शोधकर्ताओं ने स्थानीय मान्यताओं को समझते हुए वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने और असामान्य मुठभेड़ों के बाद तुरंत जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई। फोटो साभार: आईस्टॉक
वन्य जीव एवं जैव विविधता

पुरुलिया में धारीदार लकड़बग्घे पर अध्ययन: कम दिखने से पहचान घटी, लोककथाओं व मान्यताओं ने बढ़ाया भ्रम

दुर्लभ दिखने वाला स्ट्राइप्ड हाइना ग्रामीणों के लिए बना रहस्य, वैज्ञानिक जानकारी की कमी से लोककथाओं और पुरानी मान्यताओं ने बनाई अलग पहचान

Dayanidhi

  • पुरुलिया में 104 लोगों पर अध्ययन से पता चला, स्ट्राइप्ड हाइना की कम दृश्यता ने उसकी सही पहचान और समझ को प्रभावित किया।

  • केवल 39 प्रतिशत ग्रामीण स्ट्राइप्ड हाइना को पहचान सके, जबकि गोल्डन जैकल और बंगाल फॉक्स की पहचान लोगों में ज्यादा बेहतर रही।

  • गाढ़ा और कुइया नामों से हाइना की दो अलग सांस्कृतिक पहचान सामने आईं, जिनमें एक वैज्ञानिक जानकारी से अधिक मेल खाती है।

  • हाइना के शव खाने को लेकर ग्रामीणों की सोच मिली-जुली रही, गांवों के पास इसका व्यवहार डर और चिंता बढ़ाता है।

  • शोधकर्ताओं ने स्थानीय मान्यताओं को समझते हुए वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने और असामान्य मुठभेड़ों के बाद तुरंत जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई।

जंगल और वन्यजीवों के करीब रहने वाले लोगों को वहां रहने वाले जानवरों के बारे में अच्छी जानकारी होती है, यह बात आम तौर पर मानी जाती है। लेकिन एक नए अध्ययन ने इस धारणा पर सवाल उठाया है। अध्ययन के अनुसार, किसी जानवर के बारे में लोगों की जानकारी इस बात पर काफी निर्भर करती है कि वे उसे कितनी बार देख और समझ पाते हैं।

स्ट्राइप्ड हाइना यानी धारीदार लकड़बग्घा इसका अच्छा उदाहरण है। यह जानवर रात में सक्रिय रहता है, अकेले घूमता है और बहुत छिपकर रहता है। इसलिए ग्रामीणों को इसे देखने के मौके कम मिलते हैं। ऐसे में इसके बारे में सही जानकारी की जगह कई बार लोककथाएं, सुनी-सुनाई बातें और पुरानी मान्यताएं जगह बना लेती हैं।

यह अध्ययन ह्यूमन एंड एनवायरनमेंट अलायंस लीग, द यूनिवर्सिटी ऑफ ट्रांस-डिसिप्लिनरी हेल्थ साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी और नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज के शोधकर्ताओं ने किया है। यह अध्ययन ओरिक्स नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

104 लोगों से की गई बातचीत

शोधकर्ताओं ने पुरुलिया के दो ब्लॉकों में 104 लोगों के साथ बातचीत की। उन्हें पांच मांसाहारी जानवरों की तस्वीरें दिखाई गईं। इनमें तेंदुआ, गोल्डन जैकल, बंगाल फॉक्स, इंडियन ग्रे वुल्फ और स्ट्राइप्ड हाइना शामिल थे।

लोगों से पूछा गया कि वे इन जानवरों को पहचानते हैं या नहीं। साथ ही उनके रूप, भोजन, रहने की जगह और व्यवहार के बारे में भी जानकारी ली गई। इसके अलावा स्ट्राइप्ड हाइना से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं और सांस्कृतिक धारणाओं पर भी विस्तार से बातचीत की गई।

अध्ययन में पाया गया कि ज्यादातर लोग तेंदुए, गोल्डन जैकल और बंगाल फॉक्स को आसानी से पहचान लेते थे। लेकिन स्ट्राइप्ड हाइना को केवल 39 प्रतिशत लोग ही सही पहचान सके।

कम दिखाई देने वाला जानवर बना रहस्य

शोधकर्ताओं के अनुसार, गोल्डन जैकल और बंगाल फॉक्स लोगों को ज्यादा दिखाई देते हैं। ये कई बार गांवों के आसपास घूमते हैं और मुर्गियों या दूसरे घरेलू जानवरों के संपर्क में भी आते हैं। इसलिए ग्रामीण इनके व्यवहार को बार-बार देख पाते हैं।

