 6,000 फीट या उससे अधिक ऊंचाई तक पहुंच चुके हैं। इससे स्थानीय घास प्रजातियां तेजी से कम हो रही हैं और चरागाहों की उत्पादकता घट रही है।
बर्फ जल्दी पिघलने, अनिश्चित वर्षा और घटती घास के कारण चरवाहों को अब पहले से कहीं अधिक दूरी तय करनी पड़ती है। इसका असर पशुओं के स्वास्थ्य, दूध और ऊन उत्पादन के साथ-साथ उनकी आय पर भी पड़ रहा है।
महिला पशुपालकों पर बढ़ता बोझ
जलवायु परिवर्तन का सबसे गहरा असर महिला पशुपालकों पर दिखाई देता है। गद्दी समुदाय में जहां अधिकांश पुरुष प्रवास पर रहते हैं, वहीं गुज्जर समुदाय में महिलाएं भी पूरे परिवार के साथ यात्रा करती हैं। वे पशुओं की देखभाल, दूध दुहने, भोजन बनाने, बच्चों और बुजुर्गों की जिम्मेदारी एक साथ निभाती हैं।
सफूरा बताती हैं, "पहले पानी पास में मिल जाता था। अब कई बार काफी दूर जाना पड़ता है। चारा भी पहले जैसा नहीं मिलता। दिनभर का काम पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है।"
आईसीआईएमओडी के अनुसार जलवायु परिवर्तन की वजह से हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र की महिलाओं के सामने चुनौतियां बढ़ रही हैं। पानी और इकोसिस्टम से मिलने वाली सुविधाओं की उपलब्धता में बदलाव के कारण, महिलाओं को पानी, चारा और जलाने की लकड़ी इकट्ठा करने में ज़्यादा समय बिताना पड़ता है।
वहीं एफएओ की रिपोर्ट 'दी अनजस्ट क्लाइमेट (2024)' कहती है कि जलवायु परिवर्तन महिलाओं के काम के घंटे बढ़ा रहा है। चरम मौसमी घटनाओं से पानी और लकड़ी जुटाने जैसे कार्यों के लिए महिलाओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
युवा क्यों छोड़ रहे हैं यह पेशा?
आर्थिक अनिश्चितता और जलवायु जोखिमों के कारण नई पीढ़ी तेजी से इस परंपरागत पेशे से दूर हो रही है। भरमौर के 29 वर्षीय राजू, जो बचपन से अपने पिता के साथ धौलाधार और पीर पंजाल के चरागाहों में जाते थे, अब धर्मशाला की एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं। वे कहते हैं, "पहले कम से कम मौसम का भरोसा था। अब मेहनत भी बढ़ गई है और आमदनी भी तय नहीं है। इसलिए मैंने यह काम छोड़ दिया।"
नई पीढ़ी के इस पेशे से पीछे हटने के सवाल पर हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. भरत सिंह, जो स्वयं गद्दी समुदाय से आते हैं, कहते हैं “शिक्षा, बदलती आकांक्षाओं और अस्थिर आय के कारण युवा अब पारंपरिक पशुपालन को भविष्य के रूप में नहीं देख रहे हैं।” इससे केवल एक पेशा नहीं छूट रहा, बल्कि पीढ़ियों से संचित ज्ञान की श्रृंखला भी टूट रही है।
क्या हो सकता है समाधान?
पर्यावरणविद कुलभूषण उपमन्यु का मानना है कि समाधान केवल पशुधन बढ़ाने में नहीं, बल्कि चरागाहों को पुनर्जीवित करने में है। उनके अनुसार वेस्टलैंड का दर्जा खत्म कर इन क्षेत्रों में चारा विकास को बढ़ावा दिया जाए, आक्रामक खरपतवार हटाने के लिए विशेष अभियान चलाया जाए तथा जल स्रोतों के संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए।
हिमाचल प्रदेश सरकार ने पहल नाम से योजना शुरू की है, जिसमें पशुधन का डिजिटल पंजीकरण, मोबाइल पशु चिकित्सा सेवाएं, बेहतर बीमा और प्रवास मार्गों के दस्तावेजीकरण जैसे प्रावधान हैं। मगर विशेषज्ञों का कहना है कि इसे जलवायु अनुकूलन, चरागाह संरक्षण, महिला पशुपालकों और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण से भी जोड़ना होगा तभी यह कार्यक्रम प्रभावी हो सकेगा।
सबसे कम उत्सर्जन, सबसे अधिक असर
जम्मू-कश्मीर के गद्दी पशुपालकों पर किया गया एक अध्ययन बताता है कि पशुपालन में ग्रीनहाउस गैसों का आकलन अधिकांशतया औद्योगिक पशुपालन पर के आंकड़ों पर ही आधारित है जिसमें पशुओं को बाड़े में रखकर बाहर से चारा लाया जाता है। मगर ये मॉडल पारंपरिक चराई वाले सिस्टम में मौजूद कार्बन-नाइट्रोजन चक्र और कार्बन अवशोषण को नजरअंदाज कर देता है।
गद्दी और गुज्जर समुदायों की ट्रांसह्यूमन्स प्रणाली इसी श्रेणी में आती है जिसमें पशु प्राकृतिक चरागाहों पर निर्भर हैं, बाहरी चारे और मशीनों का उपयोग न्यूनतम है और अधिकांश प्रवास पैदल होता है। इसके बावजूद जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर असर इन्हीं समुदायों पर पड़ रहा है।
62 वर्षीय हसन दीन धीमी आवाज में कहते हैं, "हमारे बाद शायद कोई यह काम नहीं करेगा।"
यह केवल एक चरवाहे की चिंता नहीं, बल्कि हिमालय के भविष्य पर उठता सवाल है। यदि चरागाहों के संरक्षण, जलवायु अनुकूलन, सामाजिक सुरक्षा और पारंपरिक ज्ञान को हमारी नीतियों में पर्याप्त स्थान नहीं मिला, तो हिमालय का केवल एक पारंपरिक पेशा नहीं खोएगा बल्कि प्रकृति के साथ मिलकर रहने की सदियों पुरानी जीवन-पद्धति, सांस्कृतिक विरासत और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने वाली एक अमूल्य परंपरा भी खत्म हो जाएगी।
रमन कान्त एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म के क्लाइमेट चेंज मीडिया हब के मेंटी हैं। यह कार्यक्रम जर्मनी की इंटरलिंक अकादमी द्वारा समर्थित है।