जलवायु संकट: गर्म होती दुनिया में महिलाओं पर बढ़ रहा घरेलु हिंसा का खतरा

क्या बढ़ता तापमान महिलाओं के खिलाफ हिंसा के खतरे को भी बढ़ा सकता है? उप-सहारा अफ्रीका के 31 देशों में हुए एक नए अध्ययन ने इस सवाल को लेकर चिंता बढ़ा दी हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • गर्म होती दुनिया का असर अब सिर्फ मौसम, पानी और खेती तक सीमित नहीं रह गया है। उप-सहारा अफ्रीका के 31 देशों में हुए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि सामान्य से अधिक गर्म परिस्थितियां महिलाओं के खिलाफ घरेलू और करीबी साथी की हिंसा के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।

  • शोधकर्ताओं ने 2003 से 2024 के बीच किए गए 61 डेमोग्राफिक एंड हेल्थ सर्वे के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जिसमें 15 से 49 वर्ष की महिलाओं से जुड़ी जानकारी शामिल थी।

  • अध्ययन में असामान्य गर्मी और भावनात्मक व शारीरिक हिंसा के बीच संबंध पाया गया, जबकि यौन हिंसा के मामले में ऐसा स्पष्ट संबंध नहीं मिला। शोधकर्ताओं ने जोर दिया कि गर्मी सीधे हिंसा पैदा नहीं करती, बल्कि पहले से मौजूद तनाव और सामाजिक कमजोरियों को बढ़ा सकती है।

  • ग्रामीण क्षेत्रों और कम शिक्षा वाली महिलाओं में यह संबंध अधिक स्पष्ट था।

  • अध्ययन के मुताबिक, शिक्षा, बेहतर आर्थिक स्थिति और महिलाओं का सशक्तीकरण जोखिम कम करने में मदद कर सकते हैं।

  • 2050 के संभावित परिदृश्यों में भी शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक विकास की अहम भूमिका सामने आई है। शोधकर्ताओं ने जलवायु नीतियों में महिलाओं की सुरक्षा, आर्थिक अवसर और हिंसा से बचाव को शामिल करने की जरूरत बताई है।

जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान का असर अब सिर्फ मौसम, खेती और पानी तक सीमित नहीं है। यह समाज के सबसे संवेदनशील हिस्सों, विशेषकर महिलाओं पर भी एक नया संकट बनकर टूट रहा है।

रिसर्च से पता चला है कि जब गर्मी बढ़ती है तो घर के भीतर भी तनाव बढ़ सकता है। लेकिन कुछ महिलाओं के लिए यह सिर्फ पसीने, बेचैनी और नींद उड़ाने वाली गर्म रातों का सवाल नहीं। असामान्य गर्मी उन परिस्थितियों को और मुश्किल बना सकती है, जिनमें वे पहले से ही हिंसा और डर के बीच जी रही हैं।

उप-सहारा अफ्रीका के 31 देशों में महिलाओं पर हुए इस नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि असामान्य रूप से बढ़ता तापमान महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के खतरे को काफी हद तक बढ़ा सकता है। यह संबंध खासकर भावनात्मक और शारीरिक हिंसा के मामलों में देखा गया है। हालांकि, अध्ययन में तापमान और यौन हिंसा के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं मिला।

गर्मी बढ़ी तो घर के भीतर भी बढ़ सकता है हिंसा का खतरा

यह अध्ययन ऑस्ट्रिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है, जिसका नेतृत्व इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस (आईआईएएसए) ने किया है। अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ग्लोबल एनवायर्नमेंटल चेंज में प्रकाशित हुए हैं।

इस स्टडी में शोधकर्ताओं ने 2003 से 2024 के बीच उप-सहारा अफ्रीका के 31 देशों में किए गए 61 डेमोग्राफिक और हेल्थ सर्वे के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। इसमें 15 से 49 वर्ष की आयु की महिलाओं से जुड़ी जानकारी शामिल थी।

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अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि सामान्य से अधिक गर्मी और महिलाओं के खिलाफ उनके करीबी साथी द्वारा की गई हिंसा के बीच कोई संबंध है या नहीं। साथ ही उन्होंने अलग-अलग जलवायु और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में 2050 तक इस जोखिम के संभावित बदलावों का भी आकलन किया।

जिन महिलाओं के पास विकल्प कम, उन पर गर्मी का दबाव ज्यादा

अध्ययन में पाया गया कि जब गर्मी असामान्य रूप से बढ़ती है तो घरेलु और करीबी साथी द्वारा की जाने वाली हिंसा का जोखिम बढ़ सकता है। इसका असर भावनात्मक और शारीरिक हिंसा में अधिक स्पष्ट दिखाई दिया। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इसका मतलब यह नहीं कि गर्मी सीधे हिंसा पैदा करती है।

आईआईएएसए और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता जोनास पेस्कर के मुताबिक, असामान्य गर्म परिस्थितियां रिश्तों में पहले से मौजूद तनाव और हिंसा के जोखिम को बढ़ा सकती है।

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उदाहरण के तौर पर, अगर किसी घर में पहले से पति-पत्नी के बीच तनाव या हिंसा होती है, तो असामान्य गर्मी से चिड़चिड़ापन, तनाव और मुश्किल परिस्थितियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में हिंसा का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसे में उनके अनुसार, जलवायु परिवर्तन को हिंसा का मुख्य कारण नहीं, बल्कि जोखिम बढ़ाने वाले कारक के रूप में समझना चाहिए।

