ज्वालामुखी की राख और समुद्री नमक ने सूरज की रोशनी में मीथेन टूटने की प्राकृतिक प्रक्रिया को तेज किया। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

रोजाना 900 मेगाग्राम मीथेन हुई खत्म, ज्वालामुखी के धुएं ने हवा से मीथेन घटाने का दिखाया अनोखा तरीका

ज्वालामुखी की राख और समुद्री नमक ने सूरज की रोशनी में मीथेन तोड़ने की प्राकृतिक प्रक्रिया को तेज किया, वैज्ञानिकों को मिला नया संकेत।

Dayanidhi

  • ज्वालामुखी की राख और समुद्री नमक ने सूरज की रोशनी में मीथेन टूटने की प्राकृतिक प्रक्रिया को तेज किया।

  • हंगा टोंगा विस्फोट के बाद उपग्रहों ने वातावरण में फॉर्मल्डिहाइड की असामान्य मात्रा का पता लगाया।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रक्रिया से बादल ने रोजाना करीब 900 मेगाग्राम मीथेन खत्म किया।

  • शोध में पता चला कि प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रियाएं वातावरण से मीथेन हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

  • वैज्ञानिक अब जांच रहे हैं कि इस प्राकृतिक प्रक्रिया को सुरक्षित तरीके से दोहराकर मीथेन उत्सर्जन घटाया जा सकता है।

ज्वालामुखी को आमतौर पर प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के स्रोत के रूप में देखा जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों को एक ज्वालामुखी के विस्फोट के बाद ऐसा संकेत मिला है, जो जलवायु परिवर्तन को समझने में नई दिशा दे सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि ज्वालामुखी से निकली राख और समुद्री पानी ने मिलकर वातावरण में मौजूद मीथेन को तोड़ने की रासायनिक प्रक्रिया को तेज किया।

यह खोज 2022 में दक्षिण प्रशांत महासागर में हुए हंगा टोंगा-हंगा हापाई ज्वालामुखी के बड़े विस्फोट से जुड़ी है। इस विस्फोट ने राख, गैस और समुद्री पानी की भारी मात्रा को वातावरण की ऊपरी परतों तक पहुंचा दिया था। यह शोध नेचर कम्युनिकेशन्स नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

उपग्रह ने पकड़ा अजीब रासायनिक संकेत

वैज्ञानिकों ने इस घटना का अध्ययन यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-5पी उपग्रह पर लगे ट्रोपोमी उपकरण से किया। उपग्रह ने ज्वालामुखी के बाद बने विशाल बादल में फॉर्मल्डिहाइड की असामान्य रूप से अधिक मात्रा देखी।

फॉर्मल्डिहाइड वातावरण में बहुत कम समय तक रहता है। यह उस समय बन सकता है, जब मीथेन रासायनिक प्रतिक्रियाओं के जरिए टूटने लगता है। इसलिए इसकी बड़ी मात्रा वैज्ञानिकों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत बनी।

शोधकर्ताओं ने इस बादल को करीब 10 दिनों तक देखा। बादल दक्षिण अमेरिका की दिशा तक पहुंच गया था। वैज्ञानिकों के अनुसार, फॉर्मल्डिहाइड का इतने लंबे समय तक दिखाई देना इस बात का संकेत था कि बादल के अंदर मीथेन लगातार टूट रहा था।

दो लाख नहीं, 20 लाख गायों जितना मीथेन

शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक, ज्वालामुखी के विस्फोट के दौरान करीब 300 गीगाग्राम मीथेन निकला। यह मात्रा 20 लाख से अधिक गायों से होने वाले सालाना मीथेन उत्सर्जन के बराबर बताई गई है।

लेकिन इसी दौरान ज्वालामुखी के बाद बने बादल ने हर दिन करीब 900 मेगाग्राम मीथेन को खत्म किया। शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना करीब 20 लाख गायों के रोजाना मीथेन उत्सर्जन से की है।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि प्राकृतिक परिस्थितियों में वातावरण की रासायनिक प्रक्रियाएं मीथेन को काफी तेजी से खत्म कर सकती हैं।

