आखिर कब तक? आपदाओं के बीच जीने का सवाल
वह ऐसी रात थी जो आने वाली मुसीबत का संकेत दे रही थी। आधी रात के बाद आसमान गूंज उठा। घनघोर बादलों को चीरती हुई बिजली बार-बार चमक रही थी। नींद नहीं आ रही थी, इसलिए मैं अपने देहरादून वाले घर की बालकनी में खड़ी थी। हर गुजरते घंटे के साथ बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मैंने एक छोटा सा बैग तैयार कर लिया, जिसमें लैपटॉप, चार्जर और कुछ जरूरी सामान रख लिया था, ताकि हालात बिगड़ने पर तुरंत निकल सकूं।
शायद मैं एक घंटे के लिए ऊंघ गई थी कि तभी फोन की घंटी बजी। 16 सितंबर 2025 की तड़के सहस्रधारा इलाके में हुई भीषण बादल फटने की घटना ने उत्तराखंड की राजधानी से गुजरने वाली मौसमी नदियों में अचानक बाढ़ ला दी। इमारतें और सड़कें बह गईं। देहरादून में पली बढ़ी होने के नाते मैं पूरे विश्वास से कह सकती हूं कि यह पहली बार था जब बारिश से आई बाढ़ ने शहर की नदियों में इतनी बड़ी तबाही मचाई हो।
आज का देहरादून वह नींद में डूबा हुआ और पेड़ों से घिरा हुआ कस्बा नहीं रहा, जिसे कभी देहरा कहा जाता था। या फिर जिसे रस्किन बॉन्ड की रचनाओं में महसूस किया जा सकता है। कभी घाटी में पक्षियों की आवाज गूंजती थी। यातायात इतना कम होता था कि दूर से आती किसी गाड़ी का हॉर्न चौंका देता था। पानी का रिश्ता भी शहर के साथ काफी सहज था। रिस्पना और बिंदाल नदियां अपने प्राकृतिक रास्तों में बहती थीं और खेतों व आजीविका को सहारा देती थीं।
मुझे याद है कि शाम के समय महिलाएं नदी से पकड़ी गई मछलियां बेचती थीं और किनारों पर मक्का उगता था। घाटी में नहरों का एक पूरा जाल हुआ करता था। बारिश की भी एक लय होती थी। मॉनसून के दौरान और अक्सर उसके बाद भी, दोपहर तक बारिश आ जाती थी और कई बार झड़ी में बदल जाती थी, जो कई दिनों तक हल्की और लगातार बरसती रहती थी।
दीवाली तक सर्दियां साफ तौर पर दस्तक दे देती थीं। इतनी ठंड होती थी कि ऊनी बनियान के ऊपर स्वेटर पहनने पड़ते थे। सीलिंग फैन सिर्फ तेज गर्मियों में ही काम आते थे। अब ये पैटर्न टूट चुके हैं। सर्दियां छोटी और धुंधली हो गई हैं। मॉनसून जो कभी भरोसेमंद था, अब अचानक और हिंसक बारिश के रूप में आता है। गर्मियों में तापमान अक्सर 42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और एयर कंडीशनर आम हो चुके हैं।
जैसे-जैसे ऊंची इमारतें, उद्योग और व्यावसायिक ढांचे घाटी में फैलते गए, वैसे-वैसे जंगलों, खेतों और जल स्रोतों पर अतिक्रमण होता गया। इसके नतीजे हर जगह साफ दिखते हैं। बिंदाल नदी को कंक्रीट के तटबंधों ने संकरा कर दिया है और अब उसमें सीवर और औद्योगिक कचरा बहता है। उसके किनारे कूड़े के ढेर लगे हैं। रिस्पना की हालत भी कुछ बेहतर नहीं है। बहुत कम लोग जानते हैं कि रिस्पना पुल का नाम किसी नाले पर नहीं, बल्कि एक नदी पर पड़ा है।
पूरे उत्तराखंड में किसान और पशुपालक लगातार हो रहे बदलावों की बात करते हैं, चाहे वह मौसम का बिगड़ता मिजाज हो, जमीन की गिरती सेहत हो या साल दर साल खेती-किसानी में बढ़ता नुकसान हो। बहरहाल, उनकी हताशा को नजरअंदाज करना मुश्किल है। दिल्ली देहरादून एक्सप्रेसवे के लिए साल के पेड़ों को कटते देखना या मोहंड राव नदी के तल से कंक्रीट के खंभे उठते देखना मुझे एक धीमी हिंसा जैसा लगता है। जंगल में प्लास्टिक कचरा फेंकते लोग भी उतना ही बेचैन करते हैं जितनी बड़ी परियोजनाओं से हो रही तबाही।
असहनीय होती गर्मियों, सूखती नदियों और घटती मिट्टी की उर्वरता के अनुमान इस बेचैनी को और गहरा कर देते हैं। कई बार यह बेबसी एक ऐसी हालत में बदल जाती है, जिसे शायद पर्यावरणीय जड़ता कहा जा सकता है यानी जब बदलाव तेज होता जाता है और इंसान सुन्न हो जाता है और कुछ कर नहीं पाता। जैसे-जैसे आपदाएं बार-बार आने लगी हैं, मैं खुद से यह सवाल करने लगी हूं कि अगली आंधी का इंतजार करते हुए आखिर कब तक मैं यहां रह पाऊंगी।
यह लेख डाउन टू अर्थ, हिंदी मासिक पत्रिका के फरवरी माह अंक में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका की प्रतियां बुक कराने के लिए क्लिक करें


