अध्ययन के अनुसार दुनिया के सबसे अधिक उपभोग करने वाले 10 फीसदी लोग हर साल पर्यावरण को 1.7 से 5.7 ट्रिलियन डॉलर तक नुकसान पहुंचा रहे हैं।
अध्ययन में जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता हानि, पोषक तत्व प्रदूषण और मीठे पानी के अत्यधिक उपयोग से होने वाले नुकसान का आकलन किया गया।
कुल पर्यावरणीय नुकसान में सबसे बड़ा योगदान जैव विविधता हानि का है, जबकि इसके बाद जलवायु परिवर्तन दूसरा प्रमुख कारण माना गया।
शोधकर्ताओं का कहना है कि 'प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे' सिद्धांत अपनाकर पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ी मात्रा में संसाधन जुटाए जा सकते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार केवल आर्थिक उपाय पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि पर्यावरणीय नुकसान रोकने के लिए सख्त नियम और जिम्मेदार उपभोग भी जरूरी हैं।
दुनिया के सबसे अधिक उपभोग करने वाले 10 प्रतिशत लोग हर साल पर्यावरण को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, इस नुकसान की आर्थिक कीमत 1.7 ट्रिलियन डॉलर से 5.7 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष के बीच हो सकती है। यह राशि दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता संरक्षण के लिए किए गए अंतरराष्ट्रीय खर्च से कई गुना अधिक है।
यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका कम्युनिकेशन्स सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित हुआ है। इसमें बताया गया है कि कुछ लोगों की अधिक खपत का असर पूरी दुनिया के पर्यावरण पर पड़ रहा है।
चार बड़े पर्यावरणीय संकटों का आकलन
शोधकर्ताओं ने चार प्रमुख पर्यावरणीय समस्याओं को आधार बनाकर नुकसान का अनुमान लगाया। इनमें जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस से होने वाला प्रदूषण तथा मीठे पानी का अत्यधिक उपयोग शामिल हैं।
अध्ययन के अनुसार, इन चार क्षेत्रों में सबसे अधिक नुकसान जैव विविधता को हो रहा है। कुल नुकसान का लगभग आधा हिस्सा इसी से जुड़ा है। इसके बाद जलवायु परिवर्तन का स्थान आता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन दोनों समस्याओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि साथ मिलकर हल करने की जरूरत है।
प्रति व्यक्ति नुकसान कितना?
अध्ययन के अनुसार, दुनिया के सबसे अधिक उपभोग करने वाले 10 प्रतिशत लोगों में शामिल एक व्यक्ति औसतन हर साल 2,300 डॉलर से 7,500 डॉलर तक के पर्यावरणीय नुकसान का कारण बनता है।
अमेरिका में यह आंकड़ा और भी अधिक है। वहां एक व्यक्ति से होने वाला अनुमानित नुकसान 19,000 डॉलर से 63,000 डॉलर सालाना तक हो सकता है। यह उसकी वार्षिक आय का लगभग 6 से 20 प्रतिशत और कुल संपत्ति का 0.8 से 3 प्रतिशत तक माना गया है।
शोध में यह भी बताया गया है कि दुनिया के इस शीर्ष 10 प्रतिशत समूह के 60 प्रतिशत से अधिक लोग अमेरिका और यूरोपीय संघ में रहते हैं।
नुकसान का अनुमान अभी भी कम हो सकता है
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अनुमान पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। उन्होंने केवल चार पर्यावरणीय सीमाओं को शामिल किया है, जबकि पृथ्वी से जुड़ी कुल नौ महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सीमाएं मानी जाती हैं।
इसके अलावा, अध्ययन में केवल लोगों के सीधे उपभोग को शामिल किया गया है। बड़े निवेशों, कंपनियों में हिस्सेदारी और अन्य वित्तीय गतिविधियों से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव इसमें शामिल नहीं हैं। इसलिए वास्तविक नुकसान इससे भी अधिक हो सकता है।
'प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे' सिद्धांत
अध्ययन में कहा गया है कि यदि "प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे" यानी पोल्यूटर पेज सिद्धांत को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो इससे बड़ी मात्रा में धन जुटाया जा सकता है। इस धन का उपयोग जलवायु परिवर्तन से निपटने, जैव विविधता बचाने और पर्यावरण संरक्षण की अन्य योजनाओं में किया जा सकता है।
हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल टैक्स लगाना ही समाधान नहीं है। पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए सख्त कानून, बेहतर नीतियां और जिम्मेदार उपभोग भी जरूरी हैं।
अमीर और प्रभावशाली लोगों की बड़ी भूमिका
शोध में कहा गया है कि सबसे अधिक उपभोग करने वाले लोग केवल अधिक प्रदूषण ही नहीं करते, बल्कि उनके पास बदलाव लाने की सबसे अधिक क्षमता भी होती है। वे जिन उद्योगों में निवेश करते हैं, जिन कंपनियों का संचालन करते हैं और जिस तरह की जीवनशैली अपनाते हैं, उसका असर समाज के बाकी लोगों पर भी पड़ता है।
उनके अनुसार, यदि यही समूह अपने निवेश और उपभोग के तरीके बदल दे, तो पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव काफी कम किया जा सकता है।
प्रकृति की कीमत पैसे से नहीं लगाई जा सकती
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि प्रकृति का वास्तविक मूल्य किसी भी कीमत से कहीं अधिक है। इसलिए पर्यावरण को केवल पैसों में नहीं आंका जा सकता। फिर भी आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाने से यह समझने में मदद मिलती है कि पर्यावरण को कितना बड़ा नुकसान पहुंच रहा है और इसकी जिम्मेदारी किन लोगों पर सबसे अधिक है।
उन्होंने कहा कि सबसे जरूरी बात यह है कि नुकसान होने के बाद उसकी भरपाई करने के बजाय पहले ही उसे रोका जाए।
यह अध्ययन बताता है कि दुनिया में पर्यावरणीय नुकसान सभी लोग समान रूप से नहीं पहुंचा रहे हैं। अधिक उपभोग करने वाला छोटा-सा वर्ग सबसे बड़ा प्रभाव डाल रहा है। इसलिए जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए केवल आम लोगों के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे।
अधिक संसाधनों का उपयोग करने वाले लोगों, बड़ी कंपनियों और नीति-निर्माताओं को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। तभी पर्यावरण संरक्षण के साथ टिकाऊ विकास का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा।