देश में 1.47 लाख एमडीआर-टीबी मामले दर्ज हुए, वैश्विक दवा प्रतिरोधी टीबी के बोझ में भारत की बड़ी हिस्सेदारी रही। फोटो साभार: आईस्टॉक
स्वास्थ्य

दुनिया में हर चार एमडीआर-टीबी मरीजों में से एक भारत में: अध्ययन

टीबी के खिलाफ लड़ाई में भारत की प्रगति जारी, लेकिन एमडीआर-टीबी का खतरा बरकरार; विशेषज्ञों ने तेज प्रयासों की जरूरत बताई।

Dayanidhi

  • भारत में 2023 में 22.2 लाख नए टीबी मरीज मिले, जो दुनिया के किसी भी देश में सबसे अधिक संख्या है।

  • देश में 1.47 लाख एमडीआर-टीबी मामले दर्ज हुए, वैश्विक दवा प्रतिरोधी टीबी के बोझ में भारत की बड़ी हिस्सेदारी रही।

  • रिपोर्ट के अनुसार, धूम्रपान, शराब और बढ़े ब्लड शुगर को नियंत्रित कर टीबी से हजारों जानें बचाई जा सकती थीं।

  • भारत में टीबी मामलों में गिरावट जारी, 2015 से 2024 के बीच बीमारी की दर में 21 प्रतिशत कमी दर्ज हुई।

  • एआई आधारित एक्स-रे और आधुनिक जांच तकनीकों से भारत में टीबी मरीजों की जल्दी पहचान और इलाज में मदद मिल रही है।

भारत में तपेदिक (टीबी) का संकट अभी भी गंभीर बना हुआ है। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, साल 2023 में भारत में करीब 22.2 लाख नए टीबी मरीज सामने आए, जो दुनिया के किसी भी देश से सबसे अधिक हैं। यह अध्ययन द लैंसेट इंफेक्शियस डिजीजेज जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक दशक में दुनिया में टीबी के मामलों और इससे होने वाली मौतों में कमी आई है, लेकिन यह सुधार सभी देशों में समान नहीं है। खासतौर पर दवाओं का असर खत्म हो जाने वाली टीबी यानी मल्टीड्रग-रेसिस्टेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

1.47 लाख मरीजों में मिली दवा प्रतिरोधी टीबी

अध्ययन के मुताबिक, भारत में 2023 में करीब 1.47 लाख मल्टीड्रग-रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (एमडीआर-टीबी) के मामले दर्ज किए गए। यह दुनिया के कुल एमडीआर-टीबी मामलों का लगभग 25 प्रतिशत है।

रिपोर्ट के अनुसार, जिन लोगों में पहली बार टीबी की पहचान हुई, उनमें 3.2 प्रतिशत मरीज एमडीआर-टीबी से पीड़ित थे। वहीं, पहले टीबी का इलाज करा चुके मरीजों में यह दर बढ़कर करीब 16 प्रतिशत रही। एमडीआर-टीबी में बीमारी पर टीबी की प्रमुख शुरुआती दवाओं का असर नहीं होता। ऐसे मरीजों का इलाज अधिक कठिन होता है और उन्हें लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ती हैं।

204 देशों में किया गया अध्ययन

शोधकर्ताओं ने ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) अध्ययन 2023 के आंकड़ों के आधार पर 1990 से 2023 तक 204 देशों और क्षेत्रों में टीबी की स्थिति का विश्लेषण किया।

अध्ययन में एचआईवी से संक्रमित और बिना एचआईवी वाले दोनों तरह के लोगों को शामिल किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार, एचआईवी संक्रमण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देता है, जिससे टीबी होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

रिपोर्ट में बताया गया कि दुनिया में कुल टीबी मामलों में एमडीआर-टीबी की हिस्सेदारी भले ही करीब 5 प्रतिशत है, लेकिन बीमारी से होने वाले कुल स्वास्थ्य नुकसान में इसका योगदान सात प्रतिशत है।

धूम्रपान और शराब पर नियंत्रण से बच सकती थीं लाखों जानें

शोधकर्ताओं ने टीबी बढ़ाने वाले खतरों का भी अध्ययन किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर धूम्रपान, शराब का अधिक सेवन और बढ़े हुए रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) जैसे कारणों को नियंत्रित किया जाए तो टीबी से होने वाली मौतों को काफी कम किया जा सकता है।

अध्ययन के अनुसार, इन खतरों को कम करने से साल 2023 में दुनिया भर में टीबी से होने वाली मौतें 12.2 लाख से घटकर 7.68 लाख तक आ सकती थीं। इससे करीब 4.5 लाख लोगों की जान बचाई जा सकती थी। एमडीआर-टीबी से होने वाली लगभग 25 हजार मौतों को भी रोका जा सकता था।

भारत में तेजी से घट रहे टीबी के मामले

भारत में टीबी के मामले सबसे ज्यादा है, लेकिन सरकार की कोशिशों से स्थिति में सुधार भी देखा जा रहा है। राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के तहत सरकार ने वर्ष 2025 तक देश को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा था।

हालांकि यह लक्ष्य तय समय में हासिल नहीं हो पाया, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में टीबी के मामलों में लगातार कमी आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 से 2024 के बीच भारत में टीबी के मामलों में करीब 21 प्रतिशत की गिरावट आई। इसी दौरान टीबी से होने वाली मौतों की दर भी प्रति लाख आबादी पर 28 से घटकर 21 रह गई।

एआई और मोबाइल जांच से बढ़ी पहचान की क्षमता

टीबी की जल्दी पहचान के लिए भारत में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। सरकार ने मोबाइल निक्षय वैन के जरिए एआई आधारित पोर्टेबल छाती एक्स-रे मशीन और ट्रूनाट जांच मशीनों को दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचाया है।

इन तकनीकों की मदद से ऐसे मरीजों की पहचान भी हो रही है, जिनमें बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते। विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी को रोकने के लिए समय पर जांच और सही इलाज सबसे जरूरी है।

दिल्ली में एचआईवी और टीबी के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों के अनुसार, एआरटी केंद्रों पर लगाए गए छाती एक्स-रे जांच शिविरों में कई ऐसे टीबी मरीज मिले, जिनकी पहचान सामान्य लक्षणों की जांच से नहीं हो पाती।

टीबी खत्म करने के लिए लगातार प्रयास जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी के खिलाफ लड़ाई में भारत ने महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। बीमारी को पूरी तरह खत्म करने के लिए बेहतर जांच व्यवस्था, समय पर इलाज, जागरूकता और बचाव के उपायों को लगातार मजबूत करना होगा।