ग्रामीण और कम शिक्षित महिलाओं पर ज्यादा दिखा असर

अध्ययन में कुछ महिला समूहों में यह संबंध अधिक स्पष्ट दिखाई दिया। ग्रामीण इलाकों में रहने वाली और प्राथमिक स्तर या उससे कम शिक्षा वाली महिलाओं में गर्म परिस्थितियों के साथ हिंसा का जोखिम अपेक्षाकृत अधिक पाया गया।

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शोधकर्ताओं का कहना है कि इन महिलाओं के पास हिंसक रिश्तों से बाहर निकलने के लिए आर्थिक संसाधन, सामाजिक सहयोग या दूसरे विकल्प कम हो सकते हैं। हालांकि, अध्ययन यह साबित नहीं करता कि इन्हीं कारणों से इन समूहों पर असर अधिक पड़ा।

यानी बढ़ती गर्मी का खतरा सभी महिलाओं के लिए एक जैसा नहीं है। जिन महिलाओं के पास पहले से ही सीमित संसाधन और कम विकल्प हैं, उनके लिए जलवायु का अतिरिक्त दबाव मुश्किलें और बढ़ा सकता है।

शिक्षा और आर्थिक मजबूती से घट सकता है जोखिम

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा को केवल मौसम के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

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इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण एक-दूसरे से जुड़े हैं। दोनों साथियों की उच्च शिक्षा और बेहतर आर्थिक स्थिति हिंसा के जोखिम को कम कर सकती है। वहीं, साथी का बार-बार शराब पीना हिंसा से जुड़े सबसे मजबूत जोखिम कारकों में शामिल था।

एक और दिलचस्प निष्कर्ष यह रहा कि नौकरी करने वाली महिलाओं ने साथी द्वारा हिंसा की घटनाएं अधिक रिपोर्ट कीं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसकी एक वजह यह हो सकती है कि महिलाओं की बढ़ती आर्थिक स्वतंत्रता के खिलाफ कुछ मामलों में पुरुष साथी की प्रतिक्रिया हिंसा के रूप में सामने आ सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसके दूसरे कारण हो सकते हैं और अध्ययन से किसी एक कारण की पुष्टि नहीं होती।

कैसी होगी 2050 तक तस्वीर?

शोधकर्ताओं ने 2050 के लिए अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संभावित परिदृश्यों का भी अध्ययन किया है। इनका उद्देश्य यह समझना था कि विकास की अलग-अलग राहों का महिलाओं पर क्या असर पड़ सकता है।

जहां शिक्षा का विस्तार और सामाजिक-आर्थिक विकास मजबूत रहता है, वहां हिंसा से प्रभावित महिलाओं के अनुपात में कमी आने की संभावना देखी गई। इसके विपरीत, धीमे विकास और शिक्षा में ठहराव वाले परिदृश्य में यह अनुपात लगभग स्थिर रह सकता है। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है, महिलाओं के अनुपात में कमी के बावजूद प्रभावित महिलाओं की कुल संख्या बढ़ सकती है। इसकी बड़ी वजह बढ़ती आबादी है।

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आईआईएएसए और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता रोमन हॉफमैन के मुताबिक, भविष्य सिर्फ बढ़ते तापमान से तय नहीं होगा। शिक्षा, समावेशी विकास और महिलाओं के सशक्तीकरण में निवेश उनकी कमजोरियों को कम करने में मदद कर सकता है। लेकिन आबादी बढ़ने के कारण प्रभावित महिलाओं की कुल संख्या बढ़ सकती है और उन्हें सुरक्षा और सहायता की जरूरत बनी रह सकती है।

जलवायु नीति में महिलाओं की सुरक्षा भी जरूरी

अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की योजनाओं में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

इससे उबरने के लिए शोधकर्ताओं ने बच्चियों और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने, कम उम्र में विवाह रोकने, महिलाओं के लिए आर्थिक अवसर बढ़ाने और उन्हें अपने जीवन से जुड़े फैसलों में अधिक अधिकार देने जैसे उपायों पर जोर दिया है।

इसके साथ ही पुरुषों और लड़कों को भी इस प्रयास में शामिल करने की जरूरत बताई गई है। शोधकर्ताओं ने पुरुष प्रभुत्व से जुड़ी हानिकारक सोच को चुनौती देने, परिवार में मिलकर फैसले लेने और विवादों को बिना हिंसा के सुलझाने की संस्कृति विकसित करने की जरूरत बताई है।

गर्म होती दुनिया में हर महिला के लिए हिंसा का खतरा बढ़ेगा, यह इस अध्ययन का निष्कर्ष नहीं है। हालांकि, शोध से संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन का बढ़ता दबाव उन सामाजिक कमजोरियों को और गहरा कर सकता है, जो पहले से ही महिलाओं की सुरक्षा को प्रभावित कर रही हैं।

इसलिए जलवायु परिवर्तन से बचाव सिर्फ तापमान कम करने की लड़ाई नहीं है। यह उन लोगों को अधिक सुरक्षित बनाने की भी कोशिश है, जिनके पास इस संकट से बच निकलने के साधन सबसे कम हैं।

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