ऑक्सफैम रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की शुरुआत में दुनिया के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों ने महज 10 दिनों में अपना सालभर का कार्बन बजट खत्म कर दिया है। यह असमानता जलवायु संकट को बढ़ा रही है, जिससे गरीब और कमजोर देशों को भारी नुकसान हो रहा है।
इस नए विश्लेषण के मुताबिक हालात और भी ज्यादा चौंकाने वाले हैं, सबसे समृद्ध 0.1 फीसदी लोग तो 3 जनवरी तक ही अपनी पूरी कार्बन सीमा पार कर चुके थे। ऑक्सफैम ने इस दिन को ‘पॉल्यूटोक्रैट डे' नाम दिया है।
एक औसत अरबपति अपने निवेशों के जरिए हर साल करीब 19 लाख टन कार्बन उत्सर्जित करता है, जो एक आम आदमी के उत्सर्जन से करीब 3.46 लाख गुणा अधिक है।
1990 से अब तक देखें तो दुनिया के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों ने जितना कार्बन बजट खर्च किया है, वह धरती की आधी गरीब आबादी के मुकाबले 100 गुणा और सबसे गरीब 10 फीसदी लोगों के मुकाबले 300 गुणा अधिक है।
ऑक्सफैम ने आगाह किया है कि अगर दुनिया को जलवायु तबाही से बचाना है, तो सबसे अमीर एक फीसदी लोगों को 2030 तक अपने उत्सर्जन में 97 प्रतिशत की कटौती करनी होगी।
साल 2026 शुरू हुए अभी महज 12 दिन ही हुए हैं, हालांकि ऑक्सफैम के मुताबिक दुनिया के सबसे समृद्ध एक फीसदी लोगों ने महज 10 दिनों में ही अपना सालभर का कार्बन बजट खत्म कर दिया है। मतलब कि कहीं न कहीं दुनिया के सबसे सुपर-रिच लोगों ने 2026 की शुरुआत से ही धरती पर बोझ डालना शुरू कर दिया है।
गौरतलब है कि कार्बन बजट वह सीमा है जिसके भीतर रहकर तापमान में हो रही वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर रखा जा सकता है।
ऑक्सफैम द्वारा जारी इस नए विश्लेषण के मुताबिक हालात और भी ज्यादा चौंकाने वाले हैं, सबसे समृद्ध 0.1 फीसदी लोग तो 3 जनवरी तक ही अपनी पूरी कार्बन सीमा पार कर चुके थे। ऑक्सफैम ने इस दिन को ‘पॉल्यूटोक्रैट डे' नाम दिया है, यानी वह दिन जब अमीरों का प्रदूषण बाकी दुनिया के हिस्से का भविष्य छीन लेता है। यह दिखाता है कि जलवायु संकट को बढ़ाने में सबसे अमीर लोगों की जिम्मेदारी असमान रूप से कहीं ज्यादा है।
ऑक्सफैम की एक अन्य रिपोर्ट “क्लाइमेट प्लंडर: हाउ अ पावरफुल फ्यू आर लॉकिंग द वर्ल्ड इंटू डिजास्टर” के मुताबिक दुनिया के सबसे अमीर 0.1 फीसदी लोग एक दिन में उतना कार्बन प्रदूषण कर रहे हैं, जितनी दुनिया की गरीब आधी आबादी पूरे साल भर में करती है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो एक औसत अमीर व्यक्ति हर दिन 800 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) उत्सर्जित कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ एक गरीब हर दिन महज दो किलोग्राम सीओ₂ उत्सर्जित करता है।
इसी तरह एक औसत अरबपति अपने निवेशों के जरिए हर साल करीब 19 लाख टन कार्बन उत्सर्जित करता है, जो एक आम आदमी के उत्सर्जन से करीब 3.46 लाख गुणा अधिक है।
1990 से अब तक देखें तो दुनिया के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों ने जितना कार्बन बजट खर्च किया है, वह धरती की आधी गरीब आबादी के मुकाबले 100 गुणा और सबसे गरीब 10 फीसदी लोगों के मुकाबले 300 गुणा अधिक है।
साल भर का उत्सर्जन, लाखों मौतों की वजह
नई रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि दुनिया के सबसे समृद्ध एक फीसदी लोगों का महज एक साल का उत्सर्जन, सदी के अंत तक करीब 13 लाख लोगों की गर्मी से होने वाली मौतों की वजह बनेगा। इतना ही नहीं दशकों से जारी अमीरों की भारी कार्बन खपत ने कमजोर और निम्न-मध्यम आय वाले देशों को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया है।
अनुमान है कि 2050 तक यह नुकसान 44 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
उत्सर्जन में 97 फीसदी की कटौती जरूरी