नमक, राख और सूरज की रोशनी का खेल

वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रक्रिया में ज्वालामुखी की राख, समुद्री नमक और सूरज की रोशनी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हंगा टोंगा ज्वालामुखी समुद्र के नीचे था। विस्फोट के दौरान राख के साथ बड़ी मात्रा में खारा समुद्री पानी भी ऊपर पहुंच गया। इसका कुछ हिस्सा वातावरण की ऊपरी परत यानी स्ट्रैटोस्फियर तक पहुंच गया।

सूरज की रोशनी पड़ने पर राख और नमक से बने छोटे कणों में रासायनिक प्रतिक्रियाएं हुईं। इन प्रतिक्रियाओं से अत्यधिक सक्रिय क्लोरीन परमाणु बन सकते हैं। ये क्लोरीन मीथेन के साथ प्रतिक्रिया करके उसे तोड़ने में मदद करते हैं।

वैज्ञानिकों ने इससे पहले धूल और समुद्री नमक से जुड़ी ऐसी रासायनिक प्रक्रिया का अध्ययन किया था। लेकिन ज्वालामुखी के बाद बने बादल में इसी तरह की प्रक्रिया देखना उनके लिए काफी अप्रत्याशित था।

मीथेन घटाना क्यों जरूरी है?

मीथेन वातावरण की प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों में से एक है। कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में वातावरण में इसकी मात्रा कम है, लेकिन यह गर्मी रोकने में बहुत अधिक प्रभावी है। मीथेन वातावरण में आमतौर पर करीब 10 साल रहता है। इसके मुकाबले कार्बन डाइऑक्साइड का एक हिस्सा बहुत लंबे समय तक जलवायु को प्रभावित कर सकता है।

इसी वजह से मीथेन उत्सर्जन में कमी को जलवायु परिवर्तन की गति को अपेक्षाकृत जल्दी कम करने का एक महत्वपूर्ण तरीका माना जाता है। हालांकि, मीथेन कम करना कार्बन डाइऑक्साइड कम करने का विकल्प नहीं है। लंबे समय में जलवायु को स्थिर करने के लिए सीओ2 उत्सर्जन में भी बड़ी कटौती जरूरी होगी।

क्या इंसान इस प्रक्रिया को दोहरा सकता है?

शोधकर्ताओं के सामने अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ज्वालामुखी में देखी गई इस प्राकृतिक प्रक्रिया को सुरक्षित तरीके से दोहराया जा सकता है।

वायुमंडल से पहले से मौजूद मीथेन को हटाने पर वैज्ञानिक और कुछ कंपनियां शोध कर रही हैं। लेकिन इसमें बड़ी चुनौतियां हैं। वातावरण में मीथेन बहुत बड़े क्षेत्र में फैला होता है। इसलिए यह साबित करना आसान नहीं है कि किसी तकनीक ने वास्तव में कितनी मीथेन हटाई है। हंगा टोंगा की घटना में उपग्रहों ने फॉर्मल्डिहाइड के संकेत के जरिए इस प्रक्रिया को देखने का एक नया तरीका उपलब्ध कराया है।

मीथेन के वैश्विक हिसाब पर भी असर

इस खोज से मीथेन के वैश्विक बजट को लेकर वैज्ञानिकों की समझ भी बदल सकती है। मीथेन बजट में यह हिसाब लगाया जाता है कि वातावरण में कितनी मीथेन पहुंचती है और कितनी प्राकृतिक या रासायनिक प्रक्रियाओं से बाहर निकलती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि वातावरण में मौजूद धूल और ज्वालामुखी की राख की भूमिका को इन गणनाओं में पूरी तरह शामिल नहीं किया गया है। यदि ऐसी सामग्री वास्तव में मीथेन को तेजी से तोड़ सकती है, तो भविष्य में मीथेन के वैश्विक हिसाब को संशोधित करने की जरूरत पड़ सकती है।

हंगा टोंगा का विस्फोट इसलिए वैज्ञानिकों के लिए एक अनोखी प्राकृतिक प्रयोगशाला बन गया है। इस घटना ने दिखाया है कि प्रकृति में मौजूद राख, नमक और सूरज की रोशनी मिलकर मीथेन को तोड़ने वाली रासायनिक प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं। अब चुनौती यह समझने की है कि इस प्रक्रिया को कितनी अच्छी तरह समझा और सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है।