इसके विपरीत स्ट्राइप्ड हाइना रात में निकलता है और आम तौर पर अकेला रहता है। वह इंसानी बस्तियों से दूर रहने की कोशिश करता है। इसलिए लोगों के पास उसके व्यवहार को सीधे देखने के बहुत कम मौके होते हैं।

यही वजह है कि उसके बारे में कई तरह की धारणाएं बन गई हैं। 104 लोगों में से 28 लोग जानवर को कोई नाम नहीं दे सके और उन्होंने कहा कि उन्होंने इसे स्थानीय स्तर पर कभी नहीं देखा। 25 लोगों ने इसे किसी दूसरे जानवर के रूप में पहचाना।

‘गाढ़ा’ और ‘कुइया’ की अलग पहचान

जिन लोगों ने जानवर को पहचाना, उनमें दो नाम सामने आए -‘गाढ़ा’ और ‘कुइया’। 33 लोगों ने इसे गाढ़ा कहा, जबकि 11 लोगों ने कुइया नाम का इस्तेमाल किया। गाढ़ा के बारे में बताई गई बातें स्ट्राइप्ड हाइना के वास्तविक व्यवहार से काफी हद तक मेल खाती थीं। लोगों ने इसे रात में सक्रिय, जंगल में रहने वाला और अकेले या जोड़े में घूमने वाला जानवर बताया। इसे मरे हुए जानवर खाने वाला जीव भी माना गया।

लेकिन कुइया की कहानी बिल्कुल अलग थी। इसे बेहद ताकतवर और खतरनाक जानवर बताया गया। कुछ लोगों का मानना था कि यह झुंड में शिकार करता है, इंसानों और बड़े पशुओं पर हमला कर सकता है और यहां तक कि हाथी को भी हरा सकता है। इनमें से कई बातें वैज्ञानिक रूप से सही नहीं हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, इन मान्यताओं का बड़ा हिस्सा लोगों ने बुजुर्गों, पड़ोसियों और पुरानी कहानियों से सुना था।

शव खाने वाले जानवर को लेकर मिली-जुली सोच

स्ट्राइप्ड हाइना को मृत जानवरों का शव खाने वाले जीव के रूप में काफी लोग पहचानते थे। जब यह गांव से दूर पड़े पशुओं के शव खाता था, तो कुछ लोग इसे उपयोगी मानते थे। उनका मानना था कि इससे सड़ने वाले शव हट जाते हैं और गंदगी कम होती है।

लेकिन गांव के पास यही व्यवहार लोगों को पसंद नहीं आता था। कुछ लोगों का मानना था कि सड़ा हुआ मांस खाने से जानवर आक्रामक या ‘पागल’ हो सकता है।

सबसे ज्यादा चिंता उन कहानियों को लेकर थी, जिनमें हाइना के कब्र खोदकर मानव शव खाने की बात कही गई। कुछ परिवारों में अंतिम संस्कार के बजाय नदी किनारे दफनाने की परंपरा होने के कारण ऐसी घटनाओं को लेकर डर और धार्मिक चिंताएं भी सामने आईं।

संरक्षण के लिए नई सोच की जरूरत

शोधकर्ताओं का कहना है कि वन्यजीव संरक्षण केवल मुआवजा देने या पशुओं को बचाने के उपायों तक सीमित नहीं होना चाहिए। ऐसे जानवरों के मामले में डर, गलत पहचान और पुरानी मान्यताएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इसलिए स्थानीय लोगों की बात सुने बिना उनकी मान्यताओं को खारिज करना सही नहीं होगा। साथ ही गलत जानकारी को भी बिना जांचे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि स्थानीय भाषा में ऑडियो-वीडियो माध्यमों से लोगों को स्ट्राइप्ड हाइना के वास्तविक व्यवहार और उसके पर्यावरणीय महत्व के बारे में जानकारी दी जाए।

खासकर किसी असामान्य मुठभेड़ के बाद सही जानकारी तुरंत पहुंचाना जरूरी है, ताकि एक दुर्लभ घटना डर और अफवाह का रूप न ले ले। अध्ययन का संदेश साफ है-वन्यजीवों के साथ बेहतर सह-अस्तित्व के लिए लोगों के अनुभवों को समझना और सही वैज्ञानिक जानकारी देना, दोनों जरूरी हैं।