ऑक्सफैम ने आगाह किया है कि अगर दुनिया को जलवायु तबाही से बचाना है, तो सबसे अमीर एक फीसदी लोगों को 2030 तक अपने उत्सर्जन में 97 प्रतिशत की कटौती करनी होगी। लेकिन विडंबना यह है कि जलवायु संकट के लिए सबसे कम जिम्मेदार लोग—कमजोर और जलवायु-संवेदनशील देशों के समुदाय, वन वास, महिलाएं और बच्चियां इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतेंगी।
ऑक्सफैम की क्लाइमेट पॉलिसी लीड नाफकोटे डाबी का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “शोध बार-बार यही दर्शाते हैं कि सरकारों के पास उत्सर्जन घटाने और असमानता से निपटने का एक आसान स्पष्ट रास्ता है, और यह रास्ता है सबसे बड़े प्रदूषकों को निशाने पर लेना।"
उनके मुताबिक अगर सरकारें सुपर-रिच के बेलगाम कार्बन उत्सर्जन पर लगाम लगाएं, तो दुनिया को जलवायु लक्ष्यों की राह पर वापस लाया जा सकता है।
अमीरों की जीवनशैली ही नहीं, निवेश भी बन रहा संकट
सुपर-रिच सिर्फ अपनी ऐशो-आराम भरी जीवनशैली से ही नहीं, बल्कि प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में निवेश करके भी जलवायु संकट को गहरा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, हर अरबपति का निवेश ऐसी कंपनियों में है जो औसतन सालाना करीब 19 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित कर रही हैं। इससे दुनिया और गहरे जलवायु भंवर में फंसती जा रही हैं।
ऑक्सफैम के अनुसार दुनिया के ये सबसे समृद्ध लोग और बड़ी कंपनियां सिर्फ प्रदूषण ही नहीं फैला रही, बल्कि नीति-निर्माण पर भी असमान प्रभाव डालती हैं। उदाहरण के लिए हाल ही में ब्राजील में हुई कॉप जलवायु वार्ता में फॉसिल फ्यूल कंपनियों के 1,600 लॉबिस्ट मौजूद थे, जो मेजबान देश को छोड़कर किसी भी देश के प्रतिनिधिमंडल से ज्यादा थे।
डाबी कहती हैं, “सुपर-रिच और बड़ी कंपनियों की अपार ताकत उन्हें नीतियों को अपने पक्ष में मोड़ने और जलवायु वार्ताओं को कमजोर करने का मौका देती है।“
ऐसे में ऑक्सफैम ने सरकारों से अपील की है कि वे सुपर-रिच के उत्सर्जन पर लगाम लगाएं और अमीर प्रदूषकों से उसकी कीमत वसूलें। इसके लिए संगठन ने कुछ ठोस कदम सुझाए हैं जैसे बेहद समृद्ध लोगों की आय और संपत्ति पर कर बढ़ाए जाएं, और संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय कर सहयोग सम्मेलन की वार्ताओं में सक्रिय भूमिका निभाकर एक ज्यादा न्यायपूर्ण वैश्विक कर व्यवस्था बनाई जाए।
फॉसिल फ्यूल कंपनियों के मुनाफे पर लगना चाहिए अतिरिक्त कर
रिपोर्ट ने जोर दिया है कि फॉसिल फ्यूल कंपनियों के मुनाफे पर अतिरिक्त कर लगाया जाना चाहिए। ऑक्सफैम के मुताबिक, तेल, गैस और कोयले के व्यापार से जुड़ी 585 कंपनियों पर ‘रिच पॉल्यूटर प्रॉफिट टैक्स’ लगाने से पहले ही साल में 40,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक जुटाए जा सकते हैं, जो ग्लोबल साउथ में हो रहे जलवायु नुकसान के बराबर है।
इसके साथ ही रिपोर्ट में प्राइवेट जेट और सुपर-यॉट जैसे लग्जरी साधनों पर प्रतिबंध या भारी कर की भी मांग की गई है।
आपको जानकार हैरानी होगी कि यदि बेहद अमीर व्यक्ति महज एक हफ्ते भी निजी जेट और लग्जरी यॉट की ऐसी ऐशो-आराम भरी यात्रा करे तो उसका कार्बन फुटप्रिंट दुनिया के सबसे गरीब व्यक्ति के पूरे जीवन भर के कार्बन उत्सर्जन के बराबर हो जाता है।
यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि जलवायु संकट कोई प्राकृतिक दुर्घटना नहीं, बल्कि कुछ बेहद समृद्ध लोगों की बेलगाम जीवनशैली, निवेश और नीतिगत दबदबे का नतीजा है।
जब तक दुनिया सबसे बड़े प्रदूषकों को जवाबदेह नहीं ठहराती और मुनाफे के बजाय लोगों और प्रकृति को केंद्र में रखने वाली आर्थिक व्यवस्था की ओर नहीं बढ़ती, तब तक जलवायु न्याय सिर्फ एक नारा बना रहेगा और उसकी कीमत सबसे गरीब और कमजोर तबके को चुकानी पड़ेगी।