जलवायु परिवर्तन: धीमी हो रही पृथ्वी की गति, उपग्रह व अंतरिक्ष मिशन हो सकता है प्रभावित

जलवायु परिवर्तन का नया असर: पिघलती बर्फ से धीमी हो रही पृथ्वी की गति, बढ़ रही दिन की लंबाई; वैज्ञानिकों ने 36 लाख वर्षों में सबसे तेज बदलाव का किया खुलासा
ग्लेशियरों और ध्रुवीय बर्फ के तेजी से पिघलने से पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी हो रही है, दिन की लंबाई बढ़ रही।
ग्लेशियरों और ध्रुवीय बर्फ के तेजी से पिघलने से पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी हो रही है, दिन की लंबाई बढ़ रही।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • ग्लेशियरों और ध्रुवीय बर्फ के तेजी से पिघलने से पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी हो रही है, दिन की लंबाई बढ़ रही।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार वर्तमान बदलाव पिछले 36 लाख वर्षों में दर्ज सबसे तेज जलवायु-प्रेरित परिवर्तन माना जा रहा है।

  • बर्फ पिघलने से पानी महासागरों में फैल रहा है, जिससे पृथ्वी पर द्रव्यमान का वितरण बदल रहा है।

  • शोधकर्ताओं ने जीवाश्मों और मशीन लर्निंग तकनीक की मदद से पृथ्वी के प्राचीन घूर्णन बदलावों का अध्ययन किया।

  • विशेषज्ञों का अनुमान है कि सदी के अंत तक जलवायु परिवर्तन का प्रभाव चंद्रमा के प्रभाव से बढ़ सकता।

जलवायु परिवर्तन का असर केवल बढ़ते तापमान, हीटवेव और समुद्र के बढ़ते जलस्तर तक सीमित नहीं है। अब वैज्ञानिकों ने एक और बड़े प्रभाव का पता लगाया है। नए शोध के अनुसार, ग्लेशियरों और ध्रुवीय बर्फ की चादरों के तेजी से पिघलने के कारण पृथ्वी की घूमने की गति धीरे-धीरे कम हो रही है। इससे दिन की लंबाई भी बढ़ रही है।

ऑस्ट्रिया के यूनिवर्सिटी ऑफ वियना और स्विट्जरलैंड के ईटीएच ज्यूरिख के वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान समय में दिन की लंबाई प्रति शताब्दी लगभग 1.33 मिलीसेकंड बढ़ रही है। यह बदलाव बहुत छोटा दिखाई देता है, लेकिन वैज्ञानिक नजरिए से इसका महत्व काफी बड़ा है।

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कैसे प्रभावित होती है पृथ्वी की गति?

जब ध्रुवों पर मौजूद बर्फ पिघलती है, तो उसका पानी समुद्रों में फैल जाता है। इससे पृथ्वी पर द्रव्यमान का वितरण बदल जाता है। पहले अधिक वजन ध्रुवों के पास था, लेकिन बर्फ पिघलने के बाद यह पानी पृथ्वी के अन्य हिस्सों में फैल जाता है।

वैज्ञानिक इसकी तुलना एक घूमते हुए स्केटर से करते हैं। जब स्केटर अपने हाथ शरीर के पास रखता है तो वह तेजी से घूमता है। लेकिन जब वह हाथ फैलाता है तो उसकी गति कम हो जाती है। इसी तरह पृथ्वी पर द्रव्यमान के फैलने से उसकी घूर्णन गति थोड़ी धीमी हो जाती है।

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36 लाख वर्षों में सबसे तेज बदलाव

जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: सॉलिड अर्थ में प्रकाशित शोध में सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि आज जो बदलाव देखा जा रहा है, वह पिछले 36 लाख वर्षों में सबसे तेज माना जा रहा है। वैज्ञानिकों ने समुद्र की गहराई में रहने वाले सूक्ष्म जीवों, जिन्हें बेंथिक फोरामिनिफेरा कहा जाता है, के जीवाश्मों का अध्ययन किया। इन जीवाश्मों से पुराने समुद्री स्तर और जलवायु की जानकारी मिली।

आधुनिक मशीन लर्निंग तकनीक की मदद से वैज्ञानिकों ने यह अनुमान लगाया कि अतीत में पृथ्वी के दिन की लंबाई में कितने बदलाव हुए थे। अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 2000 से 2020 के बीच दिन की लंबाई बढ़ने की दर पिछले 36 लाख वर्षों में किसी भी जलवायु-प्रेरित बदलाव से अधिक है।

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चंद्रमा भी करता है असर

वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी की घूर्णन गति पर सबसे बड़ी लंबी अवधि का प्रभाव चंद्रमा का होता है। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी पर ज्वार-भाटा पैदा करता है और धीरे-धीरे पृथ्वी की गति को कम करता है। इसी कारण लाखों वर्षों से दिन की लंबाई बढ़ती रही है।

हालांकि नए अध्ययन का कहना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा और बर्फ तेजी से पिघलती रही, तो इस सदी के अंत तक जलवायु परिवर्तन का प्रभाव चंद्रमा के प्रभाव के बराबर या उससे अधिक हो सकता है।

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फिर पृथ्वी के सबसे छोटे दिन क्यों दर्ज हुए?

हाल के वर्षों में कई खबरें आईं कि पृथ्वी ने अपने इतिहास के कुछ सबसे छोटे दिन दर्ज किए हैं। इससे लोगों के मन में सवाल उठ सकता है कि यदि पृथ्वी की गति धीमी हो रही है तो छोटे दिन कैसे रिकॉर्ड हुए?

वैज्ञानिक बताते हैं कि पृथ्वी की घूर्णन गति पर कई अन्य कारक भी असर डालते हैं। पृथ्वी के तरल बाहरी कोर की गतिविधियां, वायुमंडलीय बदलाव, समुद्री धाराएं और भूकंपीय घटनाएं कभी-कभी पृथ्वी को थोड़ा तेज या धीमा घुमा सकती हैं। ये अल्पकालिक परिवर्तन होते हैं, जबकि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव लंबे समय तक धीरे-धीरे दिखाई देता है।

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विज्ञान और तकनीक के लिए महत्वपूर्ण

दिन की लंबाई में मिलीसेकंड स्तर का बदलाव आम लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित नहीं करता। लेकिन आधुनिक तकनीक के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है। उपग्रह नेविगेशन, अंतरिक्ष मिशन, संचार प्रणाली और वैश्विक समय मापन प्रणालियों को पृथ्वी की सटीक घूर्णन गति की जानकारी चाहिए होती है।

यदि इन सूक्ष्म बदलावों को ध्यान में नहीं रखा जाए, तो भविष्य में तकनीकी प्रणालियों की सटीकता प्रभावित हो सकती है।

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चेतावनी का एक और संकेत

यह शोध दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन केवल मौसम या तापमान का मुद्दा नहीं है। इसका प्रभाव पृथ्वी की मूल भौतिक प्रक्रियाओं तक पहुंच चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी की घूमने की गति में आ रहा यह बदलाव मानव गतिविधियों से बढ़ रहे वैश्विक तापमान का एक और स्पष्ट संकेत है।

इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना और जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण पाना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